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'' हर सच्ची कविता असमानता और शोषण का विरोध करती है।''-डॉ.सुधा उपाध्याय

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on मंगलवार, मार्च 06, 2012 | मंगलवार, मार्च 06, 2012


                  अस्सी घाट का बांसुरी वालाक्रांति का पाञ्चजन्य  

सच्चे अनुभवों की सच्ची अनुभूति ही कविता है। हर सच्ची कविता अपने समय और समाज में पसरी असमानता और शोषण का विरोध करती है। हम जिस बिडंवनाग्रस्त समाज में सांस ले रहे हैं उसमें अंतर्विरोध और विकृतियां बढ़ती जा रही हैं। ऐसे में सह्दय समाज की प्रतिबद्धता और बढ जाती है। तजेन्दर लूथरा की क्रांति का पाञ्चजन्य संघर्ष की एक नई ज़मीन तैयार करती हैं। फिर उसे यूं ही नहीं छोड़ती बल्कि प्रतिरोध का बीज भी बो कर आती हैं। यही इन कविताओं की सच्चाई भी है। सत्ता और तंत्र के तिलिस्म को तोड़ने के लिए इनका सृजन समय और समाज में दबे छिपे चुप पड़े आत्महनन पर उतारु मध्यमवर्गीय समाज का सारा सच उगल देती हैं।

क्रांति का आह्वान करती ये कविताएं उसी बांसुरीवाले के हैं जो लगभग प्रत्येक कविता एक आंतरिक धुन समेटे हुए है....जीत भले न पाऊं पर चलूंगा लेकिनकोशिश करूंगा लेकिन....‘’अस्सी घाट का बांसुरीवाला कविता प्याज की परतों सी और अधिक अर्थवती होकर खुलती है। इसकी पहली ही पंक्ति से जाहिर है कि मात्र कविताई करना तेजेंदर का उदेश्य नहीं। कविता के माध्यम से ऊबड़ खाबड़ व्यवस्था में क्रांतिकारी अंदाज में कुछ ज़रूरी फेरबदल इनकी रचनाधर्मिता है। कविता शुरू होती है---इसे कहीं से भी शुरू किया जा सकता है....अस्सी घाट का बांसुरी वाला स्पंदन के रूप में अपनी पहचान बनाता पूरे परिवेश से अपने सरोकार जोड़ बैठता है। किसी उम्मीद की तरह बज उठती है बांसुरी की तान। आस्था का इतना चमत्कारिक रूप पहले कभी नहीं पाया था। जहां पूरी अलमस्ती में वह बांसुरी वाला अपनी ही नहीं दूसरों की सुध बुध भी बिसार देता है। 

युग के अनुरूप जैसे पौराणिक आरती की धीरे-धीरे मन्तव्य बदलने लगता है और वह पंक्ति शरण पड़ूं में किसकी’ क्रांति का पाञ्चजन्य सी लगती है। जैसे इस पंक्ति में युग परिवर्तन या कह लें क्रांति का आवाह्न है। लगता है सभी देवी देवता एक साथ प्रकट होकर प्रलय की ओर बढ़ती हुई सृष्टि को बचा लेना चाहते हों। गंगा पुनजीवित हो उठती है। मंत्र सुरीले हो जाते हैं। नंग धड़ंग कुम्हलाए बच्चे अपने अभाव का भाव विस्मृत कर गोरे चिट्टे हो जाते हैं। क्रांति की बांसुरी बजते ही पूरी परिदृष्य बदल जाता है....आरती क्रांति गीत में बदल गई / तो ईश्वर से आंखे मिलाने लगा / सीधे-सीधे टेढ़े सवाल पूछने लगा….पर उस बांसुरी वाले की तरह ही तजेन्दर का यह सपना भी धीरे से बदल गया। आज़ादी मिलने के बाद भी हम फिर किस इंकलाब की प्रतिक्षा में हैं। क्या सचमुच वह सपना पूरा हुआक्या विचार परिवर्तन के लिए हम सही उपाय जुटा सकेवह साधारण बांसुरी वाला क्या संदेश लेकर आया था और क्यों निराश होकर पलट गयाऐसे कई निरूत्तर प्रश्न तेजेंदर सह्दय समाज के लिए छोड़ देते हैं।

तजेन्दर हर निहत्थे निपट अकेले बल्कि कहूंगी सत्ता और व्यवस्था से जूझते व्यक्ति को अपना कांधा देते चलते हैं। इन कविताओं से गुजरते हुए मुझे यह भी पता चला कि तेजेंदर की कविताएं केवल उन्हीं का साथ देती हैं जो कहने का जोखिम उठाते हैं और अपने मोर्चे की लड़ाई खुद लड़ते हैं। जो कर्तव्यों का ही नहीं अधिकारों के प्रति भी सचेत हैं। तजेन्दर की कविताओं में लोकतांत्रिक व्यवस्था में मीडिया, प्रशासन, अध्यापक, वकील, पुलिस, अफसर, क्लर्क और हर वह जमात जो आधिकारिक तौर पर किसी न किसी संस्थान से जुड़ा है, की व्यथा कथा है। जो आदतन अपनी फर्ज अदायगी किए जा रहा है पूरी निष्ठा सच्चाई और ईमानदारी से अपनी ड्यूटी देने को प्रतिबद्ध है। पर उसकी गिनती एक कम महत्व वाला आदमी में होती है। व्यवस्था उसे खच्चर के अतिरिक्त कुछ भी नहीं समझती जो आदतन न केवल अपना बोझ बल्कि दूसरों के बोझ भी उठाने को तत्पर रहता है।

      यहां राजेश जोशी की इत्यादि कविता याद आ गई…‘इत्यादि बस कुछ सरफिरे कवियों की/कविता में अकसर दिख जाते थे’……गुस्ताखी माफ। तजेन्दर को मैं वैसा ही सरफिरा कवि मानती हूं जो यह कहने का साहस करता है--और एक दिन जब नहीं रहता/ये कम महत्व वाला आदमी/तो उसके तमाम सवाल उसकी झिझक उसकी शंका/उसकी पिछली पंक्ति उसका कोना/उसकी औडन, उतरन, बिछावन/उसकी पौना करवट, उसकी कटी छुट्टी/उसका टूटा खिसका समय/उससे भी कम महत्व वाले आदमी को/बड़े परोपकारी भाव से थमा दिया जाता है….वाह! कविता किसी भाषा की मोहताज नहीं होती और न ही संवेदना का कोई निश्चित व्याकरण होता है। पर यह भी सच है कि कविता भाषा में होकर ही बनती है। अततनाव की भाषा में कोई गद्य और पद्य का अंतर तलाशे तो असफल ही रह जाएगा। भीतर उतरने कि प्रक्रिया में ही मुझे ज़ार ज़ार होती मानवता, संबंधों की विश्रृंखलता, सत्ता और व्यवस्था की लाचारगी, संस्कारों और मूल्यों की मौत, समझौता परस्त सुविधाभोगी समाज की बिडंबना ही लगी। मुझे तो यह एकहरापन “सोच,रोशनी,संस्कार,दृढसंकल्प शक्ति  का एकहरापन लगा। जिसपर आज के समय और समाज की मान्यताएं, व्यावहारिकता, बहस, समझौता और सुविधा हावी होती दिखाई दी।

      मैं आभारी हूं  में एक प्रतिकार, प्रतिरोध, आक्रोश चीख रहा है। बल्कि इसलिए क्योंकि एक कर्तव्यनिष्ठ अफसर की झुंझलाहट भी है। जो बार-बार फैबिरीकेटेड लोगों से अपील करता है कि वे अपनी नपुंसकता, निस्संगता और तटस्थता त्यागकर सामाजिक जवाबदेही पहचाने। कोई शहीद अफसर अपनी शहादत का मोल नहीं करता। न प्रतिदान चाहता है। बल्कि अपने ईमानदार किंतु अभावग्रस्त जीवन का समर्पित, किंतु अपने-अपनों(परिजनों) की बेबसी का केवल जवाब मांगता है। ताउम्र वह जिनके लिए पूरी लगन से लड़ता जूझता रहा, जिनके अधिकारों की रक्षा के लिए प्रभुशक्तियों से भिड़ता रहा, आज दुर्दिन में वे सब केवल तमाशबीन होकर अपनी-अपनी चुप्पी साधे सुरक्षित खोहों में सिमटकर सैल्युट करने की रस्म अदायगी करते हैं। यहां समाज का तीनों तबका जवाबदेह है। सत्ता जो तमगे पहनाती है पुरस्कार बांटती है। बुद्धिजीवी जो बहस करने के अलावा कुछ नहीं करती। अनुभवजीवी, वह भी मूक रहकर तटस्थ भूमिका निबाहती है। इन तीनों को सामने पाकर प्रतिरोधस्वरूप तेजेंदर एक गुस्सा पाल पोस कर बड़ा करते हैं....ये तमाशाई बदलते क्यों नहीं /जीते जी मैं इनको भाता क्यों नहीं /मैं सचमुच अपना भाग्य विधाता क्यों नहीं….इसे पढ़कर रघुवीर सहाय याद आ गए----पर मैंने जाना कि यह समाज / विद्रोही वीरों का दीवाना है विरोध का नहीं।

अकेला हो जाऊं को लोग पर्सनल कह सकते है, लेकिन मैं तो इसे ग्लोबल अनुभूति कहूंगी। यह आइसोलेशन और एलिएशन की ख्वाहिश परिवेश की ही ऊपज है। सहकर्मियों का कृत्रिम व्यवहार, बनावटी अपनापन, रसीले खिचाव का दावा सब प्रपंच सा लगने लगे तब व्यक्ति अपनी प्रकृति(भीतर और बाहर) के साथ सहजता से जीना और रहना चाहता है। दुनिया और संबंधों की भीड़भाड़ दिमाग में खलल पैदा करती हैं। इस शांति की तलाश में यह एलिएशन और आइसोलेशन मन भावन हो जाता है।
      तेजी से सरकते समय और बीतते जीवन मूल्यों की आहट एक अन्य कविता बख्शीश में बनता क्या है’ में उपस्थित है। जिसमें….‘हक बोलती ज़ुबान/अधिकार मांगती आंखे/खड़े-खड़े पैरों के जोश से ठेलता रिक्शा है....सचमुच बड़ी तेजी से बदल रहे हैं जीवन मूल्य। एक समय बख्शीश देने वाला दूसरे ही समय भीगी बिल्ली सा खिसियाया झेंपता सोच में पड़ जाता है कि भला भाव से अभाव कब इतना बड़ा हो गया कि बख्शीश या आंखों की चमक बड़ी तेजी से तब्दील हो गई अधिकार की मांग में। न अब देने वाले के मन में अभिमान था न पाने वाले की आंखों में चमक।

       लुहार का डर पूरी व्यवस्था और ताकतवर मसीहाओं से जूझता है जो अपनी बनाई क्रांति की तलवार के समझौता परस्त हो जाने पर आशंकित है, प्रभु ताकतों का हथियार बन जाने पर शंकालु है। जो बनाई गई थी पराजय को काटने के लिए कहीं वह बेजुबानों के साहस को ही न काट डाले। धीरे-धीरे हल और कुदाल वालों का गला काटने का जो चलन है उस कूट योजना में शामिल न हो जाए..
ये कविताएं किसी समाधान की तलाश के बजाए अपने होने में ही सार्थक हैं। फिर यह भी सच है भोगे हुए यथार्थ को, वास्तविकता को बयान करने के लिए क्या ज़रूरी है कि ढूंढ ढांढ कर अवास्तविक प्रमाण जुटाए जाएं। एक साधारण शव यात्रा में एक कस्बे से बस थोड़े बड़े शहर की है जहां अब भी मानवीय संभावनाएं बची हैं। तमाम भागम भाग अफरा तफरी में तेज रफ्तारी महानगरों की तुलना में धर्मभीरु लोग छोटे कस्बों के लोग अपनी संवेदनाओं को ज़िंदा रखते हैं और ऐसा लगता है कि एक साधारण की शवयात्रा बड़े असाधारण तरीके से पूरे कस्बे पर छाई रहती है। हर किसी को यह लगता है कि जैसे यह दुर्घटना अपने ही घर में घटी हो कि जैसे यह शव अपने ही किसी का हो....
                 
      तीन पीढ़ियों की यात्रा एक दबा छिपा सा भय और भयंकर असुरक्षा की भावना से लबरेज एक कविता जगती है जैसे मां ठगी गई थी। एक बेटे की साधारण कोशिशें मां को छोड़ जाने की जद्दोजहद सबसे छूटकर छिटककर साहस में उठाए गए क़दम पूरे अनुभव संसार को बदल देते हैं। उसी बेटे की दूसरी पीढ़ी उसकी अपनी संतति जब उस दौड़ में शामिल होती है और अपने भविष्य के लिए नए पड़ाव ढूंढती है तो वही असहजता, वही बेचैनी, वही कमजोरी और असुरक्षा की भावना घेर लेती है। मां से बिछड़कर बेटा जीना सीख लेता है धीरे-धीरे पीड़ा मरने लगती है और जीने के नए बहाने में मिलने लगते हैं तब यात्रा के अंत में ठगे जाने का अहसास और पास न रहकर भी सदा साथ रहने का अहसास पूरी जीवन प्रक्रिया को बार-बार दोहराती है।

      तजेन्दर का अपना फलसफा है कि वे स्पर्धा में शामिल होना नहीं चाहते। लय तुक ताल विहीन इन कविताओं में न पिछड़ने का डर है न होड़ की जल्दी। अड़कर खड़े रहने का, कभी न बदलने का एक जज्बा भी है। क्योंकि कवि को नफरत है ऐसे लोगों से जो सार्थक होने से पहले सफल हो जाना चाहते हैं....अब दो ही विकल्प बचे हैं मेरे पासया तो यहीं खड़ा रहूं अड़करजो भी हूं जैसा भी बनकर/और या झुककर/लेकर चोर दरवाजापहुंच जाऊं सबसे आगे।.........शुभेच्छा

कविता संग्रह-अस्सी घाट का बांसुरी वाला
कवि-तजेन्दर सिंह लूथरा
प्रकाशन-राजकमल
मूल्य-150 रु.

 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
समीक्षक
डॉ.सुधा उपाध्याय
लेखिका
मो-9971816506

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