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प्रतिरोध,परिवर्तन और प्रगति का त्रैमासिक 'मगहर' का प्रवेशांक बाज़ार में

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on रविवार, फ़रवरी 19, 2012 | रविवार, फ़रवरी 19, 2012

स्त्रीवाद, अम्बेडकरवाद और मार्क्सवाद मौजूदा समाज की  प्रगतिशील और आवश्यक आलोचनाएं हैं। ये सभी आलोचनाएं वर्तमान समय में सत्ता प्रतिष्ठानों के लिए बड़ी चुनौती हैं।  लेकिन इन सभी आलोचनाओं को मानने वाली प्रगतिशील शक्तियां बंटी हुई हैं। ये सभी  अपने-अपने सच को ही पूरा सच मान रही हैं। दूसरी तरफ देश और दुनिया की लगातार बदलती हुई सामाजिक-राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिस्थितियां यह साबित कर चुकी हैं कि उनमें से किसी का भी सच पूरा सच नहीं है। 

आज सभी प्रगतिशील शक्तियों के आगे सबसे बड़ी चुनौती यह है कि सभी प्रगतिशील आपस में प्रतिद्वन्द्विता करने की बजाए एक हो जाएं और एक दूसरे की आलोचना की बजाए यह देखें कि सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए एक दूसरे से क्या सीख सकते हैं और एक साथ कैसे आगे बढ़ सकते हैं। एक पूर्ण सच की तलाश और उसकी पुनर्सृष्टि करना  और एकता बनाने की दिशा में साझा, जनपक्षीय और व्यापक दृष्टिकोण विकसित करना मगहर पत्रिका का पहला और सबसे महत्वपूर्ण अजेंडा है।


मौजूदा साहित्य और संस्कृति का माहौल एक गहन विश्लेषण की मांग करता है। यह विश्लेषण फिर कभी। लेकिन इतना तो कहा ही जा सकता है कि आज इस क्षेत्र में व्यक्तिवाद, अवसरवाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद, वैचारिक संकीर्णता और बौद्धिक दिवालियेपन का बोलबाला है। सत्ता और उसके प्रतिष्ठानों ने लेखक और संस्कृति कर्मियों को लगभग हाशिए पर ठेल दिया है। बावजूद इसके उनके बीच कोई एकता नहीं बन पा रही है।  लेखकों के अनेक प्रगतिशील संगठन मौजूद हैं लेकिन लेखकों के अधिकारों का सवाल किसी के अजेंडे पर नहीं है। उनके भीतर गुटबाजी जोरों पर है। आपसी प्रतिद्वन्द्विता, व्यक्तिवादिता और अवसरवादिता के ख़िलाफ़ संघर्ष और सामूहिक सृजनशीलता उनमें से किसी के अजेंडे पर नहीं है।


साहित्य और संस्कृति के मौजूदा हालात में जरूरत आपस की प्रतिद्वंदिता को कम करके व्यक्तिवादी प्रवृत्तियों से लड़ते हुए एक सामूहिक मंच बनाने की है, सृजन में व्यापक समतावादी दृष्टिकोण को निर्मित करने की है। साहित्य और सस्ंकृति की मौजूदा परिस्तिथियों पर कोई आक्रामक टिप्प्णी करने अथवा उस पर मर्सिया गा लेने भर से बात नहीं बनती बल्कि उन परिस्तिथियों को बदलने के लिए एक सशक्त प्रयास की दरकार है। मगहर एक ऐसा ही प्रयास है। हम जानते है कि इस तरह का यह कोई पहला प्रयास नहीं है। इस तरह के प्रयास पहले भी होते रहे हैं और आगे भी होते रहेंगे। मगहर पत्रिका साहित्य और संस्कृति के मौजूदा परिदृश्य में हमारा एक जरूरी हस्तक्षेप है। 
साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में व्याप्त व्यक्तिवादिता, अवसरवादिता और तमाम वैचारिक संकीर्णताओं के बरक्स सृजन की सामूहिकता और विचारों की व्यापकता को बढ़ाना मगहर त्रौमासिक का मुख्य मकसद है। यह पत्रिका खास तौर पर नए और युवा रचनाकारों के लिए निकाली जा रही है। यह पत्रिका का प्रवेशांक ही है.मगर तेवर देख/पढ़कर लगता है की भुत दूर तक जायेगी.मगहर उस पवित्र स्थान का नाम है जहां कबीर जीवन भर अन्धविश्वासों और सकीर्णताओं से लड़ते रहे।उसी तरह शायद ये पत्रिका भी लड़ेगी।ऐसी ही पाठकों की आकांक्षा भी रहेगी.साल-दर साल बढ़ती हुई लघु पत्रिकाओं के बीच ये पत्रिका भी अपने वजूद को साबित करेगी,ऐसी ही कामना व्यक्त करते हैं. 

ये पत्रिका ख़ास तौर पर युवा रचनाकारों के लिए है,ऐसा सम्पादक मंडल से पता चला है..और एक बात की ये पत्रिका अपने मकसद में वाम और दलित एकता को कायम करने के लिए कार्य करेगी.'अपनी माटी' परिवार की तरफ से उन्हें बहुत सी शुभकामनाएं.पत्रिका पाने हेतु आप दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रोफ़ेसर के रूप में कार्यरत मुकेश मानस से संपर्क कर सकेंगे.जिनका -मेल पता:-mukeshmanas@hotmail.com,mukeshmaanas@gmail.com

मगहर 
 38, पी जी मेन्स हास्टल,
दिल्ली विश्वविद्यालय,
दिल्ली - 110007
+91 901 320 2028


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स्त्रोत:-माणिक 
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