Latest Article :
Home » , , , , , , » हिन्दुस्तान प्रजातंत्र समाजवादी सभा का घोषणापत्र

हिन्दुस्तान प्रजातंत्र समाजवादी सभा का घोषणापत्र

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on मंगलवार, मार्च 27, 2012 | मंगलवार, मार्च 27, 2012


{राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान क्रांतिकारियों की निंदा में कांग्रेस ब्रिटिश सरकार से भी एक कदम आगे रहती थी. 23 दिसम्बर , 1929 को क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के स्तम्भ वायसराय की गाडी को उड़ाने का प्रयास किया, लेकिन जो असफल रहा! गांधी जी ने इस घटना पर एक कटुतापूर्ण लेख " बम की पूजा" लिखा, जिसमें उन्होंने वायसराय को देश का शुभचिंतक और नवयुवकों को आज़ादी के रास्ते में रोड़ा अटकानेवाले कहा ! इसी के जवाब में हिन्दुस्तान प्रजातंत्र समाजवादी सभा की ओर से भगवतीचरण वोहरा ने " बम का दर्शन " लेख लिखा, जिसका शीर्षक "हिन्दुस्तान प्रजातंत्र समाजवादी सभा का घोषणापत्र " रखा ! भगत सिंह ने जेल में इसे अंतिम रूप दिया ! 26 जनवरी , 1930 को इसे देश-भर में बांटा गया !}:पाठक हित में संजीव कुमार के फेसबुक नोट से यहाँ साभार प्रकाशित कर रहे हैं.-सम्पादक 

हाल ही की घटनाएं ! विशेष रूप से 23 दिसंबर , 1929 को वायसराय की स्पेशल ट्रेन उड़ाने का जो प्रयत्न किया गया था, उसकी निंदा करते हुए कांग्रेस द्वारा पारित किया गया प्रस्ताव तथा "यंग इंडिया " में गाँधी जी द्वारा लिखे गए लेखों से स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने गाँधी जी से सांठ-गाँठ कर भारतीय क्रांतिकारियों के विरुद्ध घोर आन्दोलन प्रारंभ कर दिया है ! जनता के बीच भाषणों तथा पत्रों के माध्यम से क्रांतिकारियों के विरुद्ध बराबर प्रचार किया जाता रहा है ! या तो यह जान-बूझकर किया गया या फिर केवल अज्ञान के कारण उनके विषय में गलत प्रचार होता रहा और उन्हें गलत समझा जाता रहा ; परन्तु क्रांतिकारी अपने सिद्धांतों तथा कार्यों की ऐसी आलोचना से नहीं घबराते हैं ! बल्कि वे ऐसी आलोचना का स्वागत करते हैं, क्योंकि वे इसे इस बात का स्वर्ण अवसर मानते हैं कि ऐसा करने से उन्हें उन लोगों को क्रांतिकारियों के मूलभूत सिद्धांतों तथा उच्चादर्शों को, जो उनकी प्रेरणा तथा शक्ति के अनवरत स्रोत हैं, समझाने का अवसर मिलता है ! आशा की जाती है कि इस लेख द्वारा आम जनता को यह जानने का अवसर मिलेगा कि क्रांतिकारी क्या हैं, और उनके विरुद्ध किये गए, भ्रमात्मक प्रचार से उत्पन्न होने वाली गलतफहमियों से उन्हें बचाया जा सकेगा !


पहले हम हिंसा और अहिंसा के प्रश्न पर ही विचार करें ! हमारे विचार से इन शब्दों का प्रयोग ही गलत किया गया है, और ऐसा करना ही दोनों दलों के साथ अन्याय करना है, क्योंकि इन शब्दों से दोनों ही दलों के सिद्धांतों का स्पष्ट बोध नहीं हो पाता ! "हिंसा" का अर्थ है अन्याय के लिए किया गया बल-प्रयोग, परन्तु क्रांतिकारियों का तो यह उद्देश्य नहीं है, दूसरी और अहिंसा का जो आम अर्थ समझा जाता है, वह है आत्मिक शक्ति का सिद्धांत ! उसका प्रयोग व्यक्तिगत तथा राष्ट्रीय अधिकारों को प्राप्त करने के लिए किया जाता है ! अपने-आपको कष्ट देकर आशा की जाती है कि इस प्रकार अंत में अपने विरोधी का ह्रदय-परिवर्तन संभव हो सकेगा !


एक क्रन्तिकारी जब कुछ बातों को अपना अधिकार मान लेता है तो वह उनकी मांग करता है, अपनी उस मांग के पक्ष में दलीलें देता है, समस्त आत्मिक शक्ति द्वारा उन्हें प्राप्त करने की इच्छा करता है, उसकी प्राप्ति के लिए अत्यधिक कष्ट सहन करता है, इसके लिए वह बड़े से बड़ा त्याग करने के लिए प्रस्तुत रहता है और उसके समर्थन में वह अपना समस्त शारीरिक बल-प्रयोग भी करता है ! इसके इन प्रयत्नों को आप चाहे जिस नाम से पुकारें, परन्तु आप इन्हें हिंसा के नाम से संबोधित नहीं कर सकते, क्योंकि ऐसा करना कोष में दिए गए इस शब्द के अर्थ के साथ अन्याय होगा ! सत्याग्रह का अर्थ है सत्य के लिए आग्रह ! उसकी स्वीकृति के लिए केवल आत्मिक शक्ति के प्रयोग का ही आग्रह क्यों ? इसके साथ साथ शारीरिक बल-प्रयोग भी (क्यों) किया जाये ? क्रन्तिकारी स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए अपनी शारीरिक एवं नैतिक शक्ति दोनों के प्रयोग में विश्वास करता है, परन्तु नैतिक शक्ति का प्रयोग करने वाले शारीरिक बल-प्रयोग को निषिद्ध मानते हैं ! इसलिए अब सवाल यह नहीं है कि आप हिंसा चाहते हैं या अहिंसा, बल्कि प्रश्न तो यह है कि आप अपनी उद्देश्य-प्राप्ति के लिए शारीरिक बल सहित नैतिक बल का प्रयोग करना चाहते हैं, या केवल आत्मिक शक्ति का

क्रांतिकारियों का विश्वास है कि देश को क्रांति से ही स्वतंत्रता मिलेगी ! वे जिस क्रांति के लिए प्रयत्नशील हैं और जिस क्रांति के रूप उनके सामने स्पष्ट है उसका अर्थ केवल यह नहीं है कि विदेशी शासकों तथा उनके पिट्ठुओं से क्रांतिकारियों का केवल सशस्त्र संघर्ष हो , बल्कि इस सशस्त्र संघर्ष के साथ-साथ नवीन सामाजिक व्यवस्था के द्वार देश के लिए मुक्त हो जाएँक्रांति पूंजीवाद,वर्गवाद, तथा कुछ लोगों को ही विशेषाधिकार दिलाने वाली प्रणाली का अंत कर देगी ! यह राष्ट्र को अपने पैरों पर खड़ा करेगी, उससे नवीन राष्ट्र और नए समाज का जन्म होगा ! क्रांति से सबसे बड़ी बात तो यह होगी कि वह मजदूरों तथा किसानो का राज्य कायम कर उन सब सामजिक आवांछित तत्वों को समाप्त कर देगी जो देश कि राजनैतिक शक्ति को हथियाए बैठे हैं !



आज की तरुण पीढ़ी को जो मानसिक गुलामी तथा धार्मिक रूढ़िवादी बंधन जकड़े हैं और उससे छुटकारा पाने के लिए तरुण समाज की जो बेचैनी है, क्रन्तिकारी  उसी में प्रगतिशीलता के अंकुर देख रहा है ! नवयुवक जैसे-जैसे मनोविज्ञान आत्मसात करता जाएगा वैसे-वैसे राष्ट्र कि गुलामी का चित्र उसके सामने स्पष्ट होता जाएगा तथा उसकी देश को स्वतंत्र करने की इच्छा प्रबल होती जाएगी ! और उसका यह क्रम तब तक चलता रहेगा जब तक कि युवक न्याय , क्रोध और क्षोभ से ओतप्रोत हो अन्याय करने वालों की हत्या प्रारंभ कर दे ! इस प्रकार देश में आतंकवाद का जन्म होता है ! आतंकवाद सम्पूर्ण क्रांति नहीं और क्रांति भी आतंकवाद के बिना पूर्ण नहीं ! यह तो क्रांति का एक आवश्यक और आवाश्यम्भावी अंग है ! इस सिद्धांत का समर्थन इतिहास की किसी भी क्रांति का विश्लेषण कर जाना जा सकता है ! आतंकवाद आतताई के मन में भय पैदा कर पीड़ित जनता में प्रतिशोध की भावना जाग्रत कर उसे शक्ति प्रदान करता है ! अस्थिर भावना वाले लोगों को इससे हिम्मत बंधती है तथा उनमें आत्मविश्वास पैदा होता है ! इससे दुनिया के सामने क्रांति के उद्देश्य का वास्तविक रूप प्रकट हो जाता है क्योंकि ये किसी राष्ट्र की स्वतंत्रता की उत्कट महत्वाकांक्षा का विश्वास दिलाने वाले प्रमाण हैं, जैसे- दुसरे देशों में होता आया है, वैसे ही भारत में भी आतंकवाद क्रांति का रूप धारण कर लेगा और अंत में क्रांति से ही देश को सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक स्वतंत्रता मिलेगी !


तो यह हैं क्रांतिकारी के सिद्धांत, जिनमें वह विश्वास करता है और जिन्हें देश के लिए प्राप्त करना चाहता है ! इस तथ्य की प्राप्ति के लिए वह गुप्त तथा खुले-आम दोनों ही तरीकों से प्रयत्न कर रहा है ! इस प्रकार एक शताब्दी से संसार में जनता तथा शासक वर्ग में जो संघर्ष चला रहा है, वही अनुभव उसके लक्ष्य पर पहुँचने का मार्गदर्शक है ! क्रन्तिकारी जिन तरीकों में विश्वास करता है, वे कभी असफल नहीं हुए

इस बीच कांग्रेस क्या कर रही थी? उसने अपना ध्येय स्वराज्य से बदलकर पूर्ण स्वतंत्रता घोषित किया ! इस घोषणा से कोई भी व्यक्ति यही निष्कर्ष निकालेगा की कांग्रेस ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर क्रांतिकारियों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी है ! इस सम्बन्ध में कांग्रेस का पहला वार था उसका वह प्रस्ताव जिसमें 23 दिसंबर , 1929 को वायसराय की स्पेशल ट्रेन उड़ाने के प्रयत्न की निंदा की गयी ! इस प्रस्ताव का मसविदा गाँधी जी ने तैयार किया था और उसे पारित कराने के लिए गाँधी जी ने अपनी सारी शक्ति लगा दी ! परिणाम यह हुआ की 1913 की सदस्य संख्या में वह केवल 31 अधिक मतों से पारित हो सका ! क्या इस अत्यल्प में भी राजनैतिक इमानदारी थी ? इस सम्बन्ध में हम सरलादेवी चौधरानी का मत ही यहाँ उद्द्वत करें ! वे तो जीवन भर कांग्रेस की भक्त रही हैं ! इस सम्बन्ध में प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा था - मैंने महात्मा गाँधी के अनुयायियों के साथ इस विषय में जो बात-चीत की, उससे मुझे मालूम हुआ कि वे इस सम्बन्ध में अपने स्वतंत्र विचार महात्मा जी के प्रति व्यक्तिगत निष्ठां के कारण प्रकट कर सके, तथा इस प्रस्ताव के विरुद्ध मत देने में असमर्थ रहे, जिसके प्रणेता महात्मा जी थे ! जहाँ तक गाँधी जी की दलील का प्रश्न है, उस पर हम बाद में विचार करेंगे ! उन्होंने जो दलीलें दी हैं वे कुछ कम या अधिक इस सम्बन्ध में कांग्रेस में दिए गए भाषण का ही विस्तृत रूप है !  

इस दुखद प्रस्ताव के विषय में एक बात मार्के की है जिसे हम अनदेखा नहीं कर सकते, वह यह की यह सर्वविदित है कि कांग्रेस अहिंसा के सिद्धांत मानती है और पिछले दस वर्षों से वह इसके समर्थन में प्रचार करती रही है ! यह सब होने पर भी प्रस्ताव के समर्थन में भाषणों में गाली-गलौज की गयी ! उन्होंने क्रांतिकारियों को बुजदिल कहा और उनके कार्यों को घ्रणित ! उनमें से एक वक्ता ने धमकी देते हुए यहाँ तक कह डाला की यदि वे (सदस्य) गाँधी जी का नेतृत्व चाहते हैं तो उन्हें इस प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पारित करना चाहिए ! इतना सबकुछ किये जाने पर भी यह प्रस्ताव बहुत थोड़े मतों से ही पारित हो सका ! इससे यह बात निशंक प्रमाणित हो जाती है कि देश की जनता प्रयाप्त संख्या में क्रांतिकारियों का समर्थन कर रही है ! इस तरह से इसके लिया गाँधी जी हमारी बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने इस प्रश्न पर विवाद खड़ा किया और इस प्रकार संसार को दिखा दिया कि कांग्रेस, जो अहिंसा का गढ़ माना जाता है, वह सम्पूर्ण नहीं तो एक हद तक तो कांग्रेस से अधिक क्रांतिकारियों के साथ है


इस विषय में गाँधी जी ने जो विजय प्राप्त की वह एक प्रकार की हार ही के बराबर थी और अब वे "दि कल्ट ऑफ़ दि बम" लेख द्वारा क्रांतिकारियों पर दूसरा हमला कर बैठे हैं ! इस सम्बन्ध में आगे कुछ कहने से पूर्व इस लेख पर हम अच्छी तरह विचार करेंगे ! इस लेख में उन्होंने तीन बातों का उल्लेख किया है ! उनका विश्वास, उनके विचार और उनका मत ! हम उनके विश्वास के सम्बन्ध में विश्लेषण नहीं करेंगे, क्योंकि विश्वास में तर्क के लिए स्थान नहीं है ! गाँधी जी जिसे हिंसा कहते हैं और जिसके विरुद्ध उन्होंने जो तर्कसंगत विचार प्रकट किये हैं, हम उनका सिलसिलेवार विश्लेषण करें


गाँधी जी सोचते हैं कि उनकी यह धारणा सही है कि अधिकतर भारतीय जनता को हिंसा की भावना छू तक नहीं गयी है और अहिंसा उनका राजनैतिक शस्त्र बन गया है ! हाल ही में उन्होंने देश का जो भ्रमण किया है उस अनुभव के आधार पर उनकी यह धारणा बनी है, परन्तु उन्हें अपनी इस यात्रा के इस अनुभव से इस भ्रम में पड़ना चाहिए ! यह बात सही है (कांग्रेस) नेता अपने दौरे वहीँ तक सीमित रखता है जहाँ तक डाक गाडी उसे आराम से पहुंचा सकती है, जबकि गाँधी जी ने अपनी यात्रा का दायरा वहां तक बढ़ा दिया है जहाँ तक की मोटर कार द्वारा वह जा सकें ! इस यात्रा में वह धनी व्यक्तियों के ही निवास स्थानों पर रुके ! इस यात्रा का अधिकतर समय उनके भक्तों द्वारा आयोजित गोष्ठियों में की गयी उनकी प्रशंसा, सभाओं में यदा-कदा अशिक्षित जनता को दिए जाने वाले दर्शनों में बीता, जिसके विषय में उनका दावा है कि वे उन्हें अच्छी तरह समझते हैं, परन्तु यही बात इस दलील के विरुद्ध है कि वे आम जनता की विचारधारा को जानते हैं


कोई व्यक्ति जन-साधरण की विचारधारा को केवल मंचों से दर्शन और उपदेश देकर नहीं समझ सकता ! वह तो केवल इतना ही दावा कर सकता है कि उसने विभिन्न विषयों पर अपने विचार जनता के सामने रखे ! क्या गाँधी जी ने इन वर्षों में आम जनता के सामजिक जीवन में भी कभी प्रवेश करने का प्रयत्न किया ? क्या कभी उन्होंने किसी संध्या को गाँव की किसी चौपाल की अलाव के पास बैठकर किसी किसान के विचार जानने का प्रयत्न किया ? क्या किसी कारखाने के मजदूर के साथ एक भी शाम गुजारकर उसके विचार समझने की कोशिश की है ? पर हमने यह किया है और इसीलिए हम दावा करते हैं की हम आम जनता को जानते हैं ! हम गाँधी जी को विश्वास दिलाते हैं कि साधारण भारतीय साधारण मानव के सामान ही अहिंसा तथा अपने शत्रु से प्रेम करने की आध्यात्मिक भावना को बहुत कम समझता है ! संसार का तो यही नियम है - तुम्हारा एक मित्र है, तुम उससे स्नेह करते हो, कभी-कभी तो इतना अधिक कि तुम उसके लिए अपने प्राण भी दे देते हो ! तुम्हारा शत्रु है , तुम उससे किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं रखते हो ! क्रांतिकारियों का यह सिद्धांत नितांत सत्य, सरल और सीधा है और यह ध्रुव सत्य आदम और हौवा के समय से चला रहा है तथा इसे समझने में कभी किसी को कठिनाई नहीं हुई ! हम यह बात स्वयं के अनुभव के आधार पर कह रहे हैं ! वह दिन दूर नहीं जब लोग क्रन्तिकारी विचारधारा को सक्रिय रूप देने के लिए हज़ारों की संख्या में जमा होंगे


गाँधी जी घोषणा करते हैं कि अहिंसा के सामर्थ्य तथा अपने आपको पीड़ा देने की प्रणाली से उन्हें यह आशा है कि वह एक दिन विरोधी शासकों का ह्रदय परिवर्तन कर अपनी विचारधारा का उन्हें अनुयायी बना लेंगे ! अब उन्होंने अपने सामजिक जीवन की इस चमत्कार की 'प्रेम संहिता' के प्रचार के लिये अपने आपको समर्पित कर दिया है ! वे अडिग विश्वास के साथ उसका प्रचार कर रहे हैं, जैसा कि उनके कुछ अनुयायियों ने भी किया है ! परन्तु क्या वे बता सकते हैं कि भारत में कितने शत्रुओं का ह्रदय परिवर्तन कर वे उन्हें भारत का मित्र बनाने में समर्थ हुए हैं ? वे कितने ओडायरों, डायरों तथा रीडिंग और इरविन को भारत का मित्र बना सकें हैं ? यदि किसी को भी नहीं तो भारत उनकी इस विचारधारा से कैसे सहमत हो सकता है कि वे इंग्लैंड को अहिंसा द्वारा समझा बुझाकर इस बात को स्वीकार करने के लिए तैयार कर लेंगे कि वह भारत को स्वतंत्रता दे दे


यदि वायसराय की गाडी के नीचे बमों का ठीक से विष्फोट हुआ होता तो दो में से एक बात अवश्य हुई होती, या तो वायसराय अत्यधिक घायल हो जाते या उनकी मृत्यु हो गयी होती ! ऐसी स्थिति  में वायसराय तथा राजनैतिक दलों के नेताओं के बीच मंत्रणा हो पाती, यह प्रयत्न रुक जाता और उससे राष्ट्र का भला ही होता ! कलकत्ता कांग्रेस की चुनौती के बाद भी स्वशासन की भीख मांगने के लिए वायसराय भवन के आस-पास मंडराने वालों के यह घृणास्पद प्रयत्न विफल हो जाते ! यदि बमों का ठीक से विस्फोट हुआ होता तो भारत का एक शत्रु उचित सजा पा जाता ! "मेरठ" तथा "लाहौर षड्यंत्र" और "भुसावल काण्ड" का मुकदमा चलाने वाले केवल भारत के शत्रुओं को ही मित्र प्रतीत हो सकते हैं ! साइमन कमीशन के सामूहिक विरोध से देश में जो एकजुटता स्थापित हो गयी थी, गाँधी तथा नेहरु की राजनैतिक "बुधिमत्ता" के बाद ही इरविन उसे छिन्न-भिन्न  करने में समर्थ हो सका ! आज कांग्रेस में भी आपस में फूट पड़ गयी है ! हमारे इस दुर्भाग्य के लिए वायसराय या उसके चाटुकारों के सिवा कौन ज़िम्मेदार हो सकता है ! इस पर भी हमारे देश में ऐसे लोग हैं जो उसे भारत का मित्र कहते हैं


देश में ऐसे लोग भी हैं जिन्हें कांग्रेस के प्रति श्रद्धा नहीं, इससे वे कुछ आशा भी नहीं करते ! यदि गाँधी जी क्रांतिकारियों को इस श्रेणी में गिनते हैं तो वे उनके साथ अन्याय करते हैं ! वे इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि कांग्रेस ने जन-जागृति का महत्वपूर्ण कार्य किया है ! उसने आम जनता में स्वतंत्रता की भावना जागृत की है, क्योंकि उनका यह दृढ़ विश्वास है कि जब तक कांग्रेस में सेन गुप्ता जैसे "अद्भुत प्रतिभाशाली" व्यक्तियों का, जो वायसराय की ट्रेन उड़ाने में गुप्तचर विभाग का हाथ होने की बात करते हैं, तथा अंसारी जैसे लोग, जो राजनीति कम जानते हैं और उचित तर्क की उपेक्षा कर बेतुकी और तर्कहीन दलील देकर यह कहते हैं कि किसी राष्ट्र ने बम से स्वतंत्रता नहीं प्राप्त की- जब तक कांग्रेस के निर्णयों में इनके-जैसे विचारों का प्राधान्य रहेगा, तब तक देश उससे बहुत कम आशा कर सकता है ! क्रन्तिकारी तो उस दिन की प्रतीक्षा में हैं जब कांग्रेसी आन्दोलन से अहिंसा की यह सनक समाप्त हो जाएगी और वह क्रांतिकारियों के कंधे से कन्धा मिलाकर पूर्ण स्वतंत्रता के सामूहिक लक्ष्य की और बढ़ेगी ! इस वर्ष कांग्रेस ने इस सिद्धांत को स्वीकार कर लिया है, जिसका प्रतिपादन क्रांतिकारी पिछले 25 वर्षों से करते चले रहे हैं ! हम आशा करें कि अगले वर्ष यह स्वतंत्रता प्राप्ति के तरीकों का भी समर्थन करेगी


गाँधी जी यह प्रतिपादित करते हैं कि जब-जब हिंसा का प्रयोग हुआ है तब-तब सैनिक खर्च बढ़ा है ! यदि उनका मंतव्य क्रांतिकारियों की पिछली 25 वर्षों की गतिविधियों से है तो हम उनके वक्तव्य को चुनौती देते हैं कि वे अपने इस कथन को तथ्य और आकड़ों से सिद्ध करें ! बल्कि हम तो यह कहेंगे कि उनके अहिंसा और सत्याग्रह के प्रयोगों का परिणाम, जिनकी तुलना स्वतंत्रता संग्राम से नहीं की जा सकती, नौकरशाही अर्थ-व्यवस्था पर हुआ है ! आंदोलनों का, फिर वे हिंसात्मक हो या अहिंसात्मक, सफल हों या असफल, परिणाम तो भारत की अर्थव्यवस्था पर होगा ही


हमें समझ नहीं आता कि देश में सरकार ने जो विभिन्न वैधानिक सुधार किये, गाँधी जी उनमें हमें क्यों उलझाते हैं ? उन्होंने मार्लोमिंटो रिफोर्म , मांटेग्यु रिफोर्म या ऐसे ही अन्य सुधारों की तो कभी परवाह की और ही उनके लिए आन्दोलन किया ! ब्रिटिश सरकार ने तो यह टुकड़े वैधानिक आन्दोलनकारियों के सामने फैंके थे, जिससे उन्हें उचित मार्ग पर चलने से पथभ्रष्ट किया जा सके ! ब्रिटिश सरकार ने उन्हें तो यह घूस दी थी, जिससे वे क्रांतिकारियों को समूल नष्ट करने की उनकी नीति के साथ सहयोग करें ! गाँधी जी जैसा कि इन्हें संबोधित करते हैं, कि भारत के लिए ये खिलौने-जैसे हैंउन लोगों को बहलाने-फुसलाने के लिए जो समय-समय पर होम रूल , स्वशासन, जिम्मेदार सरकार, पूर्ण जिम्मेदार सरकार, औपनिवेशिक स्वराज्य जैसे अनेक वैधानिक नाम जो गुलामी के हैं, मांग करते हैं ! क्रांतिकारियों का लक्ष्य तो शासन-सुधार का नहीं है, वे तो स्वतंत्रता का स्तर कभी का ऊँचा कर चुके हैं और वे उसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए बिना किसी हिचकिचाहट के बलिदान कर रहे हैंउनका दावा है कि उनके बलिदानों ने जनता की विचारधारा में प्रचंड परिवर्तन किया है ! उनके प्रयत्नों से वे देश को स्वतंत्रता के मार्ग पर बहुत आगे बढ़ा ले गए हैं और यह बात उनसे राजनैतिक क्षेत्र में मतभेद रखने वाले लोग भी स्वीकार करते हैं


गाँधी जी का कथन है कि हिंसा से प्रगति का मार्ग अवरुद्ध स्वतंत्रता पाने का दिन स्थगित हो जाता है, तो हम इस विषय में अनेक ऐसे उदाहरण दे सकते हैं, जिनमें जिन देशों ने हिंसा से काम लिया उनकी सामजिक प्रगति होकर उन्हें राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्त हुई ! हम रूस तथा तुर्की का ही उदाहरण लें ! दोनों ने ही हिंसा के उपायों से ही सशस्त्र क्रांति द्वारा सत्ता प्राप्त की ! उसके बाद भी सामजिक सुधारों के कारण वहां की जनता ने बड़ी तीव्र गति से प्रगति की ! एकमात्र अफगानिस्तान के उदाहरण से राजनैतिक सूत्र सिद्ध नहीं किया जा सकता ! यह तो अपवाद मात्र है


गाँधी जी के विचार में "असहयोग आन्दोलन के समय जो जन-जागृति हुई है वह अहिंसा के उपदेश का ही परिणाम था" ! परन्तु यह धारणा गलत है और यह श्रेय अहिंसा को देना भी भूल है, क्योंकि जहाँ भी अत्यधिक जन-जागृति हुई वह सीधे मोर्चे की कार्रवाई से हुई! उदाहरणार्थ, रूस में शक्तिशाली जन आन्दोलन से ही वहां किसान और मजदूरों में जागृति उत्पन्न हुई ! उन्हें तो किसी भी अहिंसा का उपदेश नहीं दिया था, बल्कि हम तो यहाँ तक कहेंगे कि अहिंसा तथा गाँधी जी की समझौता- नीति से ही उन शक्तियों में फूट पड़ गयी जो सामूहिक मोर्चे के नारे से एक हो गयी थी ! यह प्रतिपादित किया जाता है कि राजनैतिक अन्यायों का मुकाबला अहिंसा के शस्त्र से किया जा सकता है, पर इस विषय में संक्षेप में तो यही कहा जा सकता है कि यह अनोखा विचार है, जिसका अभी प्रयोग नहीं हुआ है


दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के जो न्यायोचित अधिकार मांगे जाते थे उन्हें प्राप्त करने में अहिंसा का शस्त्र असफल रहा है ! वह भारत को स्वराज्य दिलाने में भी असफल रहा, जबकि राष्ट्रीय कांग्रेस स्वयंसेवकों की एक बड़ी सेना उसके लिए प्रयत्न करती रही तथा उस पर लगभग सवा करोड़ रुपया भी खर्च किया गयाहाल ही में बारदोली सत्याग्रह में इसकी असफलता सिद्ध ही चुकी है ! इस अवसर पर सत्याग्रह के नेता गाँधी और पटेल ने बारदोली के किसानों को जो कम से कम अधिकार दिलाने का आश्वासन दिया था, उसे भी वे दिला सके! इसके अतिरिक्त अन्य किसी देशव्यापी आन्दोलन की बात हमें मालूम नहीं ! अब तक अहिंसा  को एक ही आशीर्वाद मिला और वह था असफलता का ! ऐसी स्थिति में यह आश्चर्य नहीं कि देश ने फिर उनके प्रयोग से इनकार कर दिया ! वास्तव में गाँधी जी जिस रूप में सत्याग्रह का प्रचार करते हैं, वह एक प्रकार का आन्दोलन है, एक विरोध है जिसका स्वाभाविक परिणाम समझौते में होता है, जैसा कि प्रत्यक्ष देखा गया है ! इसलिए जितने जल्दी हम समझ लें कि स्वतंत्रता और गुलामी में कोई समझौता नहीं हो सकता, उतना ही अच्छा है


गाँधी जी सोचते हैं " हम नए युग में प्रवेश कर रहे हैं !" परन्तु कांग्रेस विधान में शब्दों का हेर-फेर मात्र कर, अर्थात स्वराज्य को पूर्ण स्वतंत्रता कह देने से नया युग प्रारंभ नहीं हो जाता ! वह दिन वास्तव में एक महान दिवस होगा जब कांग्रेस देशव्यापी आन्दोलन प्रारंभ करने का निर्णय करेगी, जिसका आधार सर्वमान्य क्रांतिकारी सिद्धांत होंगे ! ऐसे समय तक स्वतंत्रता का झंडा फेहराना हास्यास्पद होगा ! इस विषय में हम सरलादेवी चौधरानी के उन विचारों से सहमत हैं जो उन्होंने एक पत्र -संवादाता को भेंट में व्यक्त किये ! उन्होंने कहा : "31 दिसंबर, 1929 की अर्धरात्रि के ठीक एक मिनट बाद स्वतंत्रता का झंडा फेहराना एक विचित्र घटना है ! उस समय जी सी, असिस्टेंट जी सी तथा अन्य लोग इस बात को अच्छी तरह जानते थे कि स्वतंत्रता का झंडा फेहराने का निर्णय आधी रात तक अधर में लटका है, क्योंकि यदि वायसराय या सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट का कांग्रेस को यह सन्देश जाता है कि भारत को औपनिवेशिक स्वराज्य दे दिया गया है, तो रात्रि को 11 बजकर 59 मिनट पर भी स्थिति में परिवर्तन हो सकता है ! इससे स्पष्ट है कि पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्ति का ध्येय नेताओं की हार्दिक इच्छा नहीं थी, बल्कि एक बाल हठ के समान था ! भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लिए उचित तो यही होता कि वह पहले स्वतंत्रता प्राप्त कर फिर उसकी घोषणा करती " ! यह सच है कि अब औपनिवेशिक स्वराज्य के बजाय कांग्रेस के वक्ता जनता के सामने पूर्ण स्वतंत्रता का ढोल पीटेंगे ! वे अब जनता से कहेंगे कि जनता को उस संघर्ष के लिए तैयार हो जाना चाहिए जिसमें एक पक्ष तो मुक्केबाजी करेगा और दूसरा उन्हें केवल सहता रहेगा, जब तक कि वह खूब पीटकर इतना हताश हो जाए कि फिर उठ सके ! क्या उसे संघर्ष कहा जा सकता है और इससे देश को स्वतंत्रता मिल सकती है ? किसी भी राष्ट्र के लिए सर्वोच्च लक्ष्य-प्राप्ति का ध्येय सामने रखना अच्छा है, परन्तु साथ में यह भी आवश्यक है कि इस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए उन साधनों का उपयोग किया जाए जो योग्य हों और जो पहले उपयोग में चुके हों, अन्यथा संसार के सम्मुख हमारे हास्यास्पद बनने का भय बना रहेगा !


गाँधी जी ने सभी विचारशील लोगों से कहा कि वे लोग क्रांतिकारियों से सहयोग करना बंद कर दें तथा उनके कार्यों की निंदा करें, जिससे हमारे इस प्रकार उपेक्षित देशभक्तों की हिंसात्मक कार्यों से जो हानि हुई, उसे समझ सकें ! लोगों को उपेक्षित तथा पुरानी दलीलों के समर्थक कह देना जितना आसान है, उसी प्रकार उनकी निंदा कर जनता से उनसे सहयोग करने को कहना, जिससे वे अलग-अलग हो अपना कार्यक्रम स्थगित करने के लिए बाध्य हो जाएँ, यह सब करना विशेष रूप से उस व्यक्ति के लिए आसन होगा जो कि जनता के लिए कुछ प्रभावशाली व्यक्तियों का विश्वासपात्र हो ! गाँधी जी ने जीवन भर जन-जीवन का अनुभव किया है, पर यह बड़े दुःख की बात है कि वे भी क्रांतिकारियों का मनोविज्ञान तो समझते हैं और समझना ही चाहते हैं ! वह सिद्धान्त अमूल्य है, जो प्रत्येक क्रांतिकारी को प्रिय है ! जो व्यक्ति क्रांतिकारी बनता है, जब वह अपना सर हथेली पर रखकर किसी क्षण भी आत्मबलिदान के लिए तैयार रहता है तो वह केवल खेल के लिए नहीं ! वह यह त्याग और बलिदान इसलिए भी नहीं करता कि जब जनता उसके साथ सहानुभूति दिखाने की स्थिति में हो तो उसकी जय-जयकार करे ! वह इस मार्ग का इसलिए अवलम्बन करता है कि उसका सद्विवेक उसे इसकी प्रेरणा देता है, उसकी आत्मा उसे इसके लिए प्रेरित करती है !


एक क्रांतिकारी सबसे अधिक तर्क में विश्वास करता है ! वह केवल तर्क और तर्क में ही विश्वास करता है ! किसी प्रकार का गाली-गलौच या निंदा, चाहे फिर वह ऊँचे से ऊँचे स्तर से की गयी हो, उसे अपने निश्चित उद्देश्य-प्राप्ति से वंचित नहीं कर सकती ! यह सोचना कि यदि जनता का सहयोग मिला या उसके कार्य की प्रशंसा की गयी तो वह अपने उद्देश्य को छोड़ देगा, निरी मूर्खता है ! अनेक क्रांतिकारी , जिनके कार्यों की वैधानिक आन्दोलनकारियों ने घोर निंदा की, फिर भी वे उसकी परवाह कर फांसी पर झूल गए ! यदि तुम चाहते हो कि क्रांतिकारी अपनी गतिविधियों को स्थगित कर दें तो उसके लिए होना तो यह चाहिए कि उनके साथ तर्क द्वारा अपना मत प्रमाणित किया जाए ! यह एक, और केवल यही एक रास्ता है और बाकी बातों के विषय में किसी को संदेह नहीं होना चाहिए ! क्रांतिकारी इस प्रकार के डराने-धमकाने से कदापि हार मानने वाला नहीं !


हम प्रत्येक देशभक्त से निवेदन करते हैं कि वे हमारे साथ गंभीरता पूर्वक इस युद्ध में शामिल हो ! कोई भी व्यक्ति अहिंसा और ऐसे ही अजीबो-गरीब तरीकों से मनोविज्ञान प्रयोग कर राष्ट्र की स्वतंत्रता से खिलवाड़ करे ! स्वतंत्रता राष्ट्र का प्राण है ! हमारी गुलामी हमारे लिए लज्जास्पद है, जाने कब हममें यह बुद्धि और साहस होगा कि हम उससे मुक्ति प्राप्त कर स्वतंत्र हो सकें ? हमारी प्राचीन सभ्यता और गौरव की विरासत का क्या लाभ, यदि हममें यह स्वाभिमान रहे कि हम विदेशी गुलामी, विदेशी झंडे और बादशाह के सामने सर झुकाने से अपने आपको रोक सकें


क्या यह अपराध नहीं है कि ब्रिटेन ने भारत में अनैतिक शासन किया ? हमें भिकारी बनाया; तथा हमारा समस्त खून चूस लिया ? एक जाती और मानवता के नाते हमारा घोर अपमान तथा शोषण किया गया है ! क्या जनता अब भी चाहती है कि इस अपमान को भुलाकर हम ब्रिटिश शासकों को क्षमा कर दें ? हम बदला लेंगे, जो जनता द्वारा शासकों से लिया गया न्यायोचित बदला होगा ! कायरों को पीठ दिखाकर समझौता और शांति की आशा से चिपके रहने दीजिये ! हम किसी से भी दया की भिक्षा नहीं मांगते हैं और हम भी किसी को क्षमा नहीं करेंगेहमारा युद्ध विजय या मृत्यु के निर्णय तक चलता ही रहेगा ! क्रांति चिरंजीवी हो !


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
संजीव कुमार
दिल्ली विश्वविद्यालय से शिक्षा-दीक्षा
अब राजस्थान पत्रिका समूह से जुड़े हुए हैं.
उनका फेसबुक खाता 

Share this article :

0 comments:

Speak up your mind

Tell us what you're thinking... !

'अपनी माटी' का 'किसान विशेषांक'


संस्थापक:माणिक

संस्थापक:माणिक
अपनी माटी ई-पत्रिका

सम्पादक:जितेन्द्र यादव

सम्पादक:जितेन्द्र यादव
अपनी माटी ई-पत्रिका

सह सम्पादक:सौरभ कुमार

सह सम्पादक:सौरभ कुमार
अपनी माटी ई-पत्रिका

यहाँ आपका स्वागत है



यहाँ क्लिक करके हमारी डाक नि:शुल्क पाएं

Donate Apni Maati

रचनाएं यहाँ खोजिएगा

हमारे पाठक साथी

सम्पादक मंडल

साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका
'अपनी माटी'
========
प्रधान सम्पादक
सम्पादक
सह सम्पादक
तकनिकी प्रबंधक
========
संपर्क
apnimaati.com@gmail.com
========

ऑनलाइन

Donate Us

 
Template Design by Creating Website Published by Mas Template