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फेसबुकी विमर्श:नन्द जी की ऐसी स्थापनाएं कतिपय साहित्यिकों को नागवार भी गुजरीं हैं

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on सोमवार, मार्च 19, 2012 | सोमवार, मार्च 19, 2012

(जाने माने वरिष्ठ पत्रकार और सम्पादक ओम थानवी जी की फेसबुक वाल से लिए विमर्श यहाँ साझा कर रहे हैं जो शायद एक बड़े विमर्श का साकेत करता है.-सम्पादक )

वामपंथी कवि नन्दभारद्वाज ने अज्ञेय को उनके सामाजिक सरोकारों के सन्दर्भ फिर से समझने की ज़रूरत बताई है. यह बात पिछले दिनों कोलकाता में डॉ शम्भुनाथ ने भी कही थी. नामवर सिंह, केदार नाथ सिंह, मैनेजर पांडे, उदय प्रकाश, राजेश जोशी, अरुण कमल आदि ने भी अज्ञेय जन्मशती वर्ष में अज्ञेय को सहृदयता से सिर्फ देखा है, अज्ञेय के साहित्य की वह मीमांसा की है जिसकी अपेक्षा उनके श्रीमुख से कम से कम कट्टर (साहित्य को भाषण, पत्रकारिता, नारों आदि की तरह तात्कालिक चीज़ समझने वाले) वामपंथी नहीं करते थे. बहरहाल, अपने (स्वाभाविक) पूर्वग्रहों के बावजूद नन्द जी का स्वर कई जगह सकारात्मक हुआ है, जिसका फेसबुक आदि पर स्वागत किया जा रहा है. पर नन्द जी की ऐसी स्थापनाएं कतिपय साहित्यिकों को नागवार भी गुजरीं हैं, जो अब भी अज्ञेय को समाज-विरोधी, पूंजीवादी, सीआईए का एजेंट जैसी गढ़ी हुई मूरत में ही देखना चाहते हैं.  

नन्द भारद्वाज कहते हैं: "अज्ञेय के काव्य-संसार में इस मानवीय संबंध और सामाजिक अनुभव से जुड़ी ऐसी कितनी ही कविताएं हैं, जहां वे अपने समय के केन्द्रीय सवालों और वृहत्तर मानवीय चिन्ताओं के साथ खडे दिखाई देते हैं. उनके प्रसंग में लोग बेशक वृहत्तर जन-सरोकारों की चर्चा करते संकोच करते हों, उनकी कविताएं इस बात की साक्षी हैं कि वे अपने सामयिक परिदृश्य में कविता के माध्यम से हस्तक्षेप करने वाले एक जागरूक कवि रहे हैं." इस नजरिए से परेशान लोग नन्द जी के ही लिखे इस समाहार को पढ़ कर संतोष नहीं कर पाते जहाँ वे सारी सकारात्मक उक्तियों के बाद कहते हैं कि "... गोकि यह उनका (अज्ञेय का) मूल स्वर नहीं है और बदलाव की उस समाजवादी प्रक्रिया के प्रति उनके मन में कोई आश्वस्ति ही." फिर भी, नन्द जी ने जो उदारता दिखाई, उसके लिए वे बधाई के हक़दार हैं.

पर मेरी जिज्ञासा यह है कि अगर किसी साहित्यकार का "मूल स्वर" वह नहीं हैं जो आप चाहते हैं और जिसके मन में बदलाव के उस प्रक्रिया के प्रति आश्वस्ति नहीं है जिसे आप ठीक समझते हैं, तो आप उस एक व्यक्ति पर इतनी ऊर्जा, अपना समय और श्रम, खर्च क्यों कर रहे हैं? जीवन इतना लम्बा तो नहीं कि काम का (आश्वस्तिकर) साहित्य छोड़कर आप अज्ञेय के ('अनाश्वस्त') साहित्य (!) में उलझे रहें?

ओम थानवी जी इस बात पर नन्द भारद्वाज के जवाब

अपने समय के हर महत्वपूर्ण रचनाकार के रचनात्मक अवदान को पढ़ना, समझना और उस पर अपनी राय रखना एक लेखक के नाते मैं अपना आवश्यक कर्म समझता हूं, मेरी दृष्टि में अज्ञेय हमारे समय के महत्वपूर्ण रचनाकार रहे हैं, जीवन-जगत के बारे में उनकी अपनी दृष्टि रही है, उससे सहमत-असहमत हुआ जा सकता है, लेकिन उनके प्रति मेरे मन में सदा आदर का भाव रहा है, इसी सोच और स्वस् मन से मैंने उन पर लिखना अपना कर्म समझा है। मेरे मन में अपने किये को लेकर कोई आशंका-दुविधा रही और किसी से सराहना की अपेक्षा। पाठक अपनी राय बनाने के लिए स्वतंत्र हैं।

मैं यहां यह भी जोड़ना जरूरी समझता हूं कि इसी जन् शताब्दी वर्ष में मैंने नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, और शमशेर पर भी लिखा है, फैज अहमद फैज पर केन्द्रित आयोजनों में उन पर भी अपनी बात कही है। इसलिए ओमजी की अंतिम पंक्तियां मुझे अनावश्यक लगी।

 यही जाने माने लेखक मोहन जी श्रोत्रिय के विचार 

किसी भी साहित्यकार (छोटे/बड़े) की रचनाओं के पुनर्पाठ और पुनर्मूल्यांकन की प्रक्रिया चलती रहती है, और उससे किसी को भी क्या आपत्ति हो सकती है? इसके उलट, कुछ नया सीखने-सराहने को ही मिलता है. लेकिन एक बात समझ नहीं आती, वह यह कि किसी व्यक्ति की "जीते-जी" संस्थाओं-संगठनों के साथ जो प्रकट/प्रच्छन्न सम्बद्धताएं रहीं, वे "मरणोपरांत" कैसे बदल या गौण हो जा सकती हैं? इस हद तक कि उनका कहीं उल्लेख मात्र उल्लेखकर्ता को "कट्टर" और उल्लेख करने वाले को "उदार" बना देता है. इतिहास से चीज़ों को चयनित ढंग से बहिष्कृत तो नहीं किया जा सकता ? किन-किन ने अपनी राय बदल ली, यह गिनाने से बेहतर यह हो कि बताया जाए कि उन्होंने अपनी राय बदल लेने के क्या आधार प्रस्तुत किए. उसी से बदली हुई राय के "टिकाऊपन" के बारे में थोडा बहुत अंदाज़ लग सकता है. कोई भी मूल्यांकन "अंतिम" नहीं होता, यह तो सब जानते हैं, और सामने भी रहा ही है.







मोहन जी की बात पर ओम थानवी
श्रोत्रिय जी ,सही है. जैसे नन्द जी को लगा मेरी आखिरी पंक्तियाँ अनावश्यक हैं (हालांकि कहने का तात्पर्य यह था कि अज्ञेय का "मूल स्वर" वह नहीं है जो नन्द जी प्रशंसा के बाद अनुभव कर रहे हैं; वरना वह स्वर नन्द जी को इतना अपनी ओर न खींचता), मुझे भी लगता है कि तमाम 'पुनर्परीक्षा' के बाद आप घूमते-फिरते वहीँ आ जाते हैं जहाँ से चले थे. यह ऐसा ही है कि कभी नामवर जी कहा करते थे "अज्ञेय सीमित सामाजिक सरोकारों के कवि हैं...हिंदी के बिहारी हैं." अब वे ऐसा नहीं मानते. वे उन्हें अब निरा प्रयोगवादी भी नहीं कहते. हाल में नेशनल बुक ट्रस्ट के लिए उन्होंने जो अज्ञेय पर पुस्तक सम्पादित की है, उसकी भूमिका देख लीजिए. अज्ञेय को "अमृत-पुत्र" कहते हुए वे लिखते हैं: "सच तो यह है कि अज्ञेय ने अपनी अप्रतिहत सृजन-यात्रा में प्रयोग के पड़ाव से आगे बढ़कर अपना एक नया भरा-पूरा काव्य-संसार रचा, जो सभी वादों से ऊपर है और टिकाऊ भी." 'अपने अपने अज्ञेय' का लोकार्पण करते हुए भी पिछले पखवाड़े उन्होंने कहा कि अज्ञेय अपने दौर के सबसे बड़े कवि थे; उनका योगदान वैसा ही है जैसा किसी दौर में तुलसी का था. 

मुझ में यह योग्यता नहीं कि नामवर जी पर टीका करूं; पर इतना तो है ही कि अज्ञेय के साहित्य का मूल स्वर अब नामवर जो को भी कुछ आश्वस्त करता है. यह अकारण नहीं है कि 'असाध्य वीणा' और 'नाच' जैसी कविताओं का ज़िक्र प्रशंसात्मक लहजे में वे बार-बार करते हैं, जो कहीं से सीधे-सीधे "सामाजिक बदलाव की समाजवादी प्रक्रिया" के प्रति "आश्वस्ति" का इज़हार नहीं करतीं. सो मेरा निवेदन इतना ही है कि अपनी गांठें खोलकर परीक्षा-पुनर्परीक्षा आदि करें, वरना प्रेत-बाधा दो कदम आगे, दो कदम पीछे वाला काम करती रहेगी. नन्द जी में खुली दृष्टि की सलाहियत है: जयपुर में दूरदर्शन के अज्ञेय उत्सव में उनका संबोधन मुझे याद है. यह ज़रूर है कि थोड़ा खुला तेवर दिखाया नहीं कि अपने लोग ही टांग खींचने लगते हैं. ऐसे क्षुद्र लोग कहाँ नहीं हैं. नामवर जी ने मुझे बताया था कि एनबीटी वाला संचयन संपादित करने पर 'साथियों' ने उन्हें बुरा-भला कहा. ऐसे साथियों का साथ पालते क्यों हैं, जो आपकी अपनी स्वतंत्रता बर्दाश्त नहीं करते, औरों की क्या करेंगे!


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