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रवि शंकर शर्मा उर्फ़ रवि :अपनी जगह खोज लेना आसान काम नहीं था

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शुक्रवार, मार्च 09, 2012 | शुक्रवार, मार्च 09, 2012


संगीतकार  रवि शंकर शर्मा उर्फ़ रवि 
हिन्दी फिल्मों के पुराने संगीत-निर्देशक श्री रवि 86 वर्ष की आयु में इस दुनिया से विदा हो गए. उनका पूरा नाम था रविशंकर शर्मा. 3 मार्च 1926 को उनका जन्म हुआ था.रवि का फिल्मी कैरियर उस कठिन दौर में चरम पर था, जब एक से एक धुरंधर और प्रतिभाशाली संगीत-निर्देशक अपनी चमत्कारी रचनाओं से हिन्दी फिल्म संगीत को मालामाल बना रहा था. नौशाद, सी.रामचंद्र, सचिन देव बर्मन, शंकर जयकिशन, वसंत देसाई, एस.एन.त्रिपाठी, मदन मोहन, रोशन, हंसराज बहल, जयदेव, खय्याम, सलिल चौधुरी, कल्याणजी आनंदजी जैसे संगीतकारों की अद्भुत रचनात्मकता के बीच उस वक़्त किसी भी संगीतकार के लिए अपनी जगह खोज लेना आसान काम नहीं था

फिर रवि को तो लक्ष्मीकांत प्यारेलाल जैसी नई जोड़ी की विस्फोटक प्रतिभा से भी दो-चार होना पड़ रहा था. राहुल देव बर्मन भी नए किस्म के संगीत के साथ आगए थे. लेकिन रवि जी लगे रहे और सरल-सहज मैलोडी-प्रधान धुनों के सहारे अपनी जगह बनाने में उन्होंने ज़बरदस्त कामयाबी हासिल की. फिल्म ख़ानदान, काजल, वक्त, हमराज़, निकाह जैसी अनगिनत फिल्मों के ज़रिये सीधा-सच्चा और भावना-प्रधान संगीत देकर आम श्रोता के हृदय को पकड़ने में उन्हें गज़ब की सफलता मिली.

चार-पाँच बरस पहले की बात होगी. जयपुर में एक अखिल भारतीय संगीत-प्रतियोगिता के एक निर्णायक के रूप में मुझे भी बुलाया गया था. जब मैं वहाँ पहुँचा तो देखा कि पीनाझ मसानी और रवि जी भी वहाँ निर्णायकों में मौजूद हैं. तब उनसे काफ़ी बात करने का मौक़ा मुझे मिला. रवि जी को इस बात का बहुत अफ़सोस था कि हेमंत कुमार के संगीत से सजी फ़िल्म 'नागिन' में जो बीन प्रसिद्ध हुई है, उसके लिए सब लोग कल्याणजी भाई का ही नाम लेते हैं कि उन्होंने उसे क्ले-वोंयलिन पर बजाया था. जबकि हकीक़त यह है कि उसे कल्याणजी भाई के साथ रवि जी ने भी हारमोनियम पर साथ-साथ बजाया था. सबूत के तौर पर उन्होंने सबके सामने मंच पर उसे बजा कर भी दिखाया.

रवि जी की ढेरों अच्छी धुनों में से एक धुन आज तक लाजवाब बनी हुई है. वह है 1960 की फ़िल्म 'घूँघट' का लता मंगेशकर का गाया गीत 'लागे मोरा जिया..' दादरा ताल में इसकी स्थाई में बोल-बाँट और बोल-तान का लयकारी में झूलता हुआ कुछ ऐसा प्रयोग हुआ है कि सुनकर दंग रह जाना पड़ता है. लता के अलावा कोई और इस जटिलता को इतने सहज और संवेदनशील ढंग से अदा भी नहीं कर सकता था. इस गीत से लेकर फ़िल्म 'हमराज़' के महेंद्र कपूर के गाए गीत 'हे, नीले गगन के तले..' की एकदम सरल धुन को देखकर सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि रवि जी की सांगीतिक रचनात्मकता का दायरा कितना व्यापक रहा है.

 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
डॉमुकेश गर्ग
मूल रूप से संगीत निर्देशक मुकेश जी साल उनीस सौ बहत्तर से दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर है.साथ ही अज़बेजान में विजिटिंग प्रोफ़ेसर हैं.
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