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संदीप कुमार उर्फ़ माया मृग की नई कवितायेँ

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शुक्रवार, मार्च 23, 2012 | शुक्रवार, मार्च 23, 2012


कविता शृंखला :गलत व्‍याकरण (दस कविताएं)
एक : संज्ञा
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शून्‍य से परे
अर्थ ढूंढा किए
पर शून्‍य में लौट आए..
अर्थ तो यहीं कहीं था
संज्ञाएं मौन हैं..
जिस नाम में संज्ञा ठीक थी
वह भूल गया....।

दो: सर्वनाम
-----------
जिसे संज्ञा की जगह बिठाया
वह पीछे छिपी
सब तमाशा देखती रही
सारी कोशिश व्‍यर्थ गई
झीना सा परदा था
सरकाया भी....नहीं भी
सच झांकता रहा रह रह
नाम
इतनी आसानी से सर्वनाम नहीं बन जाते...।

तीन :विशेषण
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सुबह उठना
दिन भर भागना
इसमें कुछ विशेष नहीं था
जो विशेष था
वह इन सबमें नहीं था
अच्‍छा था कि बुरा
बड़ा था कि छोटा
जो हाथ आया....वह कुछ था ही नहीं
कुछ था कहीं जरुर
जो छूट गया...।

चार : क्रिया
------------
कुछ तो किया ही
कुछ ना कुछ किया ही
करते भी रहे
रोते भी रहे, हाय ये क्‍या किया...

पांच : विलोम
-------------
सोचने जितनी फुर्सत
कहने जितना वक्‍त
लिखने जितनी मोहलत
मिल जाती
तो हम जि़न्‍दगी लिखते....।

छह: पर्यायवाची
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फूल कहा
शराब पी....
बादल कहा
रो दिए....
हंसी कहा
रो दिए.....
कहने सुनने से आगे बढ़ आए
दोस्‍ती पककर तैयार थी
पका फल
पेड़ पर टिकता ही कितने दिन है.....

सात: काल
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गलियों में निशान ढूंढकर
खण्‍डहरों में टेर लगाकर
ठहाकों की रिहर्सल करके
दिन लौट आते
तो जरुर लौट आते अब तक....।

आठ: बहुवचन
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वचन दिया था
साथ रहेंगे
सदा सदैव...
ऐसे वचन
बहुतों ने लिए होंगे...अब तक

नौ : लिंग
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मां होती
खुश रहता
पत्‍नी मिली
खुश रहा...
खुश रह सकूं
बेटी ना हो अब....।

दस: मुहावरे
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पानी पानी में मिला
गागरें गागरों से
टकराती रहीं
सागर सरक कर सागर से जा मिला
पानी-पानी कौन हुआ
विमर्शों में
कविता में सच ढूंढने से बेहतर
और आसान था
सागर में गिरी सुई ढूंढ लेना....।

 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
संदीप कुमार उर्फ़ माया मृग
(माया मृग साहित्य जगत में ऐसा नाम है जिसके बहाने लोगों ने बोधि प्रकाशन की जन संस्करण से अपनी पाठकीयता को बढाया है.इनकी पहचान कुशल प्रबंधक की है इसके साथ ही कविता में गहरी रूचि है.हमारी जानकारी में उनका एक कविता संग्रह भी आ चुका है.मूल रूपेण हनुमानगढ़ के निवासी है मगर अब जयपुर के होकर रह गए हैं. )
फेसबुक खाता
ई-मेल
मो.-09829018087


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