जनोत्सव अभियान:छोटी शुरुआत के मायने - Apni Maati Quarterly E-Magazine

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जनोत्सव अभियान:छोटी शुरुआत के मायने


जनपथ के बाबा नागार्जुन विशेषांक का लोकार्पण

जनराजनीति और जनांदोलन की धारा से निकली नाट्य संस्था ‘युवानीति’ ने पिछले माह से जनोत्सव अभियान की शुरुआत की है, जिसमें रंगकर्मी, गायक, कवि-साहित्यकार शहर के वार्डों में जाकर सांस्कृतिक आयोजन कर रहे हैं। इस बार यहीं से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘जनपथ’ के नागार्जुन विशेषांक पर साथियों ने कथाकार मधुकर सिंह के गांव धरहरा में एक कार्यक्रम रखा था। लकवे के बाद मधुकर सिंह के लिए कहीं दूसरी जगह जा पाना थोड़ा कठिन है। इस कारण भी उन्हीं के गांव में हमें पहुंचना था। मैं माले कार्यालय में ही साहित्यकार मित्रों का इंतजार करता रहा। जब कवि जितेंद्र कुमार, कथाकार अनंत कुमार सिंह, भोला कवि, आशुतोष पांडेय आदि आए तो हम एक साथ मधुकर जी के गांव पहुंचे, जो करीब तीन किमी दूर आरा शहर के पूर्वोत्तर छोर पर है। मधुकर सिंह के वार्ड से लगातार जनता के आंदोलन और वामपंथी राजनीति से जुड़े उम्मीदवार ही पार्षद बनते रहे हैं। गांव के लोगों ने बड़ा सा शामियाना लगा रखा था। कुर्सी और टेबुल के साथ माइक और लाउडस्पीकर का प्रबंध भी उन्होंने खुद ही किया था। जसम के बिहार राज्य अध्यक्ष रामनिहाल गंुजन, राज्य पार्षद रंगकर्मी अरुण प्रसाद, युवानीति के संयोजक राजू रंजन आदि हमसे पहले ही वहां पहुंच चुके थे। कवि सुमन कुमार सिंह और सुनील चौधरी हमारे बाद वहां पहुंचे। 

युवानीति के कलाकारों- राजू रंजन, सूर्य प्रकाश, रतन देवा और अमित मेहता ने शंकर शैलेंद्र के गीत ‘झूठे सपनों के छल से निकल चलती सडकों पर आ’ और रमाकांत द्विवेदी रमता के गीत ‘अइसन गांव बना दे जहंवा जालिम जमींदार ना रहे’ के गायन के साथ कार्यक्रम की शुरुआत की। इसी बीच एक रिक्शे से मधुकर सिंह आयोजन स्थल पर पहुंचे। संचालन की जिम्मेवारी अरुण प्रसाद ने सुमन कुमार सिंह को सौंप दी। हम सबको देखकर मधुकर जी काफी प्रफुल्लित थे। पहले उन्होंने जनपथ के नागार्जुन विशेषांक का लोकार्पण किया। उसके बाद हम सबको सहयात्री लेखक, गीतकार, कलाकार बताते हुए उन्होंने अपने गांव में स्वागत किया। उन्होंने जनता को राजनीतिक तौर पर जागरूक बनाने वाली संस्था के बतौर ‘युवानीति’ की भूमिका को बड़ी शिद्दत से याद किया और कहा कि इस संस्था ने लोगों की साहित्य, समाज और राजनीति के प्रति रुचि बढ़ाने और लोगों को सचेत बनाने का काम किया है। यह लोकार्पण भी इसी का उदाहरण है। 

कवि जितेंद्र कुमार ने कहा कि बाबा नागार्जुन ने अपनी कविताओं और उपन्यासों में किसानों के संघर्ष का चित्रण किया। उनकी ‘भोजपुर’ कविता और ‘बलचनवा’ उपन्यास इसी का उदाहरण हैं। हम साहित्यकार संघर्षशील जनता के यथार्थ को अभिव्यक्त करना चाहते हैं, साहित्य और कला से ग्रामीणों और मेहनतकशों को काट देने की जो सत्ता की साजिश है, हम उसके खिलाफ हैं और पत्रिकाएं हमारे लिए संघर्ष के सांस्कृतिक हथियार की तरह हैं। सत्ता से जुड़े लोग 10-20 साल में ही कैसे अरबों रुपये लूट रहे हैं और देश की 77 प्रतिशत जनता बीस रुपये से कम दैनिक आमदनी पर जीवन गुजारने को क्यों मजबूर है, हम अपने साहित्य में इन सवालों को उठाना चाहते हैं। आम किसान-मजदूर स्त्री-पुरुष का फसल के उत्पादन और बच्चों की शिक्षा के साथ-साथ जीवन की बेहतरी के तमाम पहलू हमारे लिए रचना का विषय हैं। बाबा नागार्जुन पर केंद्रित ‘जनपथ’ के इस विशेषांक में यह दृष्टि स्पष्ट रूप से दिखती है। 

जनपथ संपादक कथाकार अनंत कुमार सिंह ने कहा कि नागार्जुन किसान-मजदूरों और आम जन के कवि थे। किसान आंदोलन के कथाकार मधुकर सिंह के ग्रामवासियों के बीच नागार्जुन के बारे मंे चर्चा करना बेहद महत्वपूर्ण है। विशेषांक के संपादकीय के हवाले से उन्होंने कहा कि सचमुच बाबा नागार्जुन महज क्रांति की आकांक्षा नहीं, बल्कि क्रांति के कर्म के कवि हैं। 

वरिष्ठ आलोचक रामनिहाल गुंजन ने कहा कि बाबा नागार्जुन ने अपने देश के मेहतनकश वर्ग की जिंदगी को बदलने के लिए आजीवन रचनात्मक संघर्ष किया, उनके इस संघर्ष को ‘जनपथ’ का विशेषांक बखूबी रेखांकित करता है। बाबा की खासियत यह है कि उन्होंने जनता की भाषा को पकड़कर अपनी बात कही और जनता की सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनैतिक चेतना को उन्नत बनाने का कार्य किया। उन्होंने बताया कि गरीब अगर भूखा है, तो भजन से उसकी भूख मिटने वाली नहीं है, बल्कि उसे संघर्ष करना होगा। उन्होंने न केवल अपने आसपास की सच्चाइयों पर लिखा, बल्कि ‘भोजपुर’ जैसी कई कविताओं के जरिए पूरे देश में जनजागरण का संदेश दिया। 

बतौर अतिथि संपादक मुझे भी बोलना था। मुझे तो यही विशेष लग रहा था कि नागार्जुन और मधुकर सिंह दोनों जनांदोलन और खासकर किसान आंदोलन और सामाजिक-आर्थिक बदलाव के संघर्षों के रचनाकार रहे हैं। जेपी आंदोलन के दौरान भी दोनों साथ-साथ थे। दोनों साहित्य की परिवर्तनकारी ताकत में यकीन करनेवाले रचनाकार रहे हैं। इस नाते यह बड़ा ही ऐतिहासिक मौका है कि अपनी शारीरिक अक्षमता के बावजूद एक कथाकार अपने अग्रज क्रांतिधर्मी रचनाकार पर केंद्रित विशेषांक का लोकार्पण करने के लिए उत्साह के साथ मौजूद है। यह रामनिहाल गुंजन का आग्रह था कि इस विशेषांक का लोकार्पण मधुकर सिंह के हाथों से ही होना चाहिए। उन्हीं का सुझाव था कि यह आयोजन मधुकर जी के गांव में ही होना चाहिए। नागार्जुन जिस तरह प्रगतिशील-जनवादी-वाम-लोकतांत्रिक धारा के सर्वमान्य और सर्वप्रिय रचनाकार रहे हैं, उन्हें याद करने की सार्थकता भी यही है कि परिवर्तनकामी साहित्यकारों की बड़ी एकता बने। साहित्यकारों का जनसरोकार और राजनीतिक भूमिका बढ़े। बाकी संपादन का श्रेय भले एक व्यक्ति को मिले, पर उसमें सामूहिक उर्जा लगी होती है। लेखक बंधुओ, मित्रों, कामरेडों और कुछ करीबी रिश्तदारों का भरपूर सहयोग न होता, तो शायद इस रूप में नागार्जुन विशेषांक को निकाल पाना संभव न होता। यही सब मैंने बोला। मधुकर जी काफी आह्लादित और उत्साहित दिख रहे थे, इससे भी बहुत सुकून मिल रहा था।  

इस आयोजन में भोला कवि ने अपनी कविता ‘मैं आदमी हूं’ के जरिए मनुष्य की परिवर्तनकारी ताकत के प्रति आस्था जाहिर किया। उन्होंने कहा कि जनशक्ति से बड़ी कोई शक्ति नहीं है, पर जन कहीं फंसा हुआ है, जिसकी मुक्ति की लड़ाई लड़नी है। समापन युवानीति ने मधुकर सिंह के गीत ‘सुनो सुनाता हूं भोजपुर की कहानी’ को गाकर किया, जिसमें भोजपुर के क्रांतिकारी आंदोलन की गौरवगाथा दर्ज है। धन्यवाद ज्ञापन वार्ड पार्षद सुरेंद्र साह ने किया। युवानीति ने फिर अगले रविवार को उसी स्थल पर नाटक के मंचन की घोषणा की। 


 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-


सुधीर सुमन
सदस्य,
राष्ट्रीय  कार्यकारिणी,
जन संस्कृति मंच 
s.suman1971@gmail.com
मो. 09868990959

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