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''लेखिकाओं के लिए घर और दफ़्तर के बाद लेखन ‘तीसरा मोर्चा’ है''-डॉ.रेणु व्यास

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on बुधवार, फ़रवरी 15, 2012 | बुधवार, फ़रवरी 15, 2012


(युवा सोच का प्रखर हस्ताक्षर लगती डॉ. रेणु व्यास ने हाल ही राजस्थान साहित्य अकादेमी के सहयोग से जोधपुर में हुए एक महिला लेखिका सम्मलेन में ये पत्र पढ़ा है जिसे हमने मांग-तुंग यहाँ खासकर पुरुष पाठकों के लिए प्रकाशित करने का मन बनाया.आयोजन का विषय था 'समकालीन महिला लेखन की चुनौतियाँ'- पसंद आया तो हमारे अपनी माटी की इस लेखिका से और भी सामगी मौलिक सामग्री मांग-तुंग कर यहाँ परोसेंगे.सम्पादक)

राजस्थान की ही कवयित्री पद्मजा शर्मा की एक कविता ‘औरत’ से मैं अपनी बात की शुरुआत करना चाहूंगी -

‘मैं
सीधी चली
बोले बनती है
टेढ़ी चली
बोले प्यादल है
रुकी
बोले हार गयी
झुकी 
बोले रीढ़ नहीं है
बैठी
बोले हिम्मत टूट गयी
उठी
बोले घमण्डी है
चुप हुई
बोले घुन्नी है
बोली
बोले ज़ुबान कतरनी है
मैं मरी
वे तब चुप हुए।

जो हालत इस कविता में औरत की है, कमोबेश वही स्थिति किसी लेखिका की भी है। अधिकांश लेखिकाओं के लिए घर और दफ़्तर के बाद लेखन ‘तीसरा मोर्चा’ है; जहां उन्हें कई पूर्वाग्रहों से दो-चार होना पड़ता है। यदि उसका लेखन भावुकता-भरा है, तो उसमें वैचारिकता की कमी दर्शायी जाती है; यदि वह तार्किक है, तो वहां रूखापन दिखता है। यदि उसकी अभिव्यक्ति सांकेतिक है तो यथार्थ की कमी बताई जाती है और यदि उसका लेखन बोल्ड है, तो यह न सिर्फ़ उसके लेखन का बल्कि उसके चरित्र के दोष की तरह देखा जा सकता है। अगर लेखन का दायरा ‘स्त्रियों का स्वाभाविक क्षेत्र’ घर, पति, बच्चे हों तो वह तो सीमित है ही; यदि वह दायरा घर से बाहर की समस्याएं हों तो उनमें अनुभव की प्रामाणिकता की कमी तो होगी ही, क्योंकि कोई लेखिका उन विषयों पर कलम चला रही है, जो उसके दायरे से बाहर के हैं। लेखन में अपनी अस्मिता की चेतना हो तो ‘स्त्री-वादी’ ओर न हो तो ‘सरोकारों की कमी’ दर्शाना सबसे आसान आरोप है। कुछ समय पहले तक भी कुछ पूर्वाग्रहियों के अनुसार लेखिका होना साहित्यिक जगत् में छपने की सुविधा मात्र माना जाता था, मानों फोटो के साथ-साथ रचना फ्री छपी हो। मीरां से लेकर महादेवी  तक लेखिकाओं को अपनी स्वतंत्र अभिव्यक्ति की कीमत अपने निजी जीवन पर सार्वजनिक बहस से चुकानी पड़ी है। तसलीमा को तो इस कारण कई-कई बार बेघर होकर भटकना पड़ा है।  

किसी लेखिका की सबसे बड़ी प्रशंसा यह हो सकती है कि ‘‘वह तो बिलकुल मर्दों की तरह लिखती है’’!! यह स्थिति तब है जब कम से कम कथा साहित्य में तो लेखिकाएं बहुसंख्यक हैं। फिर क्या कारण है कि महिलाओं का लेखन मुख्यधारा का लेखन नहीं माना जाता ? क्या कारण है कि जिस प्रकार सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक दृष्टि से स्त्रियां हाशिये पर हैं, उसी तरह साहित्यिक जगत् में स्त्रियों का लेखन भी हाशिये पर है ? 

महिला लेखन के बारे में पूर्वाग्रह के तीन रूप हैं। पहला तो यह कि महिला मौलिक लेखन नहीं कर सकती, उसके लेखन पर फलानी रचना या फलाने लेखक का असर है। यह आरोप साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता कृति ‘कलिकथा: वाया बाइ पास’ की लेखिका को भी झेलना पड़ा। जिस प्रकार पंचायती राज व्यवस्था में सुधारों के चलते पहली बार सरपंच बनी महिला के हर काम के पीछे ‘सरपंच पति’ का हाथ देखा जाता है, वैसी ही धारणा महिला लेखन के पीछे के ‘प्रभावों’ को ढूंढने में भी काम करती है। अर्थात् घर-परिवार और स्त्री-पुरुष-संबंधों के दायरे के बाहर कोई महिला मौलिक लेखन कर ही नहीं सकती; और ऐसा है तो यह फलानी रचना का प्रभाव है ! ( जो रचना अनिवार्यतः किसी पुरुष की ही हो सकती है )। यदि यह सिद्ध न हो पाये और महिला का लेखन अपने घर के, पति-बच्चों के दायरे में रहे तो वह ‘लेखिका’ के रूप में स्वीकृति पा सकती है, ‘लेखक’ के रूप में फिर भी नहीं ! मानों जिस तरह घर के बाहर के काम पुरुष के ज़िम्मे होते हैं, उसी तरह घर के बाहर की समस्याओं पर लिखना भी उन्हीं का जिम्मा हो। तीसरी तरह की लेखिकाएं जब घर के बाहर की समस्याओं पर भी पुरुषों से अपेक्षित बेबाकी के समान ही बेबाकी से लिखती हैं, तो उन्हें अपवाद मान कर लेखक-बिरादरी में स्थान मजबूरन दे दिया जाता है। आख़िर किसी लेखिका की इससे बड़ी सफलता क्या हो सकती है कि उसका लिखा मर्द की तरह लिखा लगे !! इसका कारण हमें खोजना होगा। 

कथा साहित्य में महिला-लेखन की बहुत ही सशक्त उपस्थिति है; कविता के क्षेत्र में भी महिलाएं अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुकी हैं, किंतु आलोचक और पत्र-पत्रिकाओं के संपादक के रूप में उनकी उपस्थिति आज भी नगण्य है। वे साहित्य तो रचती हैं, किन्तु साहित्य के मानदंडों को प्रभावित नहीं कर पातीं। जबकि वक़्त की ज़रूरत यह है कि ये मानदंड बदलें। यह समकालीन महिला लेखन के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है। जिस तरह राजनीति और समाज के नीति-निर्धारण और उसको नियंत्रित करने वाले क्षेत्र में महिलाएं हाशिये पर हैं, उनकी वही स्थिति लेखन के क्षेत्र में भी है। इसी कारण ‘स्त्री लेखन’ और ‘स्त्री-विमर्श’ का स्वरूप क्या हो,  यह भी कुछ आलोचक और संपादक तय करते हैं, जिनमें महिलाओं की उपस्थिति नगण्य है। यही कारण है कि एक लोकप्रिय पत्रिका के विवादित संपादक ‘स्त्री-विमर्श’ को ‘देह-विमर्श’ का पर्याय बनाकर प्रस्तुत करते हैं; और लेखिकाओं की एक टोली उनके पीछे चल पड़ती है। क्योंकि कौनसी कहानी श्रेष्ठ है या नहीं? यही नहीं, कौनसी कहानी छपेगी भी या नहीं ? इसके नियंता भी आलोचक जी और संपादक जी ही हैं। कई बार तो उन्हें यहां तक गलतफहमी हो जाती है कि वे ‘लेखिकाएं’ बनाते हैं।  

साहित्य के प्रतिमानों को तय करने में महिला लेखन की अनुपस्थिति या अनिच्छा के कारण भी महिला लेखन हाशिये पर आ जाता है। यदि स्त्रियों पर केंद्रित कोई कहानी शरत् चन्द्र या रवीन्द्रनाथ लिखें तो वह ‘मुख्यधारा’ का लेखन होता है और इसी तरह की रचना कोई महिला करे तो ‘महिला-लेखन’ के खांचे में हाशिये पर डाल दिया जाता है। साहित्य के रूढ़ प्रतिमानों में परिवर्तन से महिला लेखन और दलित लेखन भी विशाल साहित्यिक जगत् के एक अंग के रूप में विकसित होने का अवसर पायेंगे। ये साहित्यिक धाराएं न तो पूर्णतः विलगित हैं और न ही बिलकुल एकरूप। वास्तव में आज साहित्य जगत् की सैद्धांतिकी विविधता के स्वीकार की मांग कर रही है। 

महिला लेखन के समक्ष आज एक चुनौती यह भी है कि वह तय करे कि ‘स्त्री लेखन’, ‘स्त्रीवादी लेखन’ और ‘स्त्री-विमर्श’ के मध्य स्वस्थ रिश्ता क्या हो ? कैसा हो ? ये न तो पूर्णतः अलग हो सकते हैं और न ही एक दूसरे के पर्याय ही बन सकते हैं। रचनात्मक लेखन में ‘स्त्री-वाद’ की नहीं ‘स्त्री की दृष्टि’ की आवश्यकता है। यह कार्य लेखिकाएं अधिक सहजता से कर सकती हैं क्योंकि महादेवी वर्मा के शब्दों में कहें तो -‘‘पुरुष के लिए नारीत्व अनुमान है, परन्तु नारी के लिए अनुभव’’।

 रचनाओं के ‘स्त्री-पाठ’ को सामने लाने की ज़िम्मेदारी भी महिला-लेखन की है। ‘राग दरबारी’ पर एक लेख लिखते हुए मेरे मन में एक सवाल आया कि यह कृति किसी स्त्री ने लिखी होती तो क्या इसके पात्रों और लेखक का रवैया महिलाओं के प्रति ऐसा ही उपेक्षापूर्ण, उपहासजनक और अपमानजनक होता ? निश्चित रूप से नहीं। क्यों ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त लेखक की साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त कृति ‘पुरुषवादी सोच’ की कृति के रूप में नहीं, वरन् ‘मुख्यधारा’ की कृति के रूप में प्रशंसा पाती है ? क्यों ‘स्त्रीवादी कृति’ की तरह ‘पुरुषवादी सोच की कृति’ का अलग खाना नहीं है ? क्यों यह ‘पुरुषवादी’ दृष्टिकोण साहित्य जगत् में आकर ‘यूनिवर्सल’ या ‘सामान्य’ का स्थानापन्न हो जाता है ? आवश्यकता है कि महिला लेखन, स्त्रियों के विशेष अनुभवों को तो प्रामाणिक स्वर तो दे ही, साथ ही वह दूसरे मुद्दों पर भी संवेदनशील ‘स्त्री दृष्टि’ से और एक सामान्य नागरिक की दृष्टि से भी विचार करे। 

महिला लेखन के समक्ष यह भी चुनौती है कि वह अपने मध्यमवर्गीय परिवेश के बाहर की दुनिया को, वहां की स्त्रियों को भी अपने लेखन के दायरे में शामिल करे। खुशी की बात है कि ऐसे प्रयास शुरु भी हो गये हैं। बाल-साहित्य जो साहित्यकारों द्वारा सर्वाधिक उपेक्षित क्षेत्र है, उसमें भी महिला लेखन अपना योगदान दें तो साहित्य जगत् के एक बड़े अभाव की पूर्ति हो सकती है।अंत में रामधारी सिंह दिनकर की इन पंक्तियों के साथ मैं आप सभी को अपनी शुभकामनाएं अर्पित करती हूँ -

‘‘सेनानी करो प्रयाण अभय भावी इतिहास तुम्हारा है।
ये नखत अमा के बुझते हैं, सारा आकाश तुम्हारा है।।’’ 


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

डॉ.रेणु व्यास
चित्तौड़शहर की युवा प्रतिभा,इतिहासविद ,विचारवान लेखिका,गांधी दर्शन से जुड़ाव रखने वाली रचनाकार हैं.वे पत्र-पत्रिकाओं के साथ ही रेडियो पर प्रसारित होती रहीं हैं,उन्होंने अपना शोध 'दिनकर' के कृतित्व को लेकर पूरा किया है.
29,नीलकंठ,सैंथी,
छतरीवाली खान के पास,
चित्तौडगढ,राजस्थान 
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