आयोजन रपट:अतीत में वामपंथ की शानदार परम्परा रही है। - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित ई-पत्रिका

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आयोजन रपट:अतीत में वामपंथ की शानदार परम्परा रही है।


लखनऊ
कल्पना पांडेय ‘दीपा’ का रचना पाठ
‘वह भाषा भी क्या भाषा है/जिसमें जिन्दगी की रवानी नहीं’

यह स्मृतियों के लोप होने का समय है। अतीत की बात कम होती है। लेकिन अतीत में बहुत कुछ ऐसा है जो आज भी हमें प्रेरित करता है। वामपंथी आंदोलन भले ही आज धक्के और गतिरोध का सामना कर रहा हो लेकिन अतीत में वामपंथ की शानदार परम्परा रही है। मेहनतकश जनता की मुक्ति के लिए कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने अपने जीवन को कुर्बान करने में सबसे आगे रहे हैं। तेलंगाना से लेकर नक्सलबाड़ी तक, वारली से लेकर तेभागा तक कम्यंनिस्टों ने जनचेतना की मशालें जलाई और लाल परचम को लहराया। संस्कृतिकर्मी कल्पना पांडेय ‘दीपा’ ने अपनी पुरानी स्मृतियों के पिटारे से कुछ बेहतरीन टुकड़े सुनाये जो कम्युनिस्ट संस्कृति के यादगार नमूने हैं। कार्यक्रम का आयोजन जन संस्कृति मंच ने 12 फरवरी को लखनऊ के लेनिन पुस्तक केन्द्र में किया था।

कामरेड दीपा उस परिवार की बेटी हैं जिस परिवार ने अपना सारा जीवन कम्युनिस्ट आंदोलन को समर्पित कर दिया था। कामरेड आनन्द भारद्वाज और उनकी पत्नी कामरेड आजादी के पहले पार्टी से जुड़ गये थे। पार्टी भूमिगत थी। कष्टपूर्ण व कठिन जीवन था। लेकिन विचार व उद्देश्य की उष्मा में सारे कष्ट छोटे थे। दीपा ने बताया उनके माता व पिता ने पहली मई को दास कैपिटल के फेरे लेकर नये जीवन की शुरुआत की थी। उनके लिए मई दिवस से बड़ा कोई शुभ दिन नहीं था और साथ साथ एक ही मंजिल की ओर बढ़ने के लिए शपथ लेने के लिए दास कैपिटल से बड़ा कोई ग्रन्थ नहीं था। यहां जाति, धर्म का कोई बन्धन नहीं था। वह दौर था जब परिवारों और साथियों के बीच कम्युन जैसा माहौल था। इसी माहौल में दीपा पली.बढ़ी। समाजवाद का पाठ पढ़ा। इसी माहौल में रहते हुए इप्टा से जुड़ीं। नाटक किये, आंदोलनों में हिस्सा लिया। नाटक व कविताएं लिखी। 

दीपा ने लखनऊ की गोष्ठी में अपनी कई कविताएं संनाईं। ‘भाषा किसी धर्म की सम्पति नहीं/धर्म किसी भाषा का मोहताज नहीं’ यह काव्य पंक्तियां ‘दीपा’ की हैं। कल्पना पांडेय ‘दीपा’ का अपनी कविताओं के माध्यम से कहना था कि भाषा और धर्म जिन्दगी को बेहतर बनाने के लिए है -

‘वह भाषा भी क्या भाषा है/
जिसमें जिन्दगी की रवानी नहीं/
धर्म वह भी क्या धर्म/ 
जिसमें जिन्दगी का साज नहीं’।’

 इस मौके पर ‘दीपा’ ने ‘भाषा धर्म’, ‘सुनामी’, ‘अच्छी लड़की’, ‘पुकारा’ ‘हत्यारे’, ‘भूल नहीं पाती’ शीर्षक से अपनीे करीब एक दर्जन कविताएं सुनाई। अपनी कविताओं के विविध रंग से उन्होंने श्रोताओं को परिचित कराया। उनकी कविताएं पित्रसत्तात्मक समाज की त्रासदी को सामने ले आती हैं। वे ही लड़कियां अच्छी हैं जो इस समाज द्वारा बनाये उसूलों पर चलें। कल्पना पांडेय ने अपना नाटक ‘पागल की दुनिया’ का पाठ भी किया। नाटक पाठ में उनका साथ रंगकर्मी मेराज आलम ने दिया। नाटक का कथानक नाटक के अन्दर नाटक के रूप में चलता है। नाटक के पात्र समाज के यथार्थ को सामने लाते हैं जहां ओबामा हो या ओसामा अपने अपने तरीके से जनता के लिए तबाही लाने वाले हैं। पात्रों का संघर्ष इनके विरुद्ध चलता है। इस सच को उजागर करने वाले तथा व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष करने वाले सत्ता  के लिए पागल हैं। 

दीपा के नाटक व कविताओं पर चन्द्रेश्वर, राजेश कुमार, नसीम साकेती, वाई एस लोहित, विमला किशोर,, आर के सिन्हा, , बी एन गौड़, तश्ना आलमी आदि ने अपने विचार रखे। वक्ताओं का कहना था कि कल्पना पांडेय दीपा की कविताएं पारदर्शी हैं। ये सीधे व सरल भाषा में बात करती है। इनमें जो शब्द आये हैं, वे जिन्दगी व समाज लिए गये हैं। इसीलिए संप्रेषित होते हैं और हमें संवेदित करते हैं। ये कविताएं संकट के समय में इन्सानियत को सामने लाती हैं। यही विशेषता उनके नाटक में भी मिलती है। इस मायने में दीपा कल्पना धर्मी व जीवनधर्मी रचनाकार हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता जसम के संयोजक कौशल किशोर नेकी तथा संचालन किया कवि श्याम अंकुरम ने।

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

जसम की लखनऊ शाखा के जाने माने संयोजक जो बतौर कवि,लेखक लोकप्रिय है.उनका सम्पर्क पता एफ - 3144,राजाजीपुरम,लखनऊ - 226017 है.
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