अमरत्व को प्राप्त
भूपेन दा
आज हमारे
बीच नही
रहे लेकिन
जैसे शंकरदेव
माधधदेव महाप्रयाण
कर गये
पर उनके कृतित्व और
ब्यक्तित्व के चलते वे महापुरुष
असम के
जन जीवन
मे आज
भी मौजूद
हैं और
चन्द्र-सूर्य
की तरह
सदैव मौजूद
रहेंगे उसी
तरह भूपेन
दा भी
जिनके मन-मष्तिक
और ब्यक्तित्व मे संगीत सहित कई
कलाओं का
समावेश था
असम के
सामाजिक और
सांस्कृतिक जीवनाकाश पर ध्रुव तारे
की तरह
सदैव चमकते
रहेंगे। गंगा
नदी भारतीय
आध्यात्म और
संस्कृति की
गहन आस्था
है। उसी
आस्था की
प्रतीक गंगा
को भूपेन
दा का
कवि हृदय
सवाल करता
है ऐ
गंगा ! भ्रष्ट
होती मानवता
और विलुप्त
होती नैतिकता
को देख
कर भी
तुम्हारा प्रवाह
स्तम्भित क्यों
नही हो
जाता। पतित
पावनी कहलाने
वाली ऐ
गंगा ! तुम
अचम्भित हो
कर स्थिर
क्यों नहीं
हो जाती
हो, आखिर
तुम क्यों
बहती हो
? यही सवाल
असमी धरा
से हो
कर प्रवाहित
होने वाले
ब्रम्हपुत्र से भी किया जाना
चाहिए। क्योकि
ब्रम्हपुत्र भी तो उसी स्थान
को स्पर्श
करते हुए
असम मे
प्रवेश करता
है जिस
स्थान पर
ऋषि परशुराम
को मातृहत्या
के पाप
से मुक्ति
मिली थी।
फरशुराम कुण्ड जैसे
तीर्थ स्थल
और मां
कामाख्या का
धाम कहलाने
वाले
असम मे नरमेघ, अपहरण और
हत्या, अबोध
व भोली
भाली नवयुवतियों
के सामुहिक
बलात्कार के
समाचार अखबारों
मे और
इलेक्ट्रोनिक मिडिया पर बराबर आते
है। ऐसे
मे मानवता
और नैतिकता
सिर्फ किताबें
बातें रह
गई है।अब प्रश्न यह
है कि
भूपेन दा
के बाद
असमी धरा
पर क्या
कोई भी
ऐसा कवि
हृदय ऐसा
नहीं बचा
है जो
महाबाहू ब्रम्हपुत्र
से पूछे
‘ ऐ ब्रमहपुत्र
! क्या
ध्वंशलीला ही तुम्हारी नियति है।
जिस धरा
पर से
प्रवाहित हो
कर अपने
गंतब्य की
ओर बढ़
रहे हो
उस धरा
की भ्रष्ट
होती मानवता
और नष्ट
होती नैतिकता
पर तुम्हारी
नजर क्यों
नही जाती।
तुम्हारे महाबाहू
उनकी गर्दन
तक क्यों
नहीं पहूंचते
जो मानवता
और नैतिकता
की हत्या
कर रहें
हैं ?
नागेन्द्र शर्मा
(असमिया संस्कृति से ओतप्रोत सृजनकार नागेन्द्र एक सेवानिवृत शिक्षक होने के साथ ही उस इलाके के जाने-माने फीचर राईटर हैं.इनकी असमिया से हिन्दी में अनुदित कहानियाँ धर्मयुग और सारिका में छपती रही है)
संपर्क सूत्र:-
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