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रामकिशोर पंवार ''रोंढ़ावाला ’’ की कहानी वह कौन थी..?

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on बुधवार, मार्च 14, 2012 | बुधवार, मार्च 14, 2012

मैं आज भी देर रात को घर पहुंचने वाला था इसलिए मैने अपनी मोटर साइकिल को तेज गति देकर सुनसान सडक़ पर उसे सरपट दौडऩे लगा। आज फिर काली स्याह सोमवती अमावस्या सन्नाटे को चीरती रात थी। उस रात को आड़ी - तेड़ी सुनसान सडक़ पर शायद मेरी ही मोटर साइकिल की आवाज उस सन्नाटे में गुंज रही थी जो रह - रह कर किसी अनजाने हादसे का मुझे आभास कराती रही है। खोमई बेरियर से मेरे घर की दूरी लगभग ६८ किलोमीटर रही होगी। यूं तो बैतूल से परतवाड़ा का रोड़ अंतराज्यीय मार्ग कहा जाता है लेकिन अकसर शरद ऋतु मे इस मार्ग पर आवाजाही कम हो जाती है। 

घाट सेक्सन में अकसर ट्रको से कटिंग की वारदातो के चलते वाहन चालक भी शाम होने से पहले ही घाट सेक्सन पार कर लेते है। पूरा पांच किलोमीटर का घाट सेक्सन खतरो से भरा है लेकिन रात दिन इस मार्ग पर चलने के कारण मैं इस सडक़ की हर मोड़ को  अच्छे से जानता था। अकसर मेरे साथ कोई न कोई रहता था लेकिन इस बार कोई भी साथ नहीं था। दो बार टुयूब के पंचर हो जाने के कारण मुझे आखिर गुदगांव पर टुयूब बदलना पड़ा लेकिन कुछ दूर चलने के बाद भी जब वह पंचार हो गया तो फिर गाड़ी धकाते वापस गुदगांव आना पड़ा। इस बार पंचर बनाने वाले ने जवाब दे दिया कि '' आपका टायर ही पूरी तरह से खराब हो गया है...!’’ मजबुरी में मुझे इस बार टायर टुयूब ही बदलने पड़े। इस पूरी प्रक्रिया ने मेरे चार घंटे बर्बाद कर दिए नहीं तो मैं हर हाल में शाम तक अपने घर पहुंच जाता। इस रोड़ पर अकसर मोबाइल का कवरेज नहीं मिल पाता है इसलिए घर पर भी लेट होने की खबर नहीं दे सका। रात हो जाने के कारण अब मुझे जल्दी घर पहुंचना था। ताप्ती घाट सेक्सन में चीरते सन्नाटे के बीच मुझे अचानक किसी ने आवाज दी  ''सुनिए ..........!’’  आवाज सुन कर मैं चौंक गया। 

इस काली अंधियारी रात में सुनसान सडक़ पर किसी महिला की आवाज ने मेरी दिल की धडक़न को बढ़ा दिया। मैंने हिम्मत करके गाड़ी रोकने से पहले आजू - बाजू देखा लेकिन मुझे कोई नहीं दिखाई दिया। अचानक एक बीस - बाइस साल की युवती सुनसान सडक़ पर पीछे से आई और वह मुझसे बोली '' क्या मैं आपके साथ कुछ दूर तक चल सकती हूं ...!’’  काली स्याह रात में कानो मे सुनाई पड़ी आवाज और आहट ने मुझे पीछे मुड़ कर देखने को विवश कर दिया। बिखरे बालो और कजरारी आंखो वाली वह युवती फिल्मी नायिका साधना जैसी दिखाई पड़ रही थी। यदि उसकी जुल्फे यूं न बिखरी होती तो वह साधना हेयर कट में उसकी हमशक्ल दिखाई पड़ती। मैं कुछ बोल पाता इससे पहले ही वह मेरी मोटर साइकिल के पीछे आकर बैठ गई। उसके बैठते ही अचानक रूकी गाड़ी सडक़ पर रेगने लगी। उस अनजान युवती ने मेरी कमर को एक हाथ से कपड़ लिया और दुसरे हाथ को कंधे पर रख कर वह मुझसे चिपक कर बैठ गई। उसकी इस हरकत पर मुझे गुस्सा भी आ रहा था लेकिन डर के मारे पूरा बदन कांपने लगा था। मैं कड़ाके की ठंडी रात में पसीने से तर बतर हो चुका था। 

मेरी घबराहट के चलते मेरी गाड़ी कई बार अपना संतुलन खो रही थी। सोमवती अमावस्या की उस काली रात को अब ऐसा लग रहा था कि कहीं ऐसा न हो कि गाड़ी थड़ाम से गिर जाए। मैं अपने आप को संभाल पाता उससे पहले उस युवती ने मुझसे कहा  '' सुनो डरो मत , मैं तुम्हारा कोई नुकसान करने के लिए तुम्हारे संग नहीं चल रही हूं ...!’’ मैं उससे कुछ पुछ पाता उससे पहले ही वह बोली कि ''क्या  तुमने मुझे नहीं पहचाना ........! मैं तुम्हारी सुगरती हूं.........!’’ मैं किसर सुगरती को नहीं जानता था। इसलिए मैंने उससे कहा कि ''मेरी सुगरती .......! लेकिन मैं तो किसी सुगरती को नहीं जानता ...!’’ उसने मुझसे ेहा के '' तुम्हे याद नहीं होगा , लेकिन मैं तुम्हे कैसे भूल सकती हूं........! सिर्फ तुम्हे याद दिलाने के लिए इस घड़ी का इंतजार कर रही थी। आज से ठीक सवा महिने बाद मुझे भी मुक्ति मिल जाएगी। तब शायद मेरा तुमसे मिलन नहीं हो पाएगा। इसलिए मैं आज तुम्हे वह सब कुछ बताने आई हूं ताकि इस जनम में नहीं तो अगले जनम में सही हमारा एक दुसरे से मिलन हो जाएगा। मैं पास के ही गांव में रहती हूं ... तुम्हे अकसर यहां से आते - जाते देखती रहती हूं ...... यकीन मानिए मैं तुमसे बेहद प्यार करने लगी हूं..... मेरा  तुम्हरा मिलन बहुंत पुराना है...... तुम्हे भले ही यकीन न हो लेकिन यह सच है कि मैं तुम्हारे पिछले जनम की प्रेमिका सुगरती हूं.......!’’  

मुझे उसकी बातों पर अटपटी लगी। क्योकि मैं पिछले जनमो की बातों पर यकीन नहीं करता था। वैसे तो मैने कई कहानियां एवं सत्यकथाएं लिखी है लेकिन यह पहला अवसर था जब मैं खुद एक रहस्य रोमांच से बनी कहानी का पात्र बन गया हूं । ताप्ती के किनारे यंू तो दर्जनो गांव है लेकिन इन गावों में एक गांव है डोक्या जो कि आज के समय में पूर्ण रूप से आदिवासी बाहुल्य गांव है। इस गांव में आज भले ही सडक़ पहुंच गई है लेकिन उस समय गांव तक पहुंचने के लिए पगडंडी तक नहीं थी। गांव तक ताप्ती नदी के किनारे - किनारे पहुंचा जाता था। सतपुड़ा के घने जंगलो की कहानी शायद उस समय उस गांव के आसपास के घने पहाड़ी जंगलो को देख कर भले ही न लिखी गई हो पर अब शायद ऐसा लगता है कि घने जंगलो एवं पहाडिय़ो के बीच कलकल कर बहती ताप्ती नदी के किनारे बसे इन गांवो का आज भले ही वजूद हो लेकिन साठ साल पहले यहां पर मात्र एक दो झोपडिय़ा रही होगी। 

सुगरती बताती है कि ''मैं उस समय गांव के पास घने जंगलो में अपने गांव के पशुओं को चराने के लिए आया था। वह इतना जानती है कि मेरा गांव नदी के उस छोर पर कहीं है लेकिन कहां उसे पता नहीं क्योकि उसे मैने बताया नहीं था कि मैं किसय गांव का रहने वाला था। मैं सुगरती के साथ पिछले जनम में कितने दिनो तक साथ रह कर इन जंगलो में पशुओं को चराया करता था उसे अच्छी तरह से याद है। पच्चीस साल की उम्र में उस बीस बाईस साल की देहाती लडक़ी से मेरी कब आंखे चार हुई उसे सब कुछ पता है। वह अपनी कहानी को कुछ और बता पाती कि अचानक सामने से आए वाहन की चकाचौंध ने मेरी गाड़ी का संतुलन बिगाड़ दिया और मैं सडक़ के उस पार जा गिरा। उसके बाद मुझे पता नहीं कि मेरे साथ क्या हुआ। जब मेरी आंख खुली तो मैने अपने आप को एक झोपड़ी में पाया जहां पर कुछ लोग बैठे मेरे होश आने का इंतजार कर रहे थे। मेरे होश आते ही जैसे मैने अपनी करवट बदलनी चाही किसी ने मुझे ऐसा करने से रोका। मैने जैसे ही आंखे खोली सामने वही युवती और कुछ लोग बैठे हुए थे। मैं उनसे कुछ पुछ पाता इसके पहले ही उस युवती ने मुझे पीने के लिए पानी का लोटा दिया और मैने उठ कर पानी पीना चाहा लेकिन पास बैठे व्यक्ति ने ऐसा करने से मना कर दिया। इस बीच किसी ने मेरी गर्दन को अपनी गोदी में उठाया और उस युवती ने मुझे लोटे से दो घुट पानी पिलाया।

 अनजान लोगो के बीच अपने आप को पाकर मैं कुछ पुछ पाता इसके पहले ही वह युवती बोली '' बाबू जी आप अचानक कैसे गिए गए ...! मैने आपको बहुंत संभालना चाहा लेकिन आप तो गिरे साथ ही मुझे भी गिरा दिया...!’’ उसकी बातों को सुन कर मुझे जोर का झटका लगा ......! मैं उसकी बातों को कुछ समझ पाता इस बीच वे अनजान लोग उस युवती से बोले ''अच्छा बेटी सुगरती हम चलते है ..... पास के गांव में यदि भगत जी मिले तो उसे लेकर आते है ...! लगता है साहब किसी फेरे में पड़ गए है.......! कल ही अमावस्या की काली रात थी हो सकता है कि कोई हेर - फेर का चक्कर हो .......!’’ मुझे उन लोगो की बाते समझ में नहीं आ रही थी। इस बीच दर्द जब बढऩे लगा तो उस युवती ने मुझे एक जड़ी दी और उसे खाने को कहा। जड़ी के खाते ही दर्द तो गायब हो गया लेकिन उस युवती की बातों ने पैदा किए सवालों ने मेरे दिलो- दिमाग में ऐसी हलचल पैदा कर दी कि मैं बैचेन हो उठा। काफी देर तक सोचने के बाद मुझे याद आया कि मैं तो रात को पौने बारह बजे केरपानी से बैतूल की ओर निकला था। गुदगांव से आते समय लेट हो जाने के कारण मैने मच्छी गांव के पास एक ढाबे में मैने खाना खाया और फिर बैतूल के लिए निकल पड़ा। उस समय रात के साढ़े ग्यारह बजे थे। केरपानी पहुंचने पर ठीक पौने बारह बज चुके थे। 

मैने बजरंग दददू के मंदिर के सामने अपनी गार्ड का हार्न बजाया और फिर मैं निकल पड़ा। ताप्ती घाट से नीचे उतरने से पहले ही मुझे इसी युवती ने आवाज दी थी। और फिर उसकी बातों को याद करते ही मुझे ध्यान आया कि अचानक सामने से आए वाहन के तेज हाइट के चलते मेरी आंखे चकरा गई और मैं धड़ाम से गिर गया। उसके बाद क्या हुआ मुझे पता नहीं लेकिन यह युवती कौन है मुझे पता तक नहीं  ...!’’ मुझे यह भी नहीं पता लेकिन यह युवती क्यों कह रही थी कि उसने मुझे संभालना चाहा लेकिन मैं भी गिरा और वह भी गिर गई। मेरे दिलो दिमाग में तरह - तरह के ख्यालो के आते ही एक बार फिर मैं सोच - सोच कर बेहोश होने लगा। इस बीच मेरे चेहरो पर पड़े पानी के छींटे ने मुझे चौंका दिया। इस बार मैने अपने आप को अपने घर के बिस्तर पर पड़ा हुआ पाया। मेरे चारो ओर मेरे नाते - रिश्तेदार हाथ बांधे खड़े थे। पास बैठी मां ने मेरे चेहरे पर हाथ फेरा और वह बोली '' बेटा क्या हो गया था...!’’ मैं कुछ बता पाने की स्थिति में नहीं था क्योकि मैं खुद भी कुछ समझ नहीं पा रहा था कि आखिर माजरा क्या है......!
    घंटे सवा घंटे बाद जब होश आया तो मैने अपने को अस्पताल के कमरे में पाया इस बार नाते - रिश्तेदार की जगह नर्स और डाक्टर खड़े थे। एक नर्स मेरा ब्लड प्रेशर नाप रहीं थी। ब्लड प्रेशर नापने के बाद डाक्टर ने मुझसे कुछ पुछना चाहा लेकिन मैं स्वंय तीन घटनाओं के सवालों का जवाब तलाश नहीं पा रहा था इस बीच डाक्टर के सवालो का जवाब देने की स्थिति में न होने के कारण एक बार फिर मुझे गुलकोज की बाटल चढ़ा दी गई और मैं फिर सो गया। इस बार होश आया तो मेरी दिल की धडक़न तेज हो गई क्योकि नर्स के रूप में वही युवती सामने खड़ी मुस्करा रही थी जो उस झोपड़ी में मुझे मिली थी। 

 वह मुझे देख कर मुस्करा रही थी। मैं उससे कुछ पुछ पाता उससे पहले ही वह मेरी नब्ज को टटोलने के बहाने आई और सामने रखे स्टूल पर बैठ गई। उसने अपने दुसरे हाथ से मेरे दिल पर हाथ रख कर उसकी धडक़न को नापना चाहा लेकिन उस नर्स को देख कर मेरे दिल की धडक़न की और तेज होने लगी। मैं पसीने से लथपथ होने लगा लेकिन उसने मुझे पांव के पास रखे गर्म कपड़े से ढक़ दिया और वह मेरे पास बैठ गई। मेरे सिर पर अचानक पड़े हाथ से मैं एक बार फिर चौंक पड़ा क्योकि इस बार किसी महिला का नहीं बल्कि मेरे बाबूजी का था। बाबूू जी को देखने के बाद मेरी आंखो से पानी झरने लगा। मैं फिर भी समझ नहीं पा रहा था कि आखिर माजरा क्या है....! घंटो की मशकत के बाद जब मैं पूर्ण रूप से होश में आया तो मुझे पता चला कि मेरा एक्सीडेंट हो गया था जिसके चलते मैं पिछले दो दिनो से कोमा में था। मुझे लोगो की बाते बड़ी ही अटपटी लग रही थी क्योकि मैं पहले उस झोपड़ी में फिर अपने घर में और अब अस्पताल में हूं लेकिन मुझे तो सब कुछ याद है लेकिन कोमा में होने की बाते कुछ अटपटी सी लग रही थी। मुझे याद आ चुका था कि सुगरती नामक की वह युवती डोक्या की थी जिसने मुझे जड़ी खिलाई थी। उसके बाद मां मुझे अपने घर में मिली थी । उसके बाद उस नर्स ने मेरी ने नब्ज को नापा लेकिन सब लोग ऐसा क्यों कह रहे है कि मुझे दो दिन से होश नहीं है। मैं कोमा में था ...! 

जबकि मुझे तो सब कुछ याद है लेकिन लोग मेरी बातों पर यकीन क्यों नहीं कर रहे है। पास में खड़े एक अनजान व्यक्ति  ने मुझे बताया कि ''मैं ताप्ती घाट में जब उसके वाहन की तेज लाइट के चलते धड़ाम से गिरा था उस समय उसी ने मुझे अस्पताल में लाया था ...!’’  मेरे पर्स में रखे कागजो के चलते मेरे घर परिवार के लोगो को खबर भेज कर बुलवाया गया था। इस बार मैं इन्दौर के किसी प्रायवेट अस्पताल में था। केरपानी से डोक्या से बैतूल से इंदौर तक पहुंचने की कहानी मेरे पल्ले नहीं पड़ रही थी। उस व्यक्ति ने बताया कि दर असल में वह परतवाड़ा से इंदौर जा रहा था। उसकी बूलेरो में उसका पूरा परिवार था। इस बीच मेरे एक्सीडेंट के बाद मेरी बिडग़ती हालत के चलते वे मुझे बैतूल न ले जाकर सीधे इंदौर ले आए। अपने परिवार को पाकर मैं अपने दर्द की कहानी को कुछ पल के लिए भूल गया। घर परिवार के लोगो से बात करने के बाद डाक्टर ने मुझे छुटट्ी दे दी। इस बार वही व्यक्ति अपनी बूलेरो के साथ आया। उसने मुझसे कहा कि वह वापस परतवाड़ा जा रहा है इसलिए वह मुझे बैतूल छोड़ते हुए चला जाएगा। मुझे बीच की सीट पर लिटाया गया लेकिन मेरा कंधा उस युवती की गोदी में था उसे देख कर मैं एक बार फिर चकरा गया। बीच की सीट पर वही सूरत शक्ल वाली युवती बैठी जिसे मैं सुगरती और नर्स के रूप में देख चुका था। वह मुझे देख कर मुस्करा रही थी । मैं उससे कुछ पुछ पाता लेकिन वह अपने होठों पर ऊंगलियां रख कर मुझे चुप रहने का इशारा करके अपनी नजरे घुमा ली। 

इस बीच बाबू जी ने आकर बताया कि वे दुसरी गाड़ी से पीछे - पीछे आ रहे है। सामने की सीट पर बैठी मां बता रही थी कि जिसकी गोदी में मैने अपना कंधा रखा है उसी युवती की ही गोदी में मैं अपना कंधा रख कर मैं बेहोशी की हालत में इंदौर तक आया था और अब उसी की गोदी में कंधा रख कर वापस जा रहा हूं। मैंने मां से घर में मिलने की बात पुछी तो वह बोली कि '' वह तो पिछले दो माह से छोटे भाई के पास भोपाल में है ...!’’ मेरे घर में मुझे मां का मिलना और फिर मेरे सर पर उसका हाथ फेरना अब मेरे लिए किसी पहेली से कम नहीं था। मेरी मनोव्यथा को जान कर वह युवती बोली '' इतने क्यों परेशान हो रहे हो ...!  समय आने दो सब कुछ बता दूंगी......’’ एक बार फिर मेरे साथ घटित घटनाएं किसी रहस्य रोमांच से भरी एक अनसुलझी पहेली से बनी एक अजब प्रेम की गजब प्रेम कहानी से कम नहीं थी। इंदौर से बैतूल की ओर निकले तो इस बार वे खण्डवा होते हुए निकले। सभी की इच्छा थी कि दादा जी के दरबार होते हुए निकले। हम लोग खण्डवा हाइवे पर आ तो गए लेकिन इस बीच पता नहीं क्यों लोगो का मन बदला और वे सब आशापुर होते हुए बैतूल के लिए निकलने का मन चुका थे। 

इस बीच जब सब लोग हाइवे के किनारे ढाबे पर खाना खा रहे थे। तब सभी ने उस युवती से भी कहा कि वह भी खाना खा ले। तकीया लगा कर मेरा सिर उस पर रख दे लेकिन वह नहीं मानी और कहने लगी कि '' मुझे भूख नहीं है ... आप लोग खा लीजिए ......!’’ युवती का यंू इस तरह बहाना बनाना मेरी भी समझ के बाहर की बात थी। मुझे उसके बनाने के पीछे भी कोई फिल्मी कहानी लगी। हालांकि उस युवती ने सब लोगो को पास के ढाबे में खाने के लिए भिजवा दिया। इस बीच पूरी बूलेरो गाड़ी में हम दोनो के अलावा कोई तीसरा नहीं था। मेरी हालत देख कर वह मंद - मंद मुस्कराई। उसकी कातिल मुस्कान के पीछे लगता कोई बहुंत  बड़ा रहस्य था। मेरी बढ़ती बैचेनी को देख कर वह युवती बोली ''परेशान क्यों हो रहे हो ...! मैं वही डोक्या वाली सुगरती हूं.......! , मैं ही नर्स बन कर तुम्हारे पास बैठी थी.......! और अब भी वही हूं......! फर्क सिर्फ इतना है कि मैं इस बार परतवाड़ा की अनिता के रूप में हूं ......!’’   वह बोली '' सुनो मैं तुम्हे एक ऐसी प्रेम कहानी सुना रही हूं जिसे तुम किसी को मत बताना .......! खासकर जब तक कि मुझे मुक्ति न मिल जाए........! मैं पिछले कई जनमो से तुम्हारा पीछा करती चली आ रही हूं......! हर जनम में तुमसे मिलने का इंतजार करती भटकती रही हूं ...!  जिसके पीछे सिर्फ एक ही कहानी है कि मेरा विधिवत अंतिम संस्कार एवं तर्पण नहीं हुआ.........!  हमारी परिवार की मर्जी के खिलाफ शादी तो हुई लेकिन शादी के दुसरे ही दिन मेरे परिवार वालो ने मुझे धोखा देकर तुमसे अलग करके मेरी हत्या कर दी........!

 मेरी हत्या की खबर मिलते ही तुम तो जान बचा कर भाग गए लेकिन मेरे परिवार वालो ने सामाजिक डर के चलते आनन -फानन में मेरी लाश को जला दिया और लोगो के बीच यह खबर फैला दी कि सुगरती नदी में आई बाढ़ में बह गई ...! इस अमावस्या के ठीक सवा महिने बाद मुझे अकाल मौत के कारण मिली प्रेत योनी से छुटकारा मिल जाएगा.......! मैं चाहती हूं कि तुम मेरा आने वाले श्राद्ध पक्ष में मेरे पिछले जनम के पति के रूप में मेरा तर्पण करो ताकि मैं इस योनी से शांती पूर्वक बिदा हो सकूं.......! मैं सुहागन के रूप में इस संसार से बिदा लेना चाहती हूं......! कितना अच्छा होगा कि तुम मुझे सुहागन के रूप में मेरा तर्पण करके मेरी भटकती आत्मा को मुक्ति दिलवा देगें.......! सुनिए मैने वैसे भी प्रेत योनी में अपना निर्धारित समय काल काट लिया है, लेकिन मेरी आत्मा तुमसे मिलन के लिए भटकती रहेगी ...! इस बार तुम्हारे हाथो बिदाई से मैं चैन से दुसरी योनी में जा सकूंगी ...!  अब पता नहीं नहीं कि हम कभी मिल पाएगें या भी नहीं ........! इस बार वह मुझसे सिर्फ मिलन के आई थी .......! क्या हुआ हमारा मिलन नहीं हुआ .........!  यदि हमारा प्रेम सच्चा है तो हम इस जनम में नहीं तो किसी न किसी जनम में किसी न किसी योनी में जरूर मिलेगें...... ...! 

उसकी बातों को सुन कर मैं सकते में पड़ गया। उस युवती की कहीं बाते और मेरे साथ घटित घटनाएं पुराने जमाने की फिल्म  ''वह कौन थी ...!’’  की तरह थी। फर्क सिर्फ इतना था कि उसकी नायिका साधना थी और इस फिल्म की नायिका के नाम अलग - अलग है। मेरे लिए पूरी घटना किसी चलचित्र की तरह थी। उस युवती ने मुझे अपनी गोद से उठा कर अपनी बाहों में लपेट लिया। इस बीच अचानक मेरी अपनी इस जनम की श्रीमति जी ने मुझे हिलाते हुए कहा कि '' इस तरह पूरी रजाई को गोदी में क्यों लपेट रखे हो....... ..!  और यह क्या नाटक मचा रखा सूरत बाहर निकल कर अब ढलने जा रहा है.......! दिन के ढ़ाई बज चुके है  ...! क्या अब भी सोकर नहीं उठना और नहाना नहीं है क्या...!’’  मैंने जैसे ही आंखे खोली मैंने अपने आप को अपने घर के बिस्तर में पाया। गुस्से लाल पीली हो चुकी श्रीमति जी ने मेरे हाथो में चाय की प्याली थमा कर वह बोली ''पानी गर्म हो गया है जल्दी से नहा लो ...!’’ मैं अचानक सवालो एवं जिज्ञास के चक्कर में इतना खो गया कि पता भी नहीं चला कि कब चाय की प्याली झलक गई और गरमा गरम चाय रजाई पर जा गिरी। रजाई पर चाय गिरते ही मेरा छोटा बेटा बोला ''मम्मी पापा ने एक बार फिर रजाई पर चाय गिरा दी...!’’  श्रीमति जी ने मुझे इस बार घुरती निगाहो से देखा और वह बोली ''आपकी नींद अभी भी नहीं गई है क्या ...! मैं बार - बार मना करती हूं कि देर रात तक कम्प्यूटर सीट पर बैठ कर उल्टी - सीधी कहानियां मत लिखा करो ...... ..! 

लेकिन तुम्हारे इस चक्कर में मैं घन चक्करी बन जाती हूं लेकिन आप नहीं समझने वाले......! इस तरह देर रात तक जगने के कारण ही देर से उठते हो और मेरे लिए परेशानी बढ़ाते हो....’’  श्रीमति की और बड़बड़ से बचने के लिए मैं बिस्तर छोड़ कर उठा और फ्रेश होकर अपने कम्प्यूटर की सीट पर एक बार फिर आकर बैठ कर कहानी को लिखने के फाइल खोल कर जैसे ही उस अधुरी कहानी को पूरा करना चाहा लेकिन कहानी को मैं आगे बढ़ता उसके पहले ही श्रीमति जी आ धमकी .... ...! इस बार उसके हाथो में सुहाग की सामग्री थी जिसे दिखाते हुए वह बोली  ''यह किस चुड़ैल के लिए लाए थे बोलो ...!’’ मैं उसे वह कहानी बताता तो वह शायद यकीन नहीं करती। मुझे अब सिर्फ बहाना बना था कि यह सामान गलती से आ गया होगा....! लेकिन मेरे लाख बहाने को वह नहीं मानी और कहने लगी कि  '' यदि तुम अपनी आदत नहीं सुधार सकते तो भगवान के लिए मेरे लिए इस तरह परेशानी मत बढ़ाया करो...!’’ मैं आज के दिन उसे कुछ भी समझाने की स्थिति में नहीं था। मैने उसके द्वारा गुस्से से फेकी गई सुहाग सामग्री को ली और उसे अपनी आलमारी में रख दी और चुपचाप घर से बाहर निकल गया। देर शाम को जब घर आया तो घर पर पूरा बाजार लगा हुआ था। बाबूजी मां से लेकर ससुराल वाले तक आ धमके थे। 

मैंने उन्हे पूरी कहानी बताई लेकिन किसी को मेरी बातों पर यकीन नहीं हो रहा था। मेरी इस कहानी बताने से स्थिति सुधरने वाली और बिगड़ चुकी थी। अब श्रीमति जी अपने मायके जाने की पूरी तैयारी कर चुकी थी। मैंने सबको मनाया लेकिन कोई नहीं माना और फिर पूरा घर सुनसान सन्नाटे की तरह हो गया। देर शाम को घर आया तो पूरा घर अंधकार में डूबा था। मैंने बिजली जलाई तो मेरे बिस्तर पर लेटी उस युवती को देख कर मेरा पूरा बदन सुन्न पड़ चुका था। आखिर मेरे साथ हो क्या रहा है। कुछ पल बूत बन कर खड़े रहने के बाद वह युवती मेरे पास आई और उसने मुझे हिलाया तो मैं धड़ाम से गिर पड़ा। जब कुछ देर बार आंखे खुली तो वह मेरी बगल में लेटी मेरी ओर देख कर मंद - मंद मुस्करा रही थी। मैं कुछ बोलू उसके पहले ही वह बोल पड़ी  ''सब कुछ मेरा किया कराया था ...! मैं चाहती थी कि आज की रात मेरा तुम्हारा मिलन हो जाए उसके बाद हम लोगो को कब मिलन हो पाएगा भी या नहीं ........! 

मैंने उससे कहा कि  ''तेरे चक्कर में मेरा पूरा घर - परिवार ताश के बावन पत्ते की तरह बिखर गया और तुझे मिलन की चिंता है ...!’’ वह बोली  '' आज की रात की बात है सुबह हो जाने दो मैं सब कुछ ठीक - ठाक कर दूंगी...!’’ और उसके बाद पूरी रात क्या हुआ मुझे पता नहीं। मोबाइल की घंटी ने मुझे अचानक नींद से जगा दिया मैं बगल में देखा तो वह युवती नहीं थी। बिस्तर पर सिलवटे बता रही थी कि मेरी बगल मेरी कोई सोई थी। मैं और कुछ सोच पाता कि मोबाइल की रिंग टोन ने मुझे उसे उठाने के लिए विवश कर दिया। मोबाइल पर दुसरी ओर से आवाज आई ''नींद हो गई होगी तो दरवाजा खोल दीजिए ...! 

हम कब से सामने खड़े दरवाजे की कुण्डी और बेल बजा रहे है.....। ’’  मैने सरपट दरवाजा खोला तो सामने देखा श्रीमति जी खड़ी मंद - मंद मुस्करा रही थी।  ''अरे तुम इतनी जल्दी अपने मायके से आ गई ........!’’ मेरी बातो को सुन कर वह पहले तो चौंक गई और फिर भीतर आते ही बोली कि  ''आपने क्या भांग पी रखी है ...! मैं कब मायके चली गई थी.........! तुम्हे अभी थोड़ी देर पहले ही बता कर गई थी कि बड़ी बाई के घर जा रही हूं......!’’ उसकी बातो को सुनने के बाद मैने सोचा कि चलो अच्छा है कि उसे कुछ पता नहीं ......!’’  इस बार मैं चुपचाप बिस्तर से उठा और हाथ मुंह धोकर चुपचाप कम्प्यूटर सीट पर आ गया। कुछ देर बाद श्रीमति जी चाय कर प्याला लेकर आई। चाय का प्याला देते हुए वह बोली  ''यह सामान मेरे लिए लाए  ...!’’ उसके हाथ में वही सुहाग की सामग्री देख कर मेरे होश उड़ गए। मैंने उससे कहा कि  ''अरे यह सामान तो रमेश का है गलती से बदल गया होगा ...! मेरा सामान उसके पास और उसका सामान मेरे पास आ गया है.......! 

मैं कुछ देर बार जाकर उससे अपना सामान लेकर आ जाऊंगा.......! श्रीमति जी कहने लगी कि  '' अब छोड़ो ने बदलने - वदलने का चक्कर मैं यही सामान रख लूंगी मेरे करवा चौथ के उपवास पर काम आ जाएगा। मैंने उसे लाख समझाया लेकिन वह नहीं मानी आखिर उसी सामान को उसने अपने पास रख लिया। मैंने एक दिन चुपके से उसी सामान से मिलता - जुलता सुहाग का सामान लाकर उसकी आलमारी में रख कर उस सामान को लेकर मैं सीधे ताप्ती घाट पहुंचा और पंडित जी को बुलवा कर विधिवत तर्पण करना चाहा लेकिन पंडित मुझे और मेरी पत्नि को अच्छी तरह से जानता था। इसलिए मैने किसी भी प्रकार की रिस्क न लेते हुए मैं सीधे ताप्ती घाट पहुंचा। आज पूरे घाट पर सन्नाटा छाया हुआ था। मैने स्नान - ध्यान करके उस अतृप्त आत्मा का तर्पण कर उसे पूरे सुहाग सामग्री के साथ नदी में विसर्जित कर दिया। पूरी प्रक्रिया करके घर वापस लौटा तो चैन की नींद से सो गया। मेरे सपने में वह युवती आई और उसने मेरे प्रति आभार व्यक्त किया और हमेशा - हमेशा के लिए बिदाई लेकर चली गई।  आज करवा चौथ का वृत था मुझे श्रीमति जी ने समय से पहले ही घर पहुंचने की सख्त हिदायत दे रखी थी लेकिन घर पहुंचने के बाद श्रीमति जी को उस सुहाग सामग्री में देख कर मुझे सुगरती की याद आ गई। जब श्रीमति करवा चौथ के चांद को देख कर अपना उपवास छोड़ रही थी उस बीच आसमान में परछाई के रूप में दिखाई सुगरती की मंद - मंद मुस्कान को मैं आज तक नहीं भूल सका हूं।

 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
रामकिशोर पंवार 
ramkishorepawar@gmail.com

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