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‘‘तेजी से नष्ट हो रहा है मरुभूमि का कल्पवृक्ष : खेजड़ी ‘‘

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on गुरुवार, फ़रवरी 16, 2012 | गुरुवार, फ़रवरी 16, 2012


रेतीले धोरों वाला मरुभूमि राजस्थान एक वैभवशाली अनूठा प्रदेश हैं। यहां की रंग-रंगीली वेशभूषा, रेतीले टीलों के पीछे धीमे स्वर में उठने वाला सुरीला संगीत, कलात्मक लोक नृत्य, स्वादिष्ठ खानपान, कलात्मक चित्रकारी व स्थापत्य कला की तो पूरे विश्व में धूम है ही, इसके अलावा इस वीर भूमि के इतिहास में कुछ ऐसी अनूठी परम्परायें हैं जो दुनियां के किसी भी देश के  इतिहास में देखने को नही मिलती हैं।

युवराज को बचाने के लिये अपने पुत्र को बलिदान कर देने वाली पन्ना धाय जैसी मां के अलावा भी यहां एक वृक्ष बचाने के लिए आज से ढ़ाई सौ वर्ष पूर्व तीन सौ तिरेसठ स्त्री-पुरुषों का बलिदान रेत पर लिखी एक ऐसी महान गाथा हैं जिसे सुनकर हर व्यक्ति रोमांचित हुए बिना नही रह सकता हैं। जिस एक पेड़ को बचाने के लिये विश्व कि सबसे बड़ी कुर्बानी दी गई वह वृक्ष है राजस्थान का सर्वाधिक महत्तवपूर्ण  ‘‘खेजड़ी ‘‘ का वृक्ष। इस वृक्ष को राजस्थान में कल्पवृक्ष के समान माना गया है। खेजड़ी वृक्ष की बहुउपयोगिता को देखते हुये ही राजस्थान सरकार द्वारा इस वृक्ष को राज्य वृक्ष घोषित कर संरक्षित वृक्षो की सूची में शामिल किया है।

सन् 1730 की भाद्रपद सुदी दशमी के दिन ‘‘खेजड़ी ‘‘ग्राम में ‘‘खेजड़ी ‘‘वृक्ष को बचाने के लिए विश्नोई समुदाय के तीन सौ तिरेसठ लोगों द्वारा किया गया बलिदान मनुष्य के प्रकृति प्रेम की अनोखी मिसाल हैं। जोधपुर नरेश अजीतसिंह के पुत्र अभयसिंह के मंत्री गिरधरदास भण्डारी के आदेश से ‘‘खेजड़ी ‘‘ गांव में हरे पेड़ काटने जब राजा की सेना पहुंची तो ‘‘खेजड़ी ‘‘व आस-पास के चौरासी गांवो के विश्नोईयों ने ‘‘खेजड़ी ‘‘को काटने से बचाने का निश्चय कर पेड़ों से चिपटकर कुल्हाडिय़ों के वार अपने शरीर पर झेलकर अपना बलिदान कर दिया मगर पेड़ नही कटने दिया। ‘‘खेजड़ी ‘‘के लिये किये गये इस बलिदान में 69 महिलाओं व 294 पुरुषों ने अपना सिर कटाया था। ‘‘खेजड़ी ‘‘के लिए किए गए इस बलिदान का ही प्रभाव है कि आज रेगिस्तान में अनेक ऐसे गांव है जहां लोग हरे पेड़ों को नही काटते हैं।

विश्नोई समाज के सुप्रसिद्ध धर्मगुरु जाम्भोजी ने हरे पेड़ नही काटने व जीव जन्तुओं के शिकार नही करने की बात कही, जिस कारण ही विश्नोई समाज का कोई भी व्यक्ति हरा पेड़ नही काटता हैं, तथा न ही जीव जन्तुओं का शिकार करता हैं। चूंकि जाम्भोजी मरूस्थली इलाकों में पैदा हुए थे इस कारण वे अच्छी तरह जानते थे कि ‘‘खेजड़ी ‘‘वृक्ष ही हर स्थिति में मनुष्य के लिये उपयोगी रहता हैं।

प्रकृति ने रेगिस्तान में खेजड़ी के रुप में एक ऐसा वृक्ष दिया है जिसमें लू के थपेड़ों, अकाल, वर्षा की कमी व भीषण आंधियों को सह लेने की क्षमता हैं। यह माइमोजेसी वंश का वृक्ष हैं। जैसे-जैसे लू चलती है ‘‘खेजड़ी ‘‘हरा होता जाता है तथा वर्षा का पानी नही बरसने पर भी यह सूखता नही हैं। इसके पत्ते, फलियां व छाल जीवन रक्षक खुराक ही नही अपितु मरुस्थली अंचल में रहने वाले लोगों के लिये अमृत तुल्य है। इस वृक्ष की फलियां ‘‘सांगरी ‘‘कहलाती हैं जिनकी सब्जी बड़ी पौष्टिक व स्वादिष्ट बनती हैं। इनके पत्ते पशुओं के लिए सर्वोत्तम आहार हैं। इनके बीज काफी प्रोटीनयुक्त होतें हैं। पहले लोग खेजड़ी के पेड़ के तने पर लगने वाले बफेड़े को तेल में भिगोकर रात में रोशनी करने के लिये जलाते थे।

‘‘खेजड़ी ‘‘भारत के लगभग सभी सूखी व ऊष्ण जलवायु तथा कम से कम वर्षा 100-115 सेन्टीमीटर वाले स्थानों पर अधिक होता हैं। यह एक सदाबहार पेड़ है जिसकी ऊंचाई 12 से 18 मीटर तक होती हैं।  इसमे ï2.9 फीसदी नत्रजन,0.4 फीसदी फोस्पास, 2.8 फीसदी केल्सियम कारबोन पाया जाता हैं। इसकी छाल कुछ मीठापन लिये हुए होती हैं। सन् 1868-69 में राजस्थान में पड़े भीषण अकाल में सूख से पीडि़त लोगों ने ‘‘खेजड़ी ‘‘की छाल खाकर अपनी जान बचाई थी। उसकी छाल को खांसी, अस्थमा, बलगम, सर्दी व पेट के कीड़े मारने के काम में लाते हैं। इसकी पत्तियां राजस्थान में पशुओं का सर्वश्रेष्ठ चारा हैं। इसमें पेटूलट्रिन एवं खुशबुदार गलाकोसाइड (एम. पी. 252-53)पाया जाता हैं। इसकी फलियां सीने में दर्द व पेट की गर्मी शांत करने मे उपयोगी रहती हैं। इसके फुलों को चीनी में मिलाकर लेने से गर्भपात नही होता हैं। इसकी उम्र सैंकड़ो वर्ष आंकी गयी हैं। इसकी जड़ो के फैलाव से भूमि का क्षरण नही होता हैं उल्टे जड़ों में रेत जमी रहती हैं जिससे रेगिस्तान के फैलाव पर अंकुश लगा रहता हैं। 

मरुप्रदेश के लोगों का वृक्षों के प्रति प्रेम के कारण ही आज भी रेगिस्तान में लाखों ‘‘खेजड़ी ‘‘के पेड़ खड़े हैं।  लेकिन आज खेजड़ी का वृक्ष अपने अस्तित्व बचाने को जूझ रहा है। खेजड़ी के पेड़ों की संख्या तेजी से घट रही है,क्योंकि हाल ही में कीट वैज्ञानिकों द्वारा हाल ही में शेखावाटी में किये गये शोध में खुलासा हुआ है कि गाइनोड्रामा कवक खेजड़ी को चट रही है। शोधकर्ताओं का मानना है कि गाइनोड्रामा एक कवक जनित रोग है। यह पौधे पर बनने के बाद पौधे का तना कमजोर होने लगता है,जिससे पौधे का ठीक से विकास नहीं हो पाता है और धीरे-धीरे पौध नष्ट हो जाता है। इसका कारण बरसात की कमी, तेजी से गहराता जलस्तर, खेतों की ट्रेक्टर से जुताई, पेड़ की जड़ में लगने वाले कीट-पतंगे आदी है। 

राज्य में तेजी से नष्ट हो रही खेजड़ी को बचाने को लेकर वन विभाग चिंतित नजर आ रहा है। इसी कारण सरकार ने खेजड़ी के संरक्षण के लिये प्रदेश में सवा करोड़ रूपयों का विशेष पैकेज जारी किया है। खेजड़ी की स्थिति कितनी विकट है इस बात का खुलासा जोधपुर की आफरी संस्था द्वारा हाल ही में किये गये एक सर्वेक्षण में सामने आया है। सर्वेक्षण में सबसे चौंकाने वाली स्थिति झुंझुंनू,सीकर,चूरू व नागौर जिलों में देखी गयी हैं। इन जिलों में प्रदेश की 70 फीसदी से अधिक खेजड़ी के वृक्ष पायें जातें हैं। उनमें आधे से अधिक खेजड़ी के पेड़ प्राकृतिक व भौतिक कारणों के चलते गत दस वर्षो में नष्ट हो गयें हैं।

वन संरक्षण प्रभाग जोधपुर के प्रभागाध्यक्ष डा. एस.आई.अहमद का कहना है कि गत 10 वर्षों के सर्वेक्षण में पाया गया कि राजस्थान में खेजड़ी वृक्ष की स्थिति अति चिंताजनक है। नागौा क्षेत्र में खेजड़ी के 20 से 90 फीसदी तक पौधें की मेटिलिटी हो चुकी है। विशेषज्ञों द्वारा प्रदेशभर में अलग-अलग छह स्थानों पर प्रयोग किये गयें हैं जिनमें प्रथम चरण में प्रत्येक स्थान पर 80 पेड़ों का उपचार किया गया है। सभी स्थानों पर शोध कार्य इसी वर्ष मार्च से शुरू कर दिया गया है जो  तीन वर्षों तक चलेगा। इसमें विशेषज्ञों द्वाराअनुसंधान केन्द्र फतेहपुर,काजरी व आफरी के सुझावों के आधार पर प्रयोग कियें गयें हैं।

किसानों के अनुसार खेतों में खेजड़ी के पेड़ तेजी से नष्ट होते जा रहें हैं। गत 30-35 वर्षों में खेजड़ी के पेड़ों की संख्या घटकर आधी रह गयी है। बुजुर्ग बताते हैं कि पहले खेतों में इतने अधिक खेजड़ी के पेड़ होते थे कि सीधे हल चलाना मुश्किल होता था और आज गिने-चुने पेड़ बचे हैं। ‘‘खेजड़ी ‘‘बचाना इसलिए भी जरुरी है कि यदि वृक्ष बचेंगे तो जीवन बचेगा अन्यथा हमारी  यह हरी-भरी पृथ्वी ही नष्ट हो जायेगी।लेखक परिचय:- रमेश सर्राफ धमोरा,स्वतंत्र पत्रकारिता करता हूं तथा हमवतन नईदिल्ली राष्ट्रीय साप्ताहिक, तथ्य भारती पाक्षिक पत्रिका,राजस्थान डायरी मासिक पत्रिका ,राष्ट्रीय सहारा नईदिल्ली व यूनीवार्ता का झुंझुनू जिला संवाददाता हूं। 2000 से 2010 तक ग्राम पंचायत धमोरा का सरपंच रह चुका हूं। 


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-


रमेश सर्राफ
झुंझुंनू,राजस्थान
मोबाईल-9414255034 
ई-मेल-rameshdhamora@gmail.com
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