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पुस्तक समीक्षा :मन से कवि,पेशे से पत्रकार,परंपरा से ज्योतिषी अरुण सिंह क्रांति

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शनिवार, फ़रवरी 11, 2012 | शनिवार, फ़रवरी 11, 2012

उषाकाल का केसरिया आकाश. श्वेत रंग के बाड़े से टेक लगाए एक हल्का आसमानी रंग का पहिया. बाड़े के अंदर हरीमखमलीकुछ पंक-युक्त घास. एक सूखा वृक्षजिससे झड़े आग्नेय-वर्णी पुष्पों को चुनकर टोकरी में एकत्रित करता एक बालक. युवा कवि अरुण सिंह क्रांति के पहले काव्य-संग्रह अग्निगंधा के फूल का ऐसा शानदार आवरण बरबस ही पुस्तक को उठाकर उसके पृष्ठ टटोलने को बाध्य करता है.कवि के पितामाता और गुरु के चरणों में समर्पित इस काव्य संग्रह की प्रस्तावना में कवि ने अपने अंदर एक कवि के जन्म लेने का कारण मातृ प्रेरणा बताया है. कवि के मन में लीक से हटकर कुछ करने की भावना रही. इसे उसने बखूबी अंजाम भी दिया है.

अरुण सिंह क्रांति का परिचय दिया जाएतो वह मन से एक कविशौक़ से एक लेखकपेशे से पत्रकार,परंपरा से ज्योतिषीअनुवांशिकता से गणित के कोच और आत्मा से एक क्रांतिकारी हैं.प्रस्तुत काव्य-संग्रह में कुछ ऐसी विशेषताएं हैंजो अपने आप में विरली हैं. पहला तो कविताओं का एक विशेष क्रम है. कवि ने पुस्तक का आरंभ मां से किया हैऔर उपसंहार भी मां से ही किया है. कविताओं की क्रमश: योजना में पहले मांफ़िर ज्ञान की देवी सरस्वतीफ़िर गुरुफिर राष्ट्र और समाजफ़िर नारी-शक्तिफ़िर एक ऐतिहासिक प्रसंग को स्पर्श करते हुए कवि अपने हृदय के स्पंदनों को काव्य-रूप देता हुआ,प्रेम की हर अभिव्यक्ति को शब्द देता है. कवि सौंदर्य,मन के मंथनकवि होने का गर्वआत्म-आलोचनाएक मृत्यु पत्र लिखने के बाद अपनी कविताओं में अग्निगंधा का मर्म बताते हुए फ़िर से मां तक पहुंच जाता है. मां से मां तक की यह यात्रा देखकर ऐसा लगता हैमानो कवि अपने अंतर-ब्रह्मांड की प्रदक्षिणा कर फ़िर से अपने मूल परअपने जीवन-स्त्रोत पर लौट आया हो.

अरुण सिंह क्रांति
दूसरी विशेषता हैहर कविता के साथ संलग्न एक प्रासंगिक रेखाचित्र. विभु दत्ता द्वारा बनाए ये रेखाचित्र भी जीवंत लगते हैं और अपने-अपने काव्य-विशेष का पूरा मर्म समेटे जान पड़ते हैं.तीसरी विशेषता हैहर कविता के अंत में बने छोटे-छोटे चिन्ह इन चिन्हों के प्रयोग से कवि में छिपी वैज्ञानिकता का आभास होता है. हर चिन्ह अपनी कविता का मूल-भाव स्पष्ट करता है. चौथी विशेषता हैपुस्तक का शीर्षकजिसमें अग्निगंधा शब्द का प्रयोग किया गया है. अग्निगंधा-काव्य को समझाते हुए कवि ने एक कविता में लिखा है- 

काव्य नहीं ये मन की
झंझावात से उड़ती धूल है
द्रव्य-भावना नहीं
ये लौह-मनस के चुभते त्रिशूल हैं
न समझो इन शब्दों को 
भावुक रचनाश्रृंगार-सी
इन शब्दों में मेरे मन की
हर चाहदाह और आह बसी
मथित-मन में ये महकते
अग्निगंधा फूल हैं
दग्ध-दिल के ये दहकते
अग्निगंधा फूल हैं

पुस्तक के शीर्षक के संबंध में कवि अरुण ने गूढ़ दार्शनिक भाषा में स्पष्ट किया है- जब भी मन में कोई सामयिक या आकस्मिक अंधेरा व्याप्त होता हैजिसमें सभी मार्ग दिखने बंद हो जाते हैं और बाह्य-जगत का कोई भी पदार्थ वहां रोशनी नहीं कर पातातो मैं स्वयं का ही मन जलाता हूंजिससे एक अग्निगंधा का वृक्ष पनपता हैजिसके प्रकाश और सुगंध लिए फूलभभविषय के लिए मेरे लक्ष्य की ओर जाने वाले मार्गों को प्रकाशयुक्त और सुगंधित बनाते हैं और जिसकी लकड़ी दीर्घ-काल तक मार्गों को प्रकाशित बनाए रखने के लिए जलाने के काम भी आती है. जब ये पुष्प और लकड़ी समाप्त या कम होने लगती हैतो मैं फिर से मन को जलाता हूं. 

पांचवीं और महत्वपूर्ण विशेषता हैकवि कीभभाषा-शैली और विषय की विविधता. जहां एक ओर कवि ने संस्कृत-निष्ठ हिंदी का छंदबद्ध प्रयोग किया हैवहीं कई स्थानों पर एक उन्मुक्त खड़ी बोली का भी सुंदर तालमेल देखने को मिलता है. अरुण की कविताओं में श्रृंगार रसकरुण रसरौद्र रसवीर रस व शांत रस का अद्‌भुत संयोग है. रचनाएं विभिन्न प्रतीकों और लगभग सभी प्रमुख अलंकारों से परिपूर्ण हैं. कहीं उच्चकोटि का नाद-सौंदर्यतो कहीं मनभभावन शब्द-सौंदर्य दिखता है और विषय की विविधता भी शानदार है. कवि ने एक ही पुस्तक में किसी शहीद के प्रेम पत्र से लेकर शहीदों की राख के शोधनदेशभक्ति का व्यवसायीकरणजलियावाला बाग की आत्म वेदना,आतंकवाद की आलोचनासांप्रदायिक-सद्‌भावदेश के विभाजन का दर्दप्रतिभा-पलायन की विडंबनासत्य की विजय का विश्वासएक नए समाज को बनाने का स्वप्ननारी-शक्ति का गुणगानरावण की आत्मग्लानि,प्रेमिका से प्रणय-निवेदनविरह-वेदनावसंत और फाग के सौंदर्य से लेकर अपने मन में छिपे देवत्व और पशुत्वदोनों की विवेचना को स्थान दिया है.

पुस्तक के मूल-भाव के बारे में प्रकाशक का कहना है-कवि की रचनाओं में मुख्य सरोकार हैंमातृभक्ति,राष्ट्रीयताप्रेममानस-मंथन और आत्मबोध. यह भी कहा जा सकता है कि ये उनकी काव्य-सृष्टि के पंच-तत्त्व हैं. कहीं स्वतंत्र रूप मेंतो कहीं सम्मिलित होकर ये तत्व उनकी रचनाओं को अलंकृत करते हैं. ये शब्द ही अपने आप में कवि की रचनाओं में उत्कृष्ट विविधता के प्रमाण हैं. बेशकयह पुस्तक शब्दों के इंद्रधनुषी रंगों से सराबोर कविताओं का एक ऐसा संग्रह हैजिसे कोई भी बार-बार पढ़ना चाहेगा और जितना पढ़ता जाएगाउतने ही नए अर्थ और भाव सामने आते जाएंगे. 

कृति : अग्निगंधा के फूल
विधा : कविता
कवि : अरुण सिंह क्रांति
प्रकाशन : सिनमन टील प्रकाशनगोवा
मूल्य : 250 रुपये


पुस्तक परिचय

अरुण सिंह ‘क्रान्ति’ की रचनाओं में मुख्य सरोकार हैं : मातृभक्ति, राष्ट्रीयता, प्रेम, मानस-मंथन और आत्मबोध| यह भी कहा जा सकता है कि ये उनकी काव्य-सृष्टि के पंच-तत्त्व हैं| कहीं स्वतन्त्र रूप में, तो कहीं सम्मिलित होकर ये तत्त्व उनकी रचनाओं को अलंकृत करते हैं|
उनकी मातृभक्ति माँ के लौकिक रूप से लेकर पारलौकिक देवी-स्वरूप और सांस्कृतिक राष्ट्र-स्वरूप तक व्याप्त है| उनकी रचनाओं में स्त्री के विविध रूपों के प्रति श्रद्धा व स्त्री की संवेदनाओं का मार्मिक चित्रण देखने को मिलता है| उनकी राष्ट्रीयता इतिहास से प्रेरणा लेकर, वर्तमान को साध कर भविष्य सुधारने पर बल देती है| कवि ने एक शहीद के अन्तिम उद्गारों से लेकर शहीदों की राख में दबे अग्निकणों के शोधन व शहीदों को बेच देने वाले समाज की आलोचना तक और लोकतंत्र व राजनीति के खुले घावों तक की खबर रखी है|
प्रेम के हर भाव, जैसे निवेदन, मोहन, उद्वेलन, संवेदन, श्रृंगार, प्रीति, रति और विरह आदि से परिपूर्ण इनकी रचनाएँ पाठकों को प्रेम-सिंधु की अनंत गहराइयों में डूब जाने को और प्रेमलोक की वीथियों में खो जाने को अनायास ही प्रेरित कर देती हैं|  प्रेम के विराट-स्वरूप को स्वीकार कर कवि ने किसी प्रेमी-युगल की क्रीड़ा, ऋतु-सौंदर्य तथा सामाजिक प्रेम व सौहार्द्र को भी प्रेम से ही जोड़ा है| कवि का आत्मबोध युक्त मानस-मंथन वास्तव में ही आत्मानुभूति व मानसिक शान्ति रुपी रत्नों को प्रगट करने वाला है|- प्रकाशक

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
समीक्षक :-फ़िरदौस ख़ान
लेखक :-अरुण सिंह 'क्रान्ति'
K-1/199 Mohan Garden
Uttam Nagar, New Delhi 110059

फिरदौस खान जी का ईमेल आईडी है: firdaus.journalist@gmail.com
व उनका ब्लॉग है: http://firdaus-firdaus.blogspot.in/  

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