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आयोजन रपट:मेरी स्मृति में रेगिस्तान

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on गुरुवार, मार्च 15, 2012 | गुरुवार, मार्च 15, 2012

बाड़मेर-
कल रात को साढ़े ग्यारह बजे स्टूडियो से लौटते हुए अनगिनत बाइक सवार और मोटर गाड़ियों से सामना हुआ. उनको देख कर मुझे दो लोगों की याद आई एक ललित के पंवार और दूसरे संजय दीक्षित. मैं नहीं जानता कि दोनों में समानताएं क्या है मगर एक साथ याद आने का साझा कारण था, "थार फेस्टिवल". थार एशिया के सबसे बड़े मरुस्थल का नाम है और फेस्टिवल का अर्थ मुझे मालूम नहीं है. आंग्ल भाषा का शब्दकोष लेकर बैठूं तो उसमें पर्व या त्यौहार जैसा कुछ पाता हूँ. तो मेरी स्मृति में इस रेगिस्तान में कोई थार नाम का पर्व या त्यौहार कभी रहा नहीं. जो लोग मेरे सामने से गुज़र रहे थे, वे इसी आयोजन से लौट रहे थे और शायद कैलाश खेर को सुन कर सूफ़ियाना अनुभूति से भरे हुए रहे होंगे.

ललित के पंवार की याद आने की एक वजह थी कि इस रेगिस्तान की मिट्टी से जुड़े सरोकार और चिंताएं उनके दिल में रहती हैं. कुछ दिन पहले उन्होंने गहरे ह्रदय से कहा था कि मरु प्रदेश की इस अनूठी धरोहर को विश्व के पर्यटन मानचित्र पर वो सम्माननीय स्थान क्यों नहीं मिल पा रहा? उनके इस सवाल में तल्खी नहीं एक दिली पीड़ा थी. ललित जी शायद आईटीडीसी के सबसे बड़े अधिकारी है. दिल्ली में बैठ कर भी अपनी जड़ों की ओर झांकने की आदत से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं. अख़बारों में छपी उनकी चिंताओं को पढ़ते हुए मैं चाहता था कि उनको एक लम्बा ख़त लिखूं मगर नहीं लिखा.

वैसे थार फेस्टिवल के बारे में याद करता हूँ तो मुझे एक शोभा यात्रा से सिलसिला शुरू होता हुआ दिखता है. इसमें कुछ लोक कलाकारों और नर्तकों के दल होते हैं वे उसी अंदाज़ में परेड करते हुए चलते हैं जैसा कि हम दुनिया भर के वृहदतम खेल और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आग़ाज़ में देखा करते हैं. उन सब भव्य परेडो के सामने यह एक बेहद बोना प्रदर्शन होता है. डिजिटल ऐज़ में आज हर घर में विश्व भर के आयोजन पहुँच रहे हैं. ऐसे में इस परेड को देखने और इसे एक उत्सव में तब्दील कर देने के लिए स्थानीय नागरिक अपने घरों की मुडेरों पर चढ़ आयेंगे और पुष्पवर्षा से इसे अतुलनीय बना देंगे. यह असम्भव है.

इसी शोभा यात्रा में कुछ घुड़सवार होते हैं. इनकी शक्ल हर साल बदलती रहती है. जिस किसी भी सरकारी अधिकारी के पास घोड़े पर चढ़ने का साहस और अपने ओज के प्रदर्शन की लालसा बची होती है, वह उन पर सवार हो जाया करता है. इस तरह एक सरकारी बन्दोली का पावन ध्येय अपने उत्कृष्ट स्वरूप में नुमाया होने लगता है. वैसे एक और कमाल की बात होती है कि ये मालाणी के प्रसिद्द घोड़े नहीं वरन ब्याह शादियों में दुल्हे को ढ़ोने वाली नचनियां घोड़ियाँ हुआ करती हैं.

रूमी ने कहा था कि मेरे महबूब आ मैं तुझे अपने सर पर पगड़ी की तरह बांध लू भले ही तेरा नुकीला तुर्रा बार बार मुझे सताता जाये. इसी प्रिय पाग को कौन सर पर जल्दी और सुंदर बांध सकता है जैसी एक प्रतियोगिता होती है. टेंट हाउसों से आये शादी ब्याह वाले कालीनों पर खड़े प्रतिभागी एक सुंदर तरीके से पगड़ी बांधने के सामूहिक अचम्भित कर देने वाले प्रदर्शन की जगह अजब ढंग से हाथ हिलाते हुए मसखरे जान पड़ते हैं. उनको देखते हुए मेरे दिल से दुआ निकलती है कि ऐ रेगिस्तान की पगड़ी तेरी शान सदा कायम रहे.

यहाँ साल भर में कम से कम एक बार रंगोली बनाने की प्रतियोगिता हर स्कूल कॉलेज में अवश्य होती है. रंगोली हमारी संस्कृति का अटूट हिस्सा है. हम एक सुंदर रंग भरे जीवन की कामना को इसी तरह से व्यक्त करते हैं. लेकिन मैं आज तक नहीं समझ पाया कि यह अगर कला है तो प्रतियोगिता कैसे हुई? इसके अलावा ढोल बजाने की, महिलाओं द्वारा सर पर घड़ा उठा कर दौड़ने की, पोते का हाथ पकड़े हुए दादा के दौड़ने की और कई बार तो अंग्रेजों के इजाद किये चमच में नीम्बू रख कर दौड़ने जैसी कलाओं का प्रदर्शन होता है. इन सबको देखते या सोचते हुए उदास होने लगता हूँ, देश और दुनिया के लोग इससे प्रभावित न हो सकेंगे.

एक और उदासी इस बात की घेरती है कि ये सारा का सारा आयोजन जैसलमेर में होने वाले मरु-महोत्सव का क्लोन भर है. कोई महीना भर पहले हज़ारों विदेशी और असंख्य देसी सैलानियों द्वारा महज एक सौ साठ किलोमीटर दूर रेत के स्वर्णिम धोरों में इस सबका आनद लिया जा चुका होता है. थार फेस्टिवल सोचता है कि रेगिस्तान की खुशबू से कोई बचा रहा गया हो तो बाड़मेर चला आये. कुछ एक साल पहले एक भूला भटका गोरा आदमी महाबार चला आया तो आयोजकों ने उसे इतनी फूल मालाएं पहनाई कि वह शर्मिंदा हो गया. इस कृत्य को देख कर मैंने अपना सर आउटडोर रिकार्डिंग के यंत्रों के पीछे छिपा लिया.

इस फेस्टिवल की थीम क्या है ये कोई ठीक ठीक नहीं जानता किन्तु बाहर से इतना समझ आता है कि बाड़मेर जिले में बिखरी हुई अद्भुत सांस्कृतिक धरोहर के स्थलों पर आयोजन किये जाएँ ताकि पर्यटक वहां पहुँच सके. लेकिन यह आयोजन कुछ दवाबों के कारण एक तुष्टिकरण का सालाना कारोबार बन कर रह गया है. बालोतरा में होता है, चोहटन में होने ही लगा है. अब कई और जगहों के ऐतिहासिक सांस्कृतिक महत्त्व सामने लाया जा रहा है. नई मांगें खड़ी हुई है. जैसे कला और संस्कृति के संरक्षण और उत्थान का काम प्रशासन का है. आयोजन के लिए जिम्मेदार कोई अधिकारी उनको ये जवाब नहीं देना चाहता कि अगर आपके क्षेत्र में कोई अनूठी विधा है तो उसके लिए सामूहिक प्रयास कीजिये, सरकार का मुंह न देखिये.

जिला कलेक्टर इस समारोह की आयोजन समिति के अध्यक्ष होते होंगे ऐसा मेरा अनुमान है. उनके सामने एक लाल बस्ता हर साल उसी तरह आ जाता होगा जैसे होली दिवाली आया करती है. इस बस्ते के साथ कुछ चापलूस भी चिपके हुए आ जाते हैं. उनसे अगर कलेक्टर कहें कि ऐसा कर लें तो वे अपनी मुंडी इस तरह हिलाएंगे कि उसका अभिप्राय हाँ और ना के बीच का कुछ समझा जाये. आखिर कलेक्टर समझेंगे कि ये थार फेस्टिवल है क्या और कैसे किया जाता है. दो घंटे बाद सब थक जाएंगे और एक सामूहिक आवाज़ आएगी कि सर जो आप कहें या मेम आपने बिल्कुल ठीक कहा है. कायदे से हर दो साल बाद भारतीय प्रशासनिक सेवा का कोई योग्य अधिकारी इस फ़ाइल को नए सिरे से समझने के लिए अपना सर खपाता देखा जा सकेगा.

कनाना की आंगी गैर को देखना एक अद्भुत अहसास है. अजंता एलोरा के भित्ति चित्रों को मात देती हुई मूर्तिकला वाले किराडू के रोम रोम में अनचीन्हे सौन्दर्य का वास है. यहाँ के लोक सुर महान शास्त्रीय परम्परा के रेशमी कालीन के सुनहले धागे हैं. रेगिस्तान के कण कण में अनूठा सौन्दर्य है. बावजूद इसके ललित के पंवार जैसा व्यक्ति चिंतित हो जाता है कि आखिर लोचा कहां है. उनका ऐसा होना लाजिमी है. जो भी आदमी रेगिस्तान से प्यार करता है वह चाहता है कि लोग रेगिस्तान को जाने और समझें. लोग हमारे जीवन को देखने के लिए यहाँ तक आयें. किन्तु अफ़सोस...

मुझे संजय दीक्षित इसलिए याद नहीं आते कि शेन वार्न उनको धोखेबाज़ कहता है वरन इसलिए कि उस आदमी ने शास्त्रीय और लोक संगीत के एक भव्यतम आयोजन की कल्पना की थी. उसके विजन में एक वृहद् आयोजन था जो हमारी संस्कृति की शास्त्रीयता और रेगिस्तान के जीवट भरे जीवन के कोलाज को बुनता. क्या रेगिस्तान के इस कोने में सीमा पर बैठा हुआ आदमी कभी सोच सकता है कि वह ग्रेमी एवार्ड से सम्मानित पं. विश्व मोहन भट्ट को सुन सकता है ? क्या वह कल्पना कर सकता है कि शास्त्रीय संगीत के महान कलाकार रेगिस्तान के जिप्सी गायकों के साथ एक ही मंच पर बैठ कर इस सूखे रेतीले प्रदेश को सुरों से हरा भरा कर सकते हैं.

लेकिन संजय दीक्षित या उनकी समानधर्मा सोच के अधिकारियों के दिल में बसने वाला शास्त्रीय आयोजन एक लोकानुरंजन के सस्ते तमाशे में तब्दील हो गया है.

मैं कल रात को देर तक सोचता रहा कि कभी पंवार साहब को लिखूंगा कि इस आयोजन को जैसलमेर के क्लोन होने से मुक्त करवाया जाये. इसे किराडू के मंदिर समूहों पर विशिष्ट रूप से केन्द्रित किया जाये कि पर्यटक जैसलमेर सिर्फ़ रेत देखने नहीं वरन विशाल रेगिस्तान के बीच खड़े अद्भुत सोने जैसे किले के मोहपाश में बंध कर आते हैं. बाड़मेर अगर कोई आया तो किराडू के लिए आएगा, किराये पर नाचने और ढोल पीटने वाले तमाशों को देखने के लिए नहीं... इस आयोजन को लोक एवं शास्त्रीय संगीत के विश्व के सबसे बड़े आयोजनों जैसा रचा जाये. लोक संगीत की विविध गायन और वादन विधाओं पर कार्यशालाएं आयोजित की जाये. पैसे देकर बड़े कलाकारों को बुलाने की जगह लोक संगीत के प्रसंशकों और जिज्ञासुओं के लिए ठहरने के उचित प्रबंध किये जाएँ.

संगीत सीखने को आतुर देश विदेश के लोगों को आमंत्रित किया जाये और उनके प्रदर्शन के लिए इस आयोजन में जगह बनायीं जाये. पंवार साहब को वैसे मालूम ही होगा कि दुनिया भर के लोग मांगणियार और लंगा गायिकी यहाँ रह कर सीख रहे हैं. मांड गायिका रुकमा के यहाँ एक आस्ट्रेलिया से आई युवती केसरिया बालम आओ नी पधारो म्हारे देस गा रही थी. मुझे उनको सुनते हुए कैसा लगा होगा ये लिख पाना कठिन है. यहाँ की गायक जातियों के अनगिनत हीरों को अपने ही घर में सम्मान नहीं मिल रहा है. उन सबके लिए ये आयोजन कला के सालाना प्रदर्शन का मंच जरुर बनना चाहिए.

इस आयोजन के बारे में एक ठोस रूप रेखा और स्पष्ट कार्य योजना होनी चाहिए ताकि नए आने वाले अधिकारी अपने चमचों का मुंह न देखें. वे अपनी योग्यता से इसे और नई ऊँचाई देने के सार्थक काम कर सकें. मुझे मालूम है कि कोई भी काम जो किसी विशिष्ट उत्पाद पर आधारित नहीं होगा एक किराने की दुकान बना रहेगा, कभी विश्व विख्यात न हो सकेगा.

मुझे वे पत्रकार और जनसंचारकर्मी याद आ रहे हैं जो इस मेले में जगह मिल जाने के लिए अधिकारियों का मुंह जोहते रहते हैं. प्रशासन इनके लिए भी कभी सम्मानपूर्वक बैठने की व्यवस्था नहीं कर पाता है और आम आदमी के साथ ठीक वैसा ही सुलूक होता है जैसा खैरात लूटने आये नियाज़ियों के साथ... इसलिए कल रात मैंने कैलाश खेर को सुनने जाने की जगह नेट पर एक दोस्त से बात करना प्रिय जाना. अभी दो दिन का आयोजन बाकी है और मेरी उम्मीदें भी कि एक दिन लोग बाड़मेर ये देखने आयेंगे कि ग्यारहवीं सदी में इस रेगिस्तान में भी ऐसे अद्भुत मंदिरों का निर्माण हुआ जिनकी मूर्तिकला आपके गंदगी भरे मस्तिष्क को एक बार फिर नए सिरे से स्त्री पुरुष की देह के सौन्दर्य को देखने के लिए प्रेरित करेगी. कितना अच्छा होता कि इसका नाम "किरातकूप संगीत महोत्सव" होता.

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
किशोर चौधरी 
किसी ज़माने में जोधपुर में एक अखबार से पत्रकारिता की हुरुआत करने वाले किशोर,आकाशवाणी जैसे नामचीन विभाग में उदघोषक हैं.पहले सूरतगढ़ स्टेशन के बाद अब फिलहाल बाड़मेर केंद्र पर पदस्त हैं. हथकढ़ नामक ब्लॉग के ज़रिये डायरी लेखन करते हैं. जीवन के सभी पड़ाव पर अपने आस-पास को देखने की नई दृष्ठि रखते हैं.महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय,अजमेर से कला स्नातक और कोटा ओपन से जर्नलिस्म में मास्टर डिग्रीधारी हैं.उनका फेसबुक खाता ये रहा

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2 टिप्‍पणियां:

  1. भाई किशोर जी, आपने जिस शिद्दत से 'थार महोत्सव' के अन्तरविरोधों को रखा, वह गहरे में छिल-छिल गया। आपने सही ही 'थार महोत्सव' को 'किरातकूप संगीत महोत्सव' नाम दिया है। हम आज अपनी परम्पराओं से 'घर की मुर्गी दाल बराबर...' का सा बर्ताव करते है। जब हमारे अपने लोग अपने ही घर को, घर के महत्त्व को नहीं समझेंगे तो दूसरा क्योंकर इसमें दिलचस्पी लेगा? । ऐसा सही इतिहास दृष्टि या सही इतिहास बोध के अभाव में भी होता है और होता क्या, हो रहा है। पर ललित पंवार और संजय दीक्षित ने इसे समझा और इसकी बेहतरी के लिए प्रायसरत रहे। उसी का असर था कि कभी 'थार महोत्सव' का जादू थारवासियों के सर चठकर बोला करता था। तब सबकुछ लोक का था। कलाएँ तब भी प्रतियोगिताएँ के रूप में थी पर लोग उन्हें उस रूप में नहीं लेते थे। शायद इसीलिए वह लोगों को खींचती भी थी पर अब ऐसा नहीं है और हो भी नहीं सकता। जिन विदूषकों द्वारा इन्हें क्रियान्वित किया जाता है वे लोग कौन है और कलाओं व संस्कृति को लेकर उनकी समझ कितनी भोथरी होती है-यह किसी से छिपा नहीं है। शायद 1999 या 2000 की बात है जब 'थारश्री' और 'थारसुन्दरी' के प्रतियोगी मञ्च पर आए तो आदर्श स्टेडियम में खड़ा सारा बाड़मेर झूम उठा था लेकिन थोड़ी ही देर में सबकी खुशी भी काफूर हो चुकी थी क्योंकि जो प्रतियोगी इसमें जीते थे वे थार के प्रतिनिधि कम और दुल्हे-दुल्हन अधिक लग रहे थे। उनके चेहरों और हाथों पर विदेशियत नाच रही थी। थारवासियों की सहजता और सरलता पर सेलिब्रिटी होने आकांक्षाएँ भारी पड़ रही थी। प्रतिनिधिक रूप से इसकी शुरूआत इन्द्रसिंह और शैलजा से हुई। उनकी स्वाभाविक मुस्कुराहट बाजारू कुटिलता की ओट कहीं खो सी गयी थी। देशी रवायतों पर सोने की चमक चढ चुकी थी और ऐसा ही कुछ महाबार के धोरों पर भी हुआ। तभी लगा था कि अब इसका स्वरूप बदलेगा और आने वाले समय में 'थार महोत्सव' अपनी प्रतिष्ठा बचाए और बनाए रख पाएगा, इसमें सन्देह किया जाना चाहिए। सिर्फ कनाना के गैर और किराडू की शाम अपने असर से बची रही लेकिन अब भी बची होगी, इसकी उम्मीद मुझे कम ही नजर आती है पर इन सबके बावजूद ये दोनों बची रहे, ऐसी उम्मीद करता हूँ। आमीन... पुखराज जाँगिड़।

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  2. हमने अपनी आवाज रूखमों बाई को यों ही खो जाने दिया, उसे यों ही मरने दिया। पिताजी कहा करते थे कि 'रूखमों जितरा दिन जीवती है, उतरा दिन अपां रा न सरकार रे नफे रा है। मिनख तो ताळियाँ बजा न चलता बण ही पर पण ताळियाँ अूँ इणरो पेट थोड़ो ही भरीज ही।' वो आजीवन रोटी के संकट से जूझती रही पर हारी नहीं, डटी रही। सच कहूँ तो उनके जाने से गूँगा हो गया है थाऱ। हमारे लोक कलाकार आज भी डटे हुए, उनकी जीवटता का कोई सानी नहीं। वो खुद तो टूटेंगे भी नहीं पर व्यवस्था उन्हें तोड़कर ही दम लेगी। बाड़मेर में कई रूखमों है पर कितनी है जो रूखमों की तरह सामने आने का साहस कर सकी। हमारा लोक हमसे छिन रहा है और हम इसके दोषी है...

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