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'युवानीति' द्वारा सांस्कृतिक जनोत्सव अभियान की शुरुआत

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on रविवार, फ़रवरी 19, 2012 | रविवार, फ़रवरी 19, 2012


(आज 19 feb 2012 को जसम की गीत नाट्य इकाई युवानीति ने आरा में उसी जवाहरटोला  की मुसहर टोली  से अपने जनोत्सव अभियान की शुरुआत की, जहाँ से 34 साल पहले उसने अपना सफ़र आरंभ किया था. इस मौके पर एक काव्यगोष्ठी भी आयोजित की गयी जिसमें कवि भोला जी, सुरेश कांटक, हीरा ठाकुर, सुमन कुमार सिंह, राकेश दिवाकर,  जितेन्द्र कुमार आदि ने अपनी कविताओं का पाठ किया. इस मौके पर जनता के कवि भोला जी को उनके कविकर्म के लिए युवानीति-जसम और आरा शहर के नागरिकों की ओर से सम्मानित किया गया. आयोजन में युवानीति के नाटक 'नौकर' की प्रस्तुति भी हुई और  शाम में चेतन आनंद की मशहूर फिल्म 'नीचा नगर' और बीजू टोपो व मेघनाथ के वृतचित्र 'विकास बन्दूक के नाल से' का प्रदर्शन हुआ. युवानीति ने लगभग हर सप्ताह इस तरह के आयोजन पूरे शहर में करने का निर्णय लिया है. ट्रेन रद्द होने के कारण मैं इस प्रोग्राम में शामिल नहीं हो पाया.-सुधीर सुमन )


कवि भोला के अभिनंदन

यह ऐतिहासिक मौका है कि युवानीति आज उसी मुहल्ले में नाटक करके अपने नए अभियान की शुरुआत कर रही है, जहां से उसने चौतीस साल पहले कथाकार मधुकर सिंह की कहानी ‘दुश्मन’ के मंचन के साथ अपने सफर का आरंभ किया था। इस बार वह नाटक के साथ कविता और फिल्मों को लेकर भी आई है। फिल्में भी ऐसी जो आम तौर पर सिनेमा हॉल और टीवी पर नजर नहीं आतीं, पर जो जनता के हित में हैं और उसकी बदहाली के वजहों की शिनाख्त करती हैं। जो जनता की जिंदगी को बदल देने का रास्ता बताती हैं। और कविता की वही पंरपरा है जिसे रमता जी, नागार्जुन, गोरख पांडेय, विजेंद्र अनिल, अकारी जी, नरायण कवि आदि ने गढ़ा है, जो कविता गरीब-मेहनतकश जनता के संघर्षों की ऊर्जा और बुनियादी बदलाव के संकल्प से लैस है। भोला कवि की जिंदगी की जद्दोजहद ने इसी परंपरा में उन्हें अपनी मुक्ति की तलाश के लिए प्रेरित किया है। आज यह सुखद संयोग है कि इस आयोजन में युवानीति-जसम और आरा शहर के नागरिकों की ओर से उनके कविकर्म के लिए उन्हें सम्मानित किया जा रहा है। 

मैं और युवानीति के पूर्व सचिव सुनील सरीन ट्रेन के रद्द हो जाने के कारण इस आयोजन में शामिल नहीं हो पाए हैं। बेशक इस वक्त हम देश की राजधानी दिल्ली में हैं.लेकिन आज हमारी निगाह अपने आरा शहर के इस छोटे से मुहल्ले पर लगी हुई है, जहां जनता के सांस्कृतिक-राजनीतिक और सामाजिक जीवन को बदलने की जद्दोजहद चल रही है.भोला जी की कविताएं क्या हैं, आम जनता का दुख-दर्द ही तो है उनमें, जनता की जिंदगी में बदलाव के लिए जो लंबा संघर्ष चल रहा है, जो उसकी आजादी, बराबरी और खुदमुख्तारी का संघर्ष है, उसी के प्रति उम्मीद और भावनात्मक लगाव का इजहार ही तो है उनकी कविताएं। उन्होंने कोई पद-प्रतिष्ठा और पुरस्कार के लिए तो लिखा नहीं। जिस तरह कबीर कपड़ा बुनते हुए, रैदास जूते बनाते हुए कविताई करते रहे, उसी तरह भोला पान बेचते हुए कविताई करते रहे हैं। भोला आशु कवि हैं यानी ऐसे कवि जो तुरत कुछ पंक्तियां गढ़के आपको सुना देते हैं। महान कवियों के इतिहास में शायद भोला का नाम दर्ज न हो पाए, पर जिस तरह इतिहास में बहुसंख्यक जनता का नाम भले नहीं होता, लेकिन वह बनता उन्हीं के जरिए है, उसी तरह भोला की कविताएं भी हैं। वे आरा काव्य-जगत की अनिवार्य उपस्थिति रहे हैं। जसम के पहले महासचिव क्रांतिकारी कवि गोरख पांडेय की याद में हर साल होने वाले नुक्कड़ काव्यगोष्ठी ‘कउड़ा’ के आयोजन में भोला जी का उत्साह देखने लायक होता है। हमने देखा है कि जब भी उन्हें कार्यक्रमों में बोलने का मौका मिला है, वे कम ही शब्दों में बोलते रहे हैं, पर हमेशा उनकी कोशिश यह रही है कि कुछ सारतत्व-सा सूत्रबद्ध करके रख दें। और ऐसे मौके पर अक्सर लोग उनकी कुछ ही पंक्तियों के वक्तव्य पर वाह, वाह कर उठते रहे हैं।

भोला को मैं अपने बचपन से नवादा थाने के इर्द-गिर्द ही पान की गुमटी लगाते देख रहा हूं। वहीं बैठकर वे गरीब-मेहनतकशों पर जुल्म ढाने वाले थाने और कोर्ट को उड़ाने और जलाने की बात करते रहे हैं, बेशक व्यावहारिक तौर पर नहीं, जुबानी ही सही, पर इन संस्थाओं के प्रति जनता का जो गहरा गुस्सा है, वह तो इसके जरिए अभिव्यक्त होता ही रहा है। कितनी बार उन्हें प्रशासन के अतिक्रमण हटाओ अभियान के कारण वहां से हटना पड़ा, पर बार-बार वे वहीं आकर जम जाते रहे। उनका पान दूकान आरा में जनसंस्कृति और जनता की राजनीति से जुड़े लोगों के मेल-मिलाप का अड्डा रहा है। और वे खुद भी तो शहर में भाकपा-माले के हर आंदोलन और अभियान का अनिवार्य अंग रहे हैं। वे उन समझदार लोगों में नहीं हैं, जो सिर्फ अपनी और अपने घर-परिवार की ही जिंदगी को बदलने में लगे रहते हैं, बल्कि वे उनकी कतार में रहे हैं, जो सबकी जिंदगी को बदलते हुए अपनी जिंदगी को बदलना चाहते हैं। भले व्यंग्य में कभी उन्होंने खुद पर बेवकूफ पान वाले का लेबल लगा लिया था, पर वे पढ़े-लिखे और अपने ही निजी स्वार्थ की दुनिया में खोये रहने वाले समझदारों में से नहीं हैं, बल्कि उन समझदारों में से हैं जिनके लिए रमता जी ने कहा था कि राजनीति सबके बूझे के बुझावे के पड़ी, देशवा फंसल बाटे जाल में छोड़ावे के पड़ी। भोला जी शहर में माले और जसम की गतिविधियों मे शिरकत करते रहे उन्होंने महसूस किया है कि गरीबों की पीड़ा खत्म ही नहीं हो रही है। आप इसी गीत को देख लीजिए-

कवन हउवे देवी-देवता, कौन ह मलिकवा
बतावे केहू हो, आज पूछता गरीबवा
बढ़वा में डूबनी, सुखड़वा में सुखइनी
जड़वा के रतिया कलप के हम बितइनी
करी केकरा पर भरोसा, पूछी हम तरीकवा 
बतावे केहू हो, आज पूछता गरीबवा

बल्कि अपनी पान की दूकान पर बैठकर उनकी सरकार की भी आलोचना की। जिंदगी भर वे किराये के घर में रहे, बाल-बच्चों के लिए जितना करना चाहिए था, उतना कर नहीं पाए, लेकिन वे अपनी मुश्किलों के हल के लिए किसी देवी-देवता के शरण में नहीं गए और ना ही मुश्किलों के कारण निराशा में डूबे। उनकी कविता में भी गरीब तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद सवाल पूछता है और यह सवाल पूछना ही उनकी कविता और व्यक्ति दोनों की ताकत है। मुझे जनमत के पुराने अंक में पढ़ी हुई ‘मैं आदमी हूं’ शीर्षक की उनकी एक कविता याद आती है, जिसमें उन्होंने मेहनतकश मनुष्यों की जुझारू शक्ति, शान और सौंदर्य के बारे में लिखा था। इतना ही नही, भोला ने जाने-अनजाने हमें यह सिखाया कि गरीब-मेहनतकश आदमी की निगाह से देखने से ही शासन-प्रशासन के दावों और समय का असली सच समझ में आ सकता है। ‘पढ़निहार बुड़बक का जनिहें, का पढ़ावल जा रहल बा’ कविता इसी की तो बानगी है, जिसमें वे अखबार की खबरों पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि नीचा को ऊंचा और ऊंचा को नीचा बताया जा रहा है, जिन्हें शरीफ कहा जा रहा है, दरअसल लोगों की निगाह वे लुच्चे हैं। उसी कविता में आगे वे कहते हैं गरीबन के कइसे गारल जा रहल बा। अपनी आवाज के जरिए वे बकायदा गारने ( कसकर निचोड़ने) की प्रक्रिया को भी व्यक्त करते हैं।

मुझे जनमत में ही सितंबर 87 में छपी भोला जी की एक और कविता की याद आती है- जान जाई त जाई, ना छूटी कभी/ बा लड़ाई इ लामा, ना टूटी कभी (जान जाए तो जाए, पर न छूटेगी कभी/ है लंबी लड़ाई जो नहीं टूटेगी कभी)। और इस लंबी लड़ाई में यकीन के बल पर ही भोला आज दो टूक कहते हैं- जनता के खीस (गुस्सा), देखिंहे (देखेंगे) नीतीश। भोला जानते हैं कि यह लड़ाई लंबी है और इस लंबी लड़ाई में दुश्मनों और दोस्तों की पहचान लगातार होनी है। जिस तरह गरीब जनता सरकार और प्रशासन के नस-नस को जानती है, उसी तरह भोला भी उन्हें जानते-समझते हैं। उनके पैमाने से अफसर और मच्छड़, हड्डा और गुंडा, नेता और कुत्ता एक ही हैं। अब नेता तो जनता के संघर्ष के भी होते हैं, पर उनके लिए उनका पैमाना अलग है, यहां तो नेता साथी होते हैं। तभी तो 1987 की कविता में उन्होंने लिखा कि ‘साथ साथी के हमरा ई जबसे मिलल/ नेह के ई लहरिया, ना सूखी कभी।’ और यह नेह कभी नहीं खत्म नहीं हुआ। आज भी वे उसी लगाव से कहते हैं-

तोहरा नियर केहू ना हमार बा
मनवा के आस विश्वास मिलल तोहरा से
तोहरे से जुड़ल हमार जिनिगी के तार बा।

अस्वस्थता के कारण भले ही उनका शरीर कमजोर हो गया है, पर जिनिगी का तार पहले की तरह ही मजबूत है। सलामत रहे भोला का गोला यानी उनकी कविताओं की पुस्तिकाएं। सलामत रहे उनका लाल झोला और उसमें रखा उनका हथौड़ा, जिसके बल पर वे जनता के दुश्मनों से फरिया लेने का हौसला रखते रहे है।

कवि भोला की भोजपुरी रचनाएं और उनका हिंदी अनुवाद 

१-तोहरा नियर केहू ना हमार बा

तोहरा नियर केहू ना हमार बा
देखला प अंखिया से लउकत संसार बा
मनवा के आस विश्वास मिलल तोहरा से
जिनिगी के जानि जवन खास मिलल तोहरा से
तोहरे से जुड़ल हमार जिनिगी के तार बा
देखला प अंखिया से लउकत संसार बा
हेने आव नाया एगो दुनिया बसाईं जा
जिनिगी के बाग आव फिर से खिलाईं जा
देखिए के तोहरा के मिलल आधार बा
देखला प अंखिया से लउकत संसार बा
दहशत में पड़ल बिया दुनिया ई सउंसे
लह-लह लहकत बिया दुनिया ई सउंसे
छोड़िं जा दुनिया आव लागत ई आसार बा

(आप सब के जैसा कोई और हमारा नहीं है
आंख से देखने से सारा संसार दिखता है
मन को आशा और विश्वास आप ही से मिला है
जिंदगी को खास जान आप ही से मिला है
आप ही से मेरी जिंदगी का तार जुड़ा है
आंख से देखने से सारा संसार दिखता है
इधर आइए एक नई दुनिया बसाई जाए
जिंदगी के बाग को फिर से खिलाया जाए
आपको देखके ही मुझे आधार मिला है
आंख से देखने से सारा संसार दिखता है
यह सारी दुनिया दहशत में पड़ी हुई है
यह दुनिया लह-लह लहक रही है 
इस दुनिया को छोड़के आइए, यही आसार लग रहा है)

२-जान जाई त जाई

जान जाई त जाई, ना छूटी कभी
बा लड़ाई ई लामा, ना टूटी कभी
रात-दिन ई करम हम त करबे करब
आई त आई, ना रुकी कभी
बा दरद राग-रागिन के, गइबे करब
दुख आई त आई, ना झूठी कभी
साथ साथी के हमरा ई जबसे मिलल
नेह के ई लहरिया, ना सूखी कभी

5सितंबर, 87 समकालीन जनमत में प्रकाशित

(जान जानी है तो जाए, पर नहीं छूटेगी कभी
यह लड़ाई तो तो लंबी है, नहीं टूटेगी कभी
रात-दिन यह कर्म तो हम करेंगे ही करेंगे
आना होगा तो आएगा ही, नहीं रुकेगा कभी
यह दर्द है राग-रागिनी का, जिसे गाऊंगा ही
साथी का यह साथ मुझे जबसे मिला है
स्नेह की यह लता तो नहीं कभी सूखेगी नहीं) 

३-आज पूछता गरीबवा

कवन हउवे देवी-देवता, कौन ह मलिकवा
बतावे केहू हो, आज पूछता गरीबवा
बढ़वा में डूबनी, सुखड़वा में सुखइनी
जड़वा के रतिया कलप के हम बितइनी
करी केकरा पर भरोसा, पूछी हम तरीकवा 
बतावे केहू हो, आज पूछता गरीबवा
जाति धरम के हम कुछहूं न जननी
साथी करम के करनवा बतवनी
ना रोजी, ना रोटी, न रहे के मकनवा
बतावे केहू हो आज पूछता गरीबवा
माटी, पत्थर, धातु और कागज पर देखनी
दिहनी बहुते कुछुवो न पवनी
इ लोरवा, इ लहूवा से बूझल पियसवा
बतावे केहू हो आज पूछता गरीबवा।

( कौन है देवी-देवता और कौन है मालिक
कोई बताए, आज यह गरीब पूछ रहा है।
बाढ़ में डूबे, सुखाड़ में सुखाए
जाड़ों की रातें कलप के बिताए
करें किस पर भरोसा, पूछें हम तरीका
कोई बताए, आज यह गरीब पूछ रहा है।
जाति-धरम को हमने कुछ नहीं जाना
साथी कर्म के कारणों को बताए
न रोजी है, न रोटी और न रहने का मकान
कोई बताए, आज यह गरीब पूछ रहा है।
मिट्टी, पत्थर, धातु और कागज पर देखे
उसे दिए बहुत, पर कुछ भी नहीं पाए
आंसू और खून से अपनी प्यास बुझाए
कोई बताए, आज यह गरीब पूछ रहा है।)


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

सुधीर सुमन
सदस्य,
राष्ट्रीय  कार्यकारिणी,
जन संस्कृति मंच 
s.suman1971@gmail.com
मो. 09868990959
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