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''सेठ तो नाममात्र के हैं,अद्भुत हिम्मती जरूर हैं हिम्मत सेठ। ''-सुरेश पण्डित

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on सोमवार, फ़रवरी 27, 2012 | सोमवार, फ़रवरी 27, 2012


पिछले कई सालों से उदयपुर का समता लेखक सम्मेलन विगत 12 वर्षों से हो रहा है। इसका आयोजन महावीर समता संदेश नामक एक पाक्षिक समाचार पत्र करता है जिसके सम्पादक और इस सम्मेलन के आयोजक हिम्मत सेठ हैं जो सेठ तो नाममात्र के हैं, अद्भुत हिम्मती जरूर हैं। इसी हिम्मत के चलते इन्होंने अपने इस अखबार का मात्र अखबार न रखकर एक आन्दोलन बना दिया है। यह जनता की हर मुसीबत को अपनी मान, शासन-प्रशासन से लड़ने को हमेशा तैयार रहता है। इनके दाहिने हाथ की तरह काम करने वाले व्यक्ति का नाम है- हेमेन्द्र चण्डालिया, जो एक विश्वविद्यालय के ऊँचे प्रोफेसर रहते हुए भी इस काम को प्राथमिकता से लेते हैं दोनों के मिले जुले प्रयास से ही यह अखबार चलता है। जनान्दोलन होते हैं और लेखक सम्मेलन किये जाते हैं। 

पिछले 11 सम्मेलन साहित्य के सरोकारों से लेकर ग्रामीण आदिवासी, दलित, महिला और बच्चों के मुद्दों से रूबरू हुए हैं। इनमें वर्तमान शिक्षा, आर्थिक गैर बराबरी, धर्म निरपेक्षता आदि पर भी विचार विमर्श हुआ है साथ ही मार्क्स, गांधी, अम्बेडकर और लोहिया जैसे विचारकों के मन्तव्यों का भी गहराई से विश्लेषण किया गया है। इनमें जाने माने साहित्यकार रत्नाकर पाण्डे, राजेन्द्र यादव, शिव कुमार मिश्र, लाल बहादुर वर्मा, संतोष चौबे, सुरेन्द्र मोहन, रामशरण जोशी, पंकज बिष्ट, कमला प्रसाद, असगर अली इंजीनियर, एम.एस. अगवानी, विभूति नारायण राय, स्वयं प्रकाश, रमणिका गुप्ता, सुनीलम, प्रभाष जोशी, अजेय कुमार, रघु ठाकुर जैसे बुद्धिजीवी, लेखक, पत्रकार एवं समाजकर्मी भाग ले चुके हैं। नन्द चतुर्वेदी, वेद व्यास, सुरेन्द्र पण्डित, नरेश भार्गव, शंकर लाल चौधरी, प्रमिला सिंघवी, सुधा चौधरी, गोपाल सहर जैसे लेखक तो न केवल स्थायी संभागी बल्कि एक तरह से आयोजक के बतौर इससे जुडे़ हुए हैं। इन नामों की सूची यहां इसलिये दी गई है ताकि यह पता लग सके कि दोनों तरह के जमावड़ों में किस तरह के विशिष्ट लोगों ने भाग लिया है और रचना कर्म तथा वैचारिक क्षेत्र और जनान्दोलन में उन्होंने कितना योगदान दिया है। जाहिर है कि ये वे लोग नहीं हैं जो वर्तमान व्यवस्था की जी हजूरी करते हैं और इसे बनाये रखने के लिये आम लोगों के दुख दर्द को नजरन्दाज करते रहते हैं। इसीलिये ये व्यवस्था के दुलारे नहीं हैं। मीडिया के चमकते सितारे नहीं हैं और बाजार के लिये विशेष मूल्यवाले नहीं हैं। जहां फेस्टिवल की चर्चा दिन रात मीडिया पर होती रही वहीं इस सम्मेलन को लोकल मीडिया ने भी बड़ी अनिच्छा के साथ प्रकाश में लाने योग्य माना।

इस बार का बारहवां लेखक सम्मेलन 27, 28, 29 जनवरी को हुआ। इसके लिये विचारणीय विषय था- हाशिये के लोग: हाशिये की संस्कृति। इसे विभिन्न सत्रों में इस प्रकार बांटा गया था। 1. गैर बराबरी के आयाम विकास और सीमान्तीकरण, सीमान्तीकरण दासता, गरीबी और सामन्ती शोषण, 2. सीमान्तीकरण की संस्कृति, जीवन शैली के मूल्य, आदिवासी दलित और घूमंतू समुदाय का सीमान्तीकरण। 3. लोकतन्त्र और हाशिये की आवाजें, भूमण्डलीकरण, उदारीकरण बनाम हाशियाकरण, 4. असंगठित श्रमिक, धूमन्तू समुदाय और सामाजिक न्याय, हाशिये के समुदायों की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति, 5. प्रतिरोध की रणनीति और कार्यभार। प्रमुख विषय के इन बिन्दुओं पर विस्तार से चर्चा हुई और सभी सत्रों में उल्लेखनीय उपस्थिति रही। खास बात यह थी कि यहां सभी श्रोता ऐसे थे जो वक्ताओं को सुनने आये थे। और उनके साथ अपने विचार शेयर करने आये थे। फेस्टीवल की तरह यहां ऐसी हस्तियां नहीं जुड़ी थीं जो अपने रचनात्मक या वैचारिक योगदान की बजाय अन्य प्रकार का ग्लेमर रखती हो। इसलिये लोग उन्हें देखने अधिक सुनने कम आये थे। यहां डिग्गी हाउस में जुड़ी भीड़ की तुलना में निश्चय ही लोगों की उपस्थिति तो कम थी लेकिन जो थी उससे पता लगता है कि लोग अब भी साहित्य को महज मनोरंजन की बजाय एक ऐसा अस्त्र मानते हैं जो सत्ता को झुका सकता है और व्यवस्था परिवर्तन के लिये तैयार कर सकता है।


 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
सुरेश पण्डित
जाने माने साहित्यकार, लेखक पत्रकार व समाजकर्मी है। इन्होंने राजकीय विद्यालय में विभिन्न शहरों में अंग्रेजी का अध्यापन कार्य किया।राजकीय सेवा से मुक्त होने के बाद आप लगातार अध्ययन व लेखन में व्यस्त रहे। राजस्थान के अलवर शहर ही नहीं पूरे देश की पत्र पत्रिकाओं में आपके लेख प्रकाशित होते रहते हैं। शिक्षा पर विशेष लेख लिखे तथा आपकी कुछ पुस्तकें भी प्रकाशित हुई। महावीर समता सन्देश में आपके आलेख लगातार छपते रहते है तथा सवर्त्र सराहे जाते है।समता लेखक सम्मेलन में अपना 2003 से लगातार भाग लेते रहे हैराष्ट्रीय समता सम्मान मिल चुका है 

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