Latest Article :
Home » , » प्रतीक श्री अनुराग की कविता 'यह कैसा अनुवर्तन'

प्रतीक श्री अनुराग की कविता 'यह कैसा अनुवर्तन'

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शुक्रवार, फ़रवरी 17, 2012 | शुक्रवार, फ़रवरी 17, 2012


यह कैसा अनुवर्तन

माँ ने कहा था--
'चलते जाना
काँटों से होकर क्षितिज के पार
मिलेगी तुम्हें फूलों की मखमली सेज'
माँ ने कहा था--
'चीरकर निकल जाना
प्रलयंकारी लहरों के पार
मिलेगा तुम्हें श्रांत तीर'
माँ ने कहा था--
'चढ़ते ही जाना
उबड़-खाबड़, पथरीले पर्वतीय श्रृंगों के पार
मिलेगा तुमको उर्ध्वगत स्थल'
माँ ने कहा था--
'कूद जाना
आग की दाहक लपटों में
मिलेगा तुमको जीवन का शीतोष्ण स्पंदन'

मैंने वैसा-ही किया
जैसा माँ ने कहा था
मैम चलता गया कांटों पर निरंतर
अनवरत शूल भेदती रहीं
मेरी शरीर और आत्मा को
उफ़्फ़ तक नहीं किया
चलता रहा, बढ़ता रहा मैं
अबाध, द्रुत और निर्भीक
और मैं भीष्म बन गया

मैंने ठीक वैसा ही किया
लड़ता रहा दुर्दांत थपेड़ों से
एक विजेता की भाँति
निरंतर संघर्ष चलता रहा लहरों से
कभी लहरों के नीचे
कभी लहरों के ऊपर
लड़ता रहा, बढ़ता रहा
अटल, अपराजेय, अविछिन्न
और मैं भँवर बन गया

मैंने वैसा ही किया, जैसा माँ ने कहा था
चढ़ता रहा
हिमाद्रितुंगवेणि श्रृंगों पर निष्कंटक मैं
अनगिनत क्रीट-शंख-वलय चुभ गए
मेरे ज़िस्म और रूह में
बढ़ता रहा--उर्ध्वमुख, निर्विकल्प
और मैं देवदारु बन गया

मैंने अक्षरशः माँ का अनुपालन करता रहा
बढ़ता गया
आग के वलयित लपटों की ओर
प्रति क्षण
असंख्य ज्वाल लपटों को रोकता रहा
अपनी वल्गा से
उफ़्फ़ तक की
और मैं चिता बन गया। 


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

प्रतीक श्री अनुराग
बी.एच.यूं. से बी.. आनर्स (अंग्रेज़ी साहित्य) से किया है.प्रतीक सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यकर्ता के तौर पर अपने इलाके में पहचाने जाते हैं.एक जुझारु पत्रकार हैं.ख़ास तौर पर लोकप्रिय टी.वी. कामेडी 'पप्पू चायवाला' के लेखक आप ही हैं.'वी-विटनेस' हिंदी पत्रिका के सम्पादन के अलावा कई पत्र-पत्रिकाओं में पारियां खेल चुके हैं.जैसे 'वाराणसी टाइम्स',बिहारी टाइम्स.आपने विद्या श्री फाउन्डेशन, वाराणसी की स्थापना भी की है.
मकान नं. 37/170-39
गिरि नगर कालोनीबिरदोपुर,
महमूरगंजवाराणसी.प्र.
editor_wewitness@rediffmail.com

SocialTwist Tell-a-Friend
Share this article :

0 comments:

Speak up your mind

Tell us what you're thinking... !

संस्थापक:माणिक

संस्थापक:माणिक
अपनी माटी ई-पत्रिका

सम्पादक:जितेन्द्र यादव

सम्पादक:जितेन्द्र यादव
अपनी माटी ई-पत्रिका

एक ज़रूरी ब्लॉग

एक ज़रूरी ब्लॉग
बसेड़ा की डायरी:माणिक

यहाँ आपका स्वागत है



ज्यादा पढ़ी गई रचना

यहाँ क्लिक करके हमारी डाक नि:शुल्क पाएं

Donate Apni Maati

रचनाएं यहाँ खोजिएगा

हमारे पाठक साथी

सम्पादक मंडल

साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका
'अपनी माटी'
========
प्रधान सम्पादक
सम्पादक
सह सम्पादक
तकनिकी प्रबंधक
========
संपर्क
apnimaati.com@gmail.com
========

ऑनलाइन

Donate Us

 
Template Design by Creating Website Published by Mas Template