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वह भी कोई देस है महराज : अनिल यादव

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on मंगलवार, मार्च 20, 2012 | मंगलवार, मार्च 20, 2012


'वह भी कोई देस है महराजहिंदी के यात्रा-संस्मरणों में अपने ढंग का पहला और अद्ïभुत वृत्तांत है। सामाजिक-सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक मसलों पर लिखने वाले पत्रकार अनिल यादव का यह यात्रा-वृत्तांत पूर्वोत्तर की ज़मीनी हकीकत तो बयान करता ही है, वहाँ के जन-जीवन का आँखों देखा वह हाल बयान करता है जो दूरबीनी दृष्टि वाले पत्रकार और इतिहासकार की नज़र में नहीं आता। पेट्रोल-डीजल, गैस, कोयला, चाय देने वाले पूर्वोत्तर को हमारी सरकार बदले में वर्दीधारी $फौजों की टुकडिय़ाँ भेजती रही हैं।

पूर्वोत्तर केंद्रित इस यात्रा पुस्तक में वहाँ के जन-जीवन की असलियत बयान करने के साथ-साथ व्यवस्था की असलियत को उजागर करने में भी अनिल ने कोई कोताही नहीं बरती है। इस यात्रा में उन्होंने छ: महीने से ज़्यादा समय दिया और उस अनुभव को लिखने में लगभग दस वर्ष लगाए। जाहिर है कि भावोच्छ्वास का कोई झोल न हो और तथ्यजन्य त्रुटि भी न जाए इसका खयाल रखा गया है।यात्रा की इस पुस्तक में अनिल के कथाकार की भाषा उनकी पत्रकार-दृष्टि को इस कदर ता$कत देती है कि इसे उपन्यास की तरह भी पढ़ा जा सकता है।निश्चय ही बेहद पठनीय और हिंदी में पूर्वोत्तर केंद्रित अपने ढंग की इस पहली यात्रा पुस्तक को पाठकों का अपार स्नेह मिलेगा।

जन्म 1967। जड़ें पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जि़ले के दौलतपुर गाँव में। शिक्षा बीएचयू समेत कई विश्वविद्यालयों में। छात्र एवं किसान आंदोलनों में सक्रियता। पेशे से पत्रकार, फिलहाल अंग्रेज़ी दैनिक 'द पॉयनियरमें प्रधान संवाददाता। उग्रवाद और आदिवासी जीवन के अध्ययन के लिए उत्तर-पूर्व समेत देश के कई हिस्सों की यात्राएँ। कई यात्राएँ बेमकसद भी। सेन्टर फार साइंस एंड इनवैरॉन्मेंट, मीडिया फेलोशिप के तहत अरुणाचल प्रदेश में कार्य। संगम राइटर्स इन्टरनेशनल रेजिडेन्सी प्रोग्राम, 2010 में भागीदारी। वर्ष 2011 में पहला कहानी-संग्रह 'नगरवधुएँ अखबार नहीं पढ़तींप्रकाशित।


 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
संपर्क : 10/7, डालीबाग कॉलोनीतिलक मार्ग
लखनऊ-34 (उ.प्र.)
ई-मेल : oopsanil@gmail.com

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