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साहित्य एवं कला भारतीय संस्कृति के दो अन्य महत्वपूर्ण आधारस्तम्भ हैं।

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on रविवार, मार्च 11, 2012 | रविवार, मार्च 11, 2012


रुची राय, दिल्ली


भारत मात्र एक देश, एक भूखंड नहीं यह एक सतत प्रवाहित प्रज्ञा-स्रोत है... जिससे प्रस्फुटित हुआ अध्यात्म,योग,दर्शन,विज्ञान और प्रकाश जड़ और चेतन को समान रुप से पोषित करता है। भारत एक क्रिया है शाश्वत चिंतन, अध्ययन और ध्यान की... भारत ज्ञान का सूर्य है जिसने समस्त भू-मंडल को अपनी परिधि में आने को विवश कर दिया। सृष्टि के आदिकाल से सत्य प्रकृति के कण-कण में विद्यमान है परंतु उसे शिव व सुन्दर रूप में देखने की व्यापक दृष्टि भारत ने दी है। भारत किसी बंधन नहीं अपितु संपूर्ण सृष्टि का नाम हैं। जिसके मन में यह जिज्ञासा हो कि मैं कौन हूँवो मन भारतीय है। ये भारत ही है जहां अंधश्रद्धा से अधिक महत्व तर्क को दिया जाता है। माता का निश्छल प्रेम है भारत। निराकार में साकार की वह अनुभूति जो पाषाण को भी पिघलने पर विवश कर दे। आसक्तिरहित कर्मयोग का सूत्रधार भारत ही है। ज्ञान की धरा पर विज्ञान के पुष्प इस देवभूमि पर ही पल्लवित हुए। आत्‍मोन्‍न‍ति‍ के लिए अध्यात्म का मार्ग भारत ने ही प्रशस्त किया। चिंतन अध्यात्म की पराकाष्ठा है। एकाग्रचित्त मस्तिष्क के बिना चिंतन सम्भव नहीं। चित्त की वृत्तियों को नियंत्रित करने का मार्ग भी योग के रुप में भारत ने ही दिखाया। योग एकमात्र विज्ञान है जो स्थूल और सूक्ष्म दोनों का नियामक है।
       
अध्यात्म के अतिरिक्त साहित्य एवं कला भारतीय संस्कृति के दो अन्य महत्वपूर्ण आधारस्तम्भ हैं। भारतीय साहित्य ने हमेशा विश्व पटल पर अपनी गौरवमयी उपस्थिति प्रखरता से अंकित कराई है। साहित्य को सम्पूर्णता प्रदान करने का श्रेय अनेक प्राचीन एवं अर्वाचीन भाषाओं की जननी संस्कृत को है। विश्व-साहित्य की पहली पुस्तक ऋग्वेद इसी भाषा का दैदीप्यमान रत्न है। भारतीय संस्कृति का रहस्य इसी भाषा में सन्निहित है। पाश्चात्य विद्वान इसके अतिशय समृद्ध और विपुल साहित्य को देखकर आश्चर्य-चकित रह गए हैं।
            
 भारत ने हर काल में सम्प्रेषणीयता और क्रियात्मकता को कला के माध्यम से प्रकट किया है। कला के हर रूप को अपनी श्रेष्ठता पर पहुँचाने का प्रयास किया जिसके परिणामस्वरूप भारतीय कला के स्पंदन से ही अजस्र ऊर्जा और दिव्यता का अविरल रस प्रवाहित हुआ। यह रस हमारे ऋषियों-मुनियों के सहस्रों वर्ष के शोध का प्रतिफल है जिसे हर काल परिस्थिति में समस्त विश्व ने स्वीकार किया है।
                 
आज हमारे बच्चों और युवा वर्ग को आवश्यकता है कि हम अपनी महान परंपरा पर गर्व करें। गर्व करने के लिए तथ्य की जानकारी होना भी आवश्यक है, परंतु आज का प्रबुद्ध वर्ग पश्चिमी शैली से प्रभावित है। वह वर्तमान समय में उपलब्ध विज्ञान के सीमित ज्ञान से चमत्कृत हो रहा है पर अपने प्राचीन ग्रन्थों में वर्णित उत्कृष्ट वैज्ञानिक अवधारणाओं से नितान्त अपरिचित हैं। यह आवश्यक है कि अनभिज्ञता के तम में डूबे इन अपरिचितों का ज्ञान की ज्योति से परिचय करवाया जाए। हम  भारतीयों को भारतीयता जन्मना प्राप्त होती है शायद इसीलिए इस वरदान का सम्मान कम लोग ही कर पाते हैं। अधिकतर लोगों के मन में तो इस सौभाग्य के प्रति कोई भाव जागृत नहीं होता। ऐसे ही सुप्त मस्तिष्कों और देशभक्ति से विरक्त भारतवासियों के लिए सलील ज्ञवाली की भारत को जानो  पुस्तक एक जागरूकता लाने का उपकरण है। जब कोई भारतीय यह पढ़ेगा कि विश्व की महान विभूतियों ने हमारी परम पावन मातृभूमि की प्रशंसा में क्या कहा है तो निश्चय ही उसके मन में भारत के लिए श्रद्धा का भाव जगेगा। इससे भारत के वह लोग भी प्रभावित होंगे जिनका मस्तिष्क अभी तक विदेशी दासता से मुक्त नहीं हो पाया है। जो लोग अभी भी अपनी आयातित सोच और विदेशी विचारधारा को सही समझ कर बैठे हैं यह पुस्तक उनकी आँखों से अज्ञान का परदा हटाने का काम करेगी। प्रमाण के लिए लियोनार्ड ब्लूमफील्ड की यह उक्ति यथेष्ट है......
         यह भारत ही था जहाँ ज्ञान की  एक ऐसी संस्था का उदय हुआ जो कि भाषा से सम्बन्धित यूरोपीय विचारों में एक क्रान्ति लाने वाली थी। हिन्दुओं के व्याकरण ने यूरोपीय लोगों को भाषा का विश्लेषण करना सिखाया। जब भाषा के विभिन्न अंगों की तुलना की गई तो जो समानताएँ अब तक अस्पष्ट थीं, वह अब सुनिश्चितता और सूक्ष्मता के साथ सूत्र रूप में प्रस्तुत की जा सकती थीं।

          लियोनार्ड ब्लूमफील्ड एक महान् अमेरिकी लेखक व भाषाविद् थे, जिन्होंने यूरोपियन-भारतीय भाषा विज्ञान में महत्वपूर्ण योगदान दिया और संरचनात्मक भाषा विज्ञान का विकास किया। वह संस्कृत भाषा की वैज्ञानिक शुद्धता और उत्तम दर्शन से बहुत प्रभावित थे। लैंग्वेजउनकी सबसे प्रख्यात कृति है। इस अनुपम कृति  भारत को जानो भारतीयता के प्रति आभार व्यक्त करने का मेघालय के विख्यात लेखक सलील ज्ञवाली द्वारा किया गया बहुत सुन्दर व राष्ट्रवादी प्रयास है जिससे आज की ही नहीं अपितु आने वाली कई पीढ़ियाँ लाभान्वित होती रहेंगी।


 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
समीक्षक-रुची राय 
priyankash99@gmail.com

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