डा.राजेंद्र तेला 'निरंतर' की चंद रचनाएं - अपनी माटी

नवीनतम रचना

शुक्रवार, मार्च 16, 2012

डा.राजेंद्र तेला 'निरंतर' की चंद रचनाएं


इधर रणभेरी बजी,उधर तलवारें चमकी

इधर रणभेरी बजी 
उधर तलवारें चमकी 
धरती माँ की रक्षा में 
हर वीर की बाहें फड़की   
वीरांगनाओं ने कमर कसी 
चेहरे पर भय का भाव नहीं 
कर्तव्य की बली वेदी पर 
चढ़ने को 
हर जान तैयार खड़ी
क्या बच्चा क्या बूढा 
क्या माता क्या अबला 
हर मन में देशभक्ती की 
आग जली 
दुश्मन को धूल चटाने को 
सेनायें तैयार खडी 
राजपुरोहित ने किया 
तिलक महाराणा प्रताप के 
ललाट पे 
फिर जोश से बोले 
एकलिंगजी का नाम ले 
युद्ध में प्रस्थान करो 
दुश्मन को 
सीमा से बाहर करो 
विजय अवश्य तुम्हें 
ही मिलेगी 
बस हिम्मत होंसला 
बनाए रखो 
धरती माँ की रक्षा में 
जान भी न्योछावर 
करनी पड़े 
तो चिंता मत  करो 
सुन रहा था चेतक 
सारी बातें ध्यान से 
उसने भी हिलायी गर्दन 
बड़े गर्व और विश्वास से 
प्रताप ने खींची रासें 
लगायी ऐड चेतक के 
जन्म भूमी मेवाड़ की 
रक्षा के खातिर 
बढ चले सीधे युद्ध के 
मैदान को


खोखली हँसी 
पुरानी तसवीरें देखता हूँ 
सोच में डूब जाता हूँ 
उन हँसते हुए चेहरों को आसपास 
ढूंढता हूँ
 कुछ चेहरे नहीं दिखते 
काल के गाल में समा गए 
पर अधिकतर दिख जाते 
चेहरे वही पर अब चिंताग्रस्त 
झुर्रियां लिए हुए 
ह्रदय में बुढापे का दर्द छुपाये 
खोखली हंसी से मेरा स्वागत 
करते हैं 
मानों मेरा मज़ाक उड़ा रहे हैं 
मुझ से चीख चीख कर कह रहे हैं 
हमें क्या देखते हो 
अपने चेहरे को भी शीशे में देखो 
तुम्हारा चेहरा भी 
हमारे चेहरे जैसा ही दिखता है 
बुढापे का चेहरा 
कल क्या होगा
के सोच में डूबा हुआ 
आज की पीड़ा से ग्रस्त 
सम्मान ,भाईचारे,अपनत्व को 
तलाशता हुआ 
उसे पता ही नहीं है 
अब इनकी आशा करना व्यर्थ है 
जितना भी मिल रहा है 
उसी में संतुष्ट रहो 
जैसा भी जीवन मिले जी लो 
अधिक की आशा करोगे 
समय से पहले चले जाओगे 
जब तक जीवित हो 
खोखली हँसी ही हँस लो  

जितना हँस सकूँ,उतना हँस लूँ 
अब थकने लगा हूँ 
ज़िन्दगी से डरने लगा हूँ 
क्या होगा 
आने वाले बरसों में 
डर से सहमने लगा हूँ 
क्यों बूढा होता इंसान 
निरंतर सोचता हूँ 
क्यों लौटता नहीं बचपन 
खुदा से पूछता हूँ
 फिर खुद को संभालता हूँ 
खुद से कहता हूँ 
जो होना होगा हो 
जाएगा 
जब होगा देखा जाएगा 
अभी से क्यूं 
हाल को बेहाल करूँ 
जितना 
हँस सकूँ उतना हँस लूँ 
ज़िन्दगी मस्ती में 
गुजार लूँ  


किसी का जीवन भी व्यर्थ नहीं जाता 
नन्हा चूजा 
एक दिन बोला 
अपनी माँ से 
चील हमारी 
जान की दुश्मन 
उसको क्यों बनाया 
भगवान् ने 
माँ को समझ नहीं आया 
कैसे शांत करे चूजे की 
जिज्ञासा 
माँ उड़ गयी फुर्र से 
पकड़ कर लायी 
एक नन्हे कीड़े को 
चोंच में 
चूजे से बोली 
लो अपना पेट भर लो 
चूजा बोला 
पेट बाद में भरूंगा 
पहले मेरी बात सुन लो 
मुझे समझ गया 
क्यों भगवान् ने 
चील को बनाया 
जो भी भगवान् ने 
बनाया 
किसी ने किसी के 
काम आता 
किसी का जीवन भी 
व्यर्थ नहीं जाता
           
पतझड़ में 
फिर ठूठ सा दिखूंगा,
तब भी मेरी तरफ देखना ना भूलना

कई बार उस 
सड़क से निकलता था 
पर उस 
कचनार के पेड़ पर 
पहले कभी दृष्टि नहीं पडी 
आज जब फूलों से
 लद गया 
आने जाने वालों को 
अपनी ओर आकृष्ट 
कर रहा था 
बिरला ही कोई होगा 
जिसकी दृष्टी उसकी 
सुन्दरता देखने को नहीं 
उठती होगी 
अपने को रोक नहीं पाया 
मित्र को मन की 
इच्छा से अवगत 
कराया 
एक चित्र कचनार के 
साथ खीचने का आग्रह 
किया 
जैसे ही सुन्दरता से 
लुभा रहे कचनार के 
पास पहुंचा 
वो मुस्कराया 
फिर धीरे से बोला 
पतझड़ में मेरे पत्ते 
गिर गए थे 
एक ठूठ बन कर रह 
गया था 
तुम्हें यहाँ से निकलते 
हुए देखता था 
पर तुमने मेरी तरफ 
झांका तक नहीं 
आज जब फूलों से 
लद गया हूँ 
तुम अपना चित्र 
मेरे साथ खिचवाना 
चाहते हो 
इस बात की खुशी है 
पर ध्यान रखना 
अगले वर्ष पतझड़ में 
फिर ठूठ सा दिखूंगा 
तब भी मेरी तरफ 
देखना ना भूलना

 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
डा.राजेंद्र तेला 'निरंतर'
पेशे से दन्त चिकित्सक और रचनापरक व्यक्तित्व
संपर्क-'गुलमोहर',एच.-१,सागर विहार,वैशाली नगर
अजमेर--305004,मो.-:09352007181

ब्लॉग 

2 टिप्‍पणियां:

  1. सभी रचनाएं एक से बढ़कर हैं ... बधाई सहित शुभकामनाएं ।

    जवाब देंहटाएं
  2. बेहतरीन रचनाएं हैं, बहुत बहुत साधुवाद

    जवाब देंहटाएं

ज्यादा जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें

Responsive Ads Here