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फेसबुकी विमर्श:कथाकार के इर्द-गिर्द हुंकारी भरने वाला कोई है भी या नहीं

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on बुधवार, मार्च 28, 2012 | बुधवार, मार्च 28, 2012


अधूरे अंत की शुरुआत (विमलेश त्रिपाठी का कहानी संग्रह) के बहाने :-नील कमल 


कहानी वैसे तो कहन की एक शैली ही है जहां एक कहने वाले के साथ एक सुनने वाला भी होना चाहिए लेकिन जिस ढंग की कहानियां इधर लिखी और सराही जा रही हैं उससे ठीक-ठीक यह बताना मुश्किल ज़रूर है कि कथाकार के इर्द-गिर्द हुंकारी भरने वाला कोई है भी या नहीं और अगर वह है तो क्या वह सचमुच का पाठक ही है कि कोई अदृश्य आलोचक है वैसे ग़ज़लों को भी तो कहने की पुरानी परम्परा है चाहे उसे किस्सा कहें , अफ़साना कहें , गल्प कहें या कोई भी और नाम दें कथा की सफ़लता या असफ़लता इस बात में निहित अवश्य होती है कि उसे सुना भी जा रहा है या नहीं एक कथाकार का भविष्य क्या होता होगा ? यही कि बहुत से लोग उसे पढ़ते हुए सुनते और गुनते होंगे ऐसा तो कविता के साथ भी होता ही है लेकिन असल मामला यह है कि कहानी का कैनवास कविता से बड़ा होता है यहां शब्द-शिल्पी अपनी कूची से चाक्षुष दृश्यों की एक लम्बी श्रृंखला बना सकता है वह एक फ़्रेम से दूसरे में आना जाना कर सकता है इसे पर्दे पर उतारा जाना आसान होता है लेखक थोड़ा सजग है तो वह अपने पात्रों और घटनाओं को कैमरे की नज़र से देखता है जो बात यहां कह देनी चाहिए वह यह कि कहानी की दुनिया का एक छोर सिनेमा की रंगीन दुनिया से भी जुड़ता है हिन्दी के सफ़लतम कथाकार प्रेमचंद से लेकर एकदम नये कथाकार तक इस रंगीनी की तरफ़ स्वाभाविक रूप से खिंचे चले जाते हैं तो कुछ तो बात होगी इसमें।



यह भूमिका इसलिए कि आज ऐसे कथाकारों की एक पीढ़ी तैयार हो चुकी है जो कविता के साथ या कविता को छोड़कर अफ़साने गढ़ने में लगी है विमलेश त्रिपाठी भी अपवाद नहीं हैं उमाशंकर चौधरी , विमलचंद्र पाण्डेय कुछ नाम हैं जिन्हें उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है उदय प्रकाश इस कथा पीढ़ी के अगुवा और रोल-मॉडल हैं ऐसे में विमलेश के पहले कहानी संग्रह "अधूरे अंत की शुरुआत" का आना एक कवि के गद्य के रूप में ही नहीं बल्कि साहित्य के सफ़ल ट्रेंड की तरफ़ एक लेखक के स्वाभाविक झुकाव के रूप में भी देखा जाना चाहिए विमलेश के पास काव्यात्मक भाषा तो खैर है ही वे कहानी बुनना भी जानते हैं अपने समकालीनों में विमलेश की अपनी पहचान उनकी सहज संप्रेषणीयता , अपने खास अंदाज़ और ज़िंदगी की जानी-पहचानी हक़ीकतों को कहानी बनाने की कुशलता की वजह से बनती है आज जबकि लेखक की पहली किताब (कहानी की) चुकी है तो उस दिन को याद कर लेना चाहिए जब वह अपनी पहली कहानी के साथ कोई आठ साल पूर्व दस्तक दे रहा था रवींद्र कालिया के संपादन में वागर्थ के उस युवा विशेषांक में ऐसे कई कथाकार पहली बार छप रहे थे जिन्हें आठ साल बाद अदब का सलीकेदार आदमी समझा जाना था अलग-अलग करणों से ये कथाकार बाद के दिनों में खासा चर्चा में रहे जो बात विमलेश की कथा पीढ़ी का अपना ठप्पा बनती है वह है कथा के शिल्प में कुछ चमकदार चीज़ें जोड़ना किसी ने भाषा के साथ प्रयोगधर्मिता को अपना हथियार बनाया , किसी ने कहानी के फ़ॉर्मैट में कुछ तब्दीलियां करनी चाहीं तो किसी ने प्लॉट को साधने की तरकीबें अपनाईं इस पीढ़ी के पास इंटरनेट का तेज समय था पाठक तक पहुंचाने वाली पत्रिकाएं थीं और इनमें से कुछ के अपने मेंटर थे

विमलेश की लगभग  सात कहानियों का यह संकलन इस अर्थ में दिलचस्प है कि यहां कथा के पात्र बहुत जाने पहचाने मिलते हैं चाहे वह "अधूरे अंत की शुरुआत" का प्रभुनाथ हो , "परदे के इधर उधर" का दुर्लभ भट्टाचार्या हो , "खण्डहर और इमारत" का काली चरण मजुमदार हो अथवा "चिन्दी चिन्दी कथा" का वेदान्त अरमन हो ये सभी चरित्र एक निम्न मध्यवर्गीय जीवन के त्रासद अनुभवों को बारीकी के साथ खोलते हैं पाठक के लिए यह सूत्र हाथ लगता है कि लगभग हर कथा का प्रधान चरित्र लिखने पढ़ने में रुचि रखने वाला एक साधारण आदमी है जो साहित्य से बेहद जुड़ाव रखता है , कविताएं लिखता है और मुक्तिबोध को जानता है कवि मुक्तिबोध की उपस्थिति प्रतीकात्मक ढंग से एकाधिक बार ध्यान खींचती है औए अक्सर वे बीड़ी पीते दिखाई देते हैं कई बार विमलेश का कवि उनके कथाकार पर भारी पड़ता है और पूरा अनुच्छेद कविता में लिखा भी मिलता है ऐसा स्वाभाविक इसलिए है कि विमलेश कविता से होकर कहानी के इलाके में प्रवेश करते हैं उदाहरण के लिए "अधूरे अंत की शुरुआत" का यह अंश - " यही थी वो जगह जो दिन रात सपने में एक सितार की तरह बजती थी हर गुनगुनी सुबह की जम्हाई के साथ सूरज का सीना चौड़ा हो जाता था एक चिड़िया कान में गुनगुनाती थी और कह जाती थी कि सबकुछ बंधा है तुम्हारी ही मुट्ठी में "

समकालीन कथा पीढ़ी के बारे में स्वयं रवींद्र कालिया की इस बात पर बार-बार ध्यान दिया जाना चाहिए कि "अब तो कहानी से कहानीपन ही गायब होता जा रहा है कुछ लोग वाग्जाल में ही पाठक को उलझा कर रह जाते हैं " इन बातों के क्या मायने हो सकते हैं यह पाठक के लिए सहज अनुमान का विषय है संजीव जैसा कथाकार इस पीढ़ी के बारे में जब यह कहता है कि "आज की पीढ़ी मूलत: कैरियर और चमत्कारवादी है" तो उसके भी कुछ अर्थ होते ही होंगे इस कथा पीढ़ी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने बुज़ुर्गों को गलत साबित करने की होगी विमलेश त्रिपाठी और चन्दन पाण्डेय की पीढ़ी से हिन्दी कहानी को बहुत उम्मीदें हैं

उदय प्रकाश हमसे बड़ी पीढ़ी के हैं तो उन्हें हमारी पीढ़ी का अगुआ कैसे कहा जा सकता है?:-गौरव सोलंकी

मेरी कुछ विनम्र जिज्ञासाएं हैं। उनमें से कुछ आपत्तियों जैसी भी हैं। यह सब इसलिए ही क्योंकि आपने पूरे परिदृश्य पर कुछ जनरलाइज्ड बातें कही हैं।

1. मैं इससे असहमत हूं कि कला में कोई एक अगुआ या रोल मॉडल हो सकता है। वैसे भी उदय प्रकाश हमसे बड़ी पीढ़ी के हैं तो उन्हें हमारी पीढ़ी का अगुआ कैसे कहा जा सकता है?

और अगर कला में अगुआ या रोल मॉडल जैसी चीज हो भी, तो उदय प्रकाश कम से कम मेरे तो रोल मॉडल नहीं हैं। उनका लिखा मुझे बहुत प्यारा है, इसके बावज़ूद, या शायद इसीलिए। और मुझे लगता है कि वे भी ऐसा नहीं चाहते होंगे कि उनसे कम उम्र के लेखक उनके जैसा ही बनने की कोशिश करें। मेरी आपत्ति यही है कि आपने यह वाक्य ऐसे लिख दिया जैसे लेखकों की कोई सभा हुई हो और उसमें उदय जी को रोल मॉडल या अगुआ चुना गया हो। आप आलोचना करते हुए यह ज़रूर कह सकते हैं कि आपको अधिकतर लोग उदय प्रकाश से प्रभावित लगते हैं। तब भी मेरा अनुरोध है कि उदाहरणों के साथ बताएं।

2. दूसरा, संजीव जी की यह बात कि "आज की पीढ़ी मूलत: कैरियर और चमत्कारवादी है।" उनकी बजाय आपसे ही इसलिए पूछ रहा हूं कि आप इससे पूरी तरह सहमत लग रहे हैं।

इसका अर्थ भी देखें, तब भी किसी भी सामान्यीकृत बयान की तरह यह एक किस्म का नस्लवादी बयान है - ऐसे अर्थ वाला कि 'सब मुसलमान मूलत: आतंकवादी हैं।'अब इसके अर्थ पर जाएं तो मैं जानना चाहूंगा कि कैरियरवादी होने का अर्थ क्या यह है कि लेखक लेखन में करियर ढूंढ़ना चाह रहा है। अगर ऐसा है तो इसे गाली की तरह कहने की क्या ज़रूरत है? जिन संस्कृतियों में ऐसा संभव हुआ है, वहां देखिए, क्या कमाल लिखा गया है! लेकिन हमारे यहां पता नहीं क्यों ऐसा माना जाता है कि लिखने के पैसे कमाकर जीवन चलाना बुरी चीज है, पैसा किसी और काम से ही कमाना चाहिए। पैसा इतना अपवित्र कर रहा है लिखने को, तो पैसे के बिना रहते हैं ना सब?

पूरी पीढी को एक जैसा सोचना-समझना बिल्‍कुल गलत है:-प्रेमचंद गांधी 

निश्‍चय ही पिछले दशक की पीढी में उभरे कथाकारों में विमलेश बहुत महत्‍वपूर्ण हैं, लेकिन इस पूरी पीढी को एक जैसा सोचना-समझना बिल्‍कुल गलत है... सबके पास अपनी भाषा, अपना शिल्‍प और संवदन संसार है... किसी के प्रमाणपत्र की जरूरत इन्‍हें नहीं... पाठक ही तय करेंगे इनका भविष्‍य, जिसके बारे में मैं पूरी तरह आश्‍वस्‍त हूं...






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