दिलीप भाटिया के पत्र में सामाजिक मुद्दे - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित ई-पत्रिका

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दिलीप भाटिया के पत्र में सामाजिक मुद्दे


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    स्नेह,
   
   समाजिक सम्बन्घों एवं पारिवरिक रिश्तों के दर्दनाक अनुभवों से त्रस्त तुमने मुझसे भी किसी भी सम्बोधन यथा प्रिय, स्नेही, बेटी, अनुजा, मेडम को स्वीकार नहीं करने का ई-मेल किया है. इसलिए तुम्हें सम्बोधन में प्रश्न चिन्ह ही मुझे सर्वोत्तम सम्बोघन प्रतीत हो रहा है.

   नारी सशक्तीकरण, महिला दिवस, डाटर्स डे, मदर्स डे, रक्षा-बन्घन, भाई दूज, करवा चौथ, इत्यादि कई अनुष्ठान दिवसों महिलाओं को समर्पित त्यौहारों के युग में भी नारी की स्थिति लाचार बेबस दयनीय चाहे नहीं भी हो, पर अच्छी तो क्या, इनसान वाली भी नहीं कही जा सकती है, यह भलीभांति मै स्वयं एक पुरूष होते हुए भी जानता हूँ.
   
   सास एंव जीवनसाथी से प्रतिरोध कर तुमने कन्या-भ्रूण का गर्भपात नहीं करवाया एंव एक प्यारी सी बिटिया को इस संसार में लाई इस आत्म-साहस के लिए मैं दिल से तुम्हारा अभिनन्दन करता हूँ  भोली गुड़िया एंव तुम्हें ससुराल गेंदा फूल में उपेक्षा का दंड मिला रहा है, तुम्हारी इस पीड़ा से मैं द्रवित हूँ.तुम्हारे सास-ससुर की आंखें खोलने के प्रयास चाहे अभी तक निरर्थक रहें हो, पर मैनें हार नही मानी है, भरोसा है, मुझे स्वयं पर कि मैं तुम्हारे जीवन की वर्तमान अमावस्या को एक दिन पूर्णिमा में बदल कर ही रहूँगा . शीघ्रता मत करो पहाड़ पर चढ़ने का एक नियम है, झुक कर चलो, दौड़ो मत. जिन्दगी मे गलत बातों पर झुकना निश्चय ही कमजोरी है, एवं समय के साथ शायद झुक कर सामने वाले को एक दिन झुकाया जा सकता है.

   तुम्हारी अधूरी शिक्षा को पूरी करने की भी अनुमति तुम्हें नहीं मिली, घर पर ट्यूशन करने की भी मनाही है, काम करने वाली बाई को हटा दिया गया है, निश्चय ही ऐसे रूढिवादी अंधविश्वासी दकियानूसी परिवार को कोई भी स्वाभिमानी बहू स्वीकार नहीं करेगी, परन्तु ऐसी मानसिकता को परिवर्तित करने में संयम, धैर्य, तपस्या की आवश्यकता होती है इस परिवर्तन में कितना समय लगेगा, यह भविष्यवाणी तो मैं नहीं कर सकता पर मेरे तुम्हारे निरन्तर प्रयास एवं सकारात्मक     दृष्टिकोण काली रात के बाद सुहानी भोर ला सकेंगे.

 टकराव, सम्बन्ध विच्छेद, तलाक, पीहर, मैके पर भार बन कर रह जाना कोई अच्छे विकल्प नहीं हैं. तन-मन-धन से इतनी समर्थ महसूस कर सको कि स्वयं का एवं नन्ही गुड़िया का पालन पोषण कर सको, तभी घुटन भरे माहौल से निकलने का निर्णय लेना. वृद्ध मम्मी-पापा कितने दिन तुम्हारा भार वहन करेंगे एंव उनके बाद भाई-भाभी जब तुम्हें सड़क पर छोड़ देंगे, तो तुम कौन सा दरवाजा खटखटाओंगी? कुऐं से निकलकर खाई में गिरना एक मूर्खता ही होगी.

   तुम्हारी उलझनों को सुलझाने के लिए मेरे पास कोई संजीवनी बूटी नहीं है. पत्र, फोन, एस एम एस, ई-मेल की एक सीमा होती है. मैं अगले सप्ताह स्वयं तुमसे आकर मिलूंगा. तुम्हारी बिटिया को आशीर्वाद भी दूंगा एवं हम खुल कर सभी पहलुओं पर विस्तृत चर्चा करेंगे. मुझे भरोसा है कि तुम्हारे जीवन की उजड़ रही बगिया में पुनः महकते हुए फूल खिलेंगे. टकराव की अपेक्षा समझौते का एक प्रयास तो हम कर ही सकते है. शीघ्रता में गलत निर्णय मत लेना, मेरी प्रतीक्षा करना. 
   
    सस्नेह- 
                                                    शुभाकांक्षी- कैलाश
     

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-


दिलीप भाटिया
7 घ 12, जवाहर नगर,जयपुर- 302004 (राजस्थान)
मोबाइल- 09461591498
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