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डॉ. रेणु व्यास का आलेख:-मौन ही श्रेष्ठ है

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on बुधवार, फ़रवरी 15, 2012 | बुधवार, फ़रवरी 15, 2012


(आकाशवाणी चित्तौड़गढ़ से डॉ. रेणु व्यास का पूर्व में प्रसारित ये आलेख यहाँ पाठक हित में साभार छाप रहे हैं.-सम्पादक )

भर्तृहरि ने ‘नीतिशतक’ में लिखा है - ‘‘मौनं मूर्खस्य भूषणम्’’। मौन मूर्ख का आभूषण है, अर्थात् मौन ही वह आच्छादन है जिससे मूर्ख अपनी मूर्खता को ढंके रख सकता है, ऐसी मूर्खता को, जो वाणी के जरिए कभी भी प्रकट होकर उसे सभा में हास्यास्पद बना सकती है। मौन का यह रक्षात्मक उपयोग मौन की महिमा को पूरी तरह से व्यंजित नहीं करता। मौन साधकों की साधना भी है और योगियों का योग भी। किसी इमारत का कंगूरा इठलाता, इतराता अपनी शोभा का जयगान भले कर ले, वह टिका हुआ जिस नींव की ईंट पर है, वह मौन रहते हुए भी कंगूरे समेत पूरी इमारत का बोझ उठाए रहती है, उसकी महिमा लोक में अनसुनी नहीं रहती। 

आज का युग कानफोड़ कोलाहल का युग है। हर तरफ मशीनों का शोर, वाहनों की धड़धड़ाहट और बढ़ती ही जाती जनसंख्या। आपाधापी में हर इंसान को अपनी ही बात सुनाने की जल्दी है, बिना इस बात की परवाह किये कि उसे कोई सुन भी रहा है या नहीं ? दुर्भाग्य की बात है कि आज ‘मौन’ मात्र श्रद्धांजलि-स्वरूप रखे जाने वाले ‘दो मिनिट के मौन’ के रूप में ही पहचाना जा रहा है। ऐसी परिस्थिति जब ध्वनि-प्रदूषण अपने सुरक्षित मानदंडों को पर कर सहनशीलता की सीमा को भी लांघने लगा है, तब मौन और अधिक महत्त्वपूर्ण हाकर उभरा है, क्योंकि मौन मन और आत्मा की भाषा है और यही आज के युग में सर्वाधिक उपेक्षित हैं -

‘‘तुमुल कोलाहल कलह में 
मैं हृदय की बात रे मन’’

पेड़ बिना बोले अपनी टहनियों से, पत्तियों से हवा के चलने की दिशा के साथ-साथ बासंती हवा की मस्ती, पतझड़ की शुष्कता और बारिश की स्निग्धता हमें संप्रेषित कर देते हैं। फूल बिना बोले अपने शोख रंगों और खुशबू से हमें आकर्षित करते हैं। हिरण, गाय, गिलहरी जैसे बेजुबान जानवर भी बिना बोले भी अपने भाव अभिव्यक्त कर सकते हैं; यह जानने के लिए महादेवी वर्मा के जैसा संवेदनशील हृदय चाहिए एवं सीता और शकुंतला की तरह उनसे साहचर्य-जन्य लगाव। प्रकृति का कण-कण अपनी मूक भाषा में अपनी कहानी सुना सकता है, बशर्ते कि हम इस कोलाहलपूर्ण जगत् में उसके मौन को समझने की संवेदनशीलता अर्जित करें। 
शाब्दिक अभिव्यक्ति मनुष्य की अर्जित क्षमता है, किन्तु मौन की भाषा उसकी प्राकृतिक अभिव्यक्ति। कहा भी गया है कि ईश्वर मौन प्रार्थनाएं सबसे पहले सुनता है, क्योंकि वे आडंबर से रहित होती हैं। ये सच्चे हृदय से निकलती हैं और सीधे ईश्वर तक पहुंचती हैं।  

रवीन्द्रनाथ टैगोर की एक कविता का है -

‘हे सागर तेरी भाषा क्या है ?’
‘अनन्त प्रश्न की भाषा’
‘हे आकाश, तेरे उत्तर की भाषा क्या है ?’
‘अनन्त मौन की भाषा।’

जिस प्रकार सागर द्वारा गरज-गरज कर पूछे गये अनन्त प्रश्नों का समाधान आकाश अपने एकमात्र अस्त्र - ‘मौन’ से कर देता है, उसी प्रकार मौन अनेक मर्जों की एकमात्र दवा है। भगवान बुद्ध से जब उनके शिष्य आनन्द ने पूछा कि भगवन्! जगत् क्या है ? आत्मा क्या है ? ईश्वर क्या है ? तो भगवान बुद्ध का मौन ही इन प्रश्नों का सबसे उपयुक्त उत्तर था। सृष्टि के मूल तत्त्व, आत्मा और ईश्वर से संबंधित जिन प्रश्नों पर हजारों वर्षों के वाद-विवाद के बाद भी भारतीय दार्शनिक ‘नेति, नेति’ कहने को बाध्य हुए और पाश्चात्य दार्शनिक ह्यूम अज्ञेयवाद और संदेहवाद के भंवर में जा फंसे, उस समस्या का कितना आसान समाधान भगवान बुद्ध के एक मौन ने कर दिया ! 

संत कबीर ने भी परब्रह्म की सत्ता को अव्याख्येय मानते हुए समाधि के सुख को ‘गूंगे का गुड़’ अर्थात् ‘मौन’ से ही अभिव्यक्त किया -

‘‘पारब्रह्म के तेज का कैसा है उनमान
कबिे को सोभा नहीं, देख्यां ही परमान’’
  
तुलसीदास जी ने भी ‘गिरा अनयन, नयन बिनु बानी’ कहकर भाषिक अभिव्यक्ति की सीमा बतलाई है। जहां पहुंच कर भाषिक अभिव्यक्ति लाचार हो जाती है, वहां मौन की महिमा आरंभ होती है।

महात्मा गांधी से जब उनका संदेश पूछा गया तो उन्होंने लम्बे-चौड़े भाषण के बजाए एक वाक्य कहा - ‘‘मेरा जीवन ही मेरा संदेश है’’। यह मौन की महिमा ही है कि उनके मौन आचरण से दुनिया ने समझ लिया कि गांधी जी क्या कहना चाहते हैं ? गांधी जी जब नमक कानून दांडी यात्रा पर निकले तो देशी-विदेशी मीडिया समेत सरकारी हलके में भी इसका उपहास हुआ कि एक मुठ्ठी नमक से क्या होना है ? मगर दांडी के समुद्र तट पर बापू द्वारा उठाये गये एक मुठ्ठी नमक ने विदेशी सरकार की नींव हिला दी; यह भी मौन की महिमा थी। यहां ‘मौन’ से तात्पर्य केवल गांधी जी के मौन-व्रत या मितभाषण नहीं है, बल्कि पूरे भारत-राष्ट्र के व्यापक मौन से है, जिसने ‘नमक कानून’ को तोड़कर विदेशी पराधीनता से मुक्ति पाने की अपनी आकांक्षा को अभिव्यक्ति दी।   

रहीम का एक प्रसिद्ध दोहा है -
‘‘रहिमन चुप व्है बैठिये देखि दिनन का फेर।
जब नीके दिन आइहें बनत न लागिहें देर।।’’ 

विपरीत परिस्थिति में लाचार होकर चुप होकर बैठ जाना ‘मौन’ नहीं है। ‘चुप’ केवल वाणी का निरोध है, किन्तु ‘मौन’ केवल वाणी का निरोध नहीं है; यह मन की समस्त वृत्तियों का अनुशासन है। कहा गया है - ‘‘योगश्चित्तवृत्ति-निरोधः’’। अतः ‘मौन’ भी एक योग है। कौरव-राजसभा में द्रौपदी के चीर-हरण के समय भीष्म, द्रोण, धृतराष्ट्र का किंकर्तव्य-विमूढ़ होना ‘चुप’ है, कायरता है, ‘मौन’ नहीं। ‘मुक्तिबोध’ ने ‘अंधेरे में’ कविता में अन्यायी के बरक्स रक्तपायी वर्ग से नाभिनालबद्ध स्वार्थी बुद्धिजीवी वर्ग की इसी संकीर्ण स्वार्थभरी कायर चुप्पी को संकेतित किया है -

‘‘सब चुप, साहित्यिक चुप और कविजन निर्वाक्
चिंतक, शिल्पकार, नर्तक चुप हैं;

दिनकर लिखते हैं कि चुपचाप अन्याय सहना अन्याय करने के बराबर का पाप है -

‘‘समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध’’  
अतः अन्याय के विरोध में सक्रिय होना आवश्यक है।

दीपक को अंधकार से लड़ने के लिए किसी भाषणबाजी की जरूरत नहीं है। उसका जलना ही अपने आप में पर्याप्त है। इस आत्म-बलिदान का गुणगान दीपक को स्वयं नहीं करना पड़ता, उसकी रोशनी में राह देखने वाले पथिक अपनी मंज़िल पर पहुंच जाएं, यही उसकी सफलता है और सार्थकता भी। पथिकों की लक्ष्य-प्राप्ति स्वयं दिये का यशोगान है।

कालिदास ने अपनी किसी भी कृति में अपने मूल नाम, अपने जन्म-स्थान या जीवन के बारे में बिलकुल मौन हैं। इन्होंने अपनी पहचान और स्थिति का कोई चिह्न नहीं छोड़ा, किन्तु ‘मेघदूत’, ‘रघुवंश’, ‘कुमारसंभव’ और ‘अभिज्ञानशाकुंतलम्’ का रचयिता अपने नाम या जन्म-स्थान से नहीं, अपनी कृतियों से पहचाना गया; पहचाना ही नहीं गया, अमर हो गया। ‘कवियों के कवि’ शमशेर लिखते हैं -

‘‘बात बोलेगी
हम नहीं
भेद खोलेगी
बात ही’’

आज की कविता में शब्द तो महत्त्वपूर्ण हैं ही, किन्तु उनके बीच का मौन, उनके बीच का रिक्त-स्थान भी उतना ही अधिक महत्त्वपूर्ण है। अज्ञेय की कविताओं में और मोहन राकेश के ‘आधे-अधूरे’ नामक नाटक में इसे सबसे अधिक प्रभावी रूप से महसूस किया जा सकता है। जयशंकर प्रसाद ने ‘कामायनी’ में ‘एक करुणामय सुंदर मौन’ की पंक्ति रचकर न केवल एक अछूती उपमा दी है, बल्कि मौन को सजीव और साकार कर दिया है। इस पंक्ति में हमें वह कसौटी मिलती है जिस पर हम अपने-अपने मौन को कस कर जांच सकते हैं कि क्या वह समस्त जगत् के दुखी, संतप्त, दलित और शोषित प्राणियों के लिए करुणामय है ? क्या वह मौन इस तरह से सुंदर है, जो इस संसार को ‘सत्यम्, शिवम् सुंदरम’ का आदर्श पाने में सहायक हो सके ? यदि वह मौन ऐसा नहीं है, तो वह ‘मौन’ - नामधारी चुप्पी है, जो भीरुता का, कायरता का पलायन का दुर्बलता का दूसरा नाम है।


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
डॉ.रेणु व्यास
हिन्दी में नेट चित्तौड़शहर की युवा प्रतिभा,इतिहासविद ,विचारवान लेखिका,गांधी दर्शन से जुड़ाव रखने वाली रचनाकार हैं.वे पत्र-पत्रिकाओं के साथ ही रेडियो पर प्रसारित होती रहीं हैं,उन्होंने अपना शोध 'दिनकर' के कृतित्व को लेकर पूरा किया है.
29,नीलकंठ,सैंथी,
छतरीवाली खान के पास,
चित्तौडगढ,राजस्थान 
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