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किशोर चौधरी की कवितायेँ कचोटती है

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on गुरुवार, मार्च 15, 2012 | गुरुवार, मार्च 15, 2012

(युवा साथी किशोर चौधरी के डायरी लेखन के बीच बीच में परोसी कवितायेँ अपने आप में बहुत कुछ कहती है.उन्हें पढ़ते हुए पाठक को साफ़ लगता है कि कोई है जो उसके मानस पटल पर बिम्ब रचता हुआ कई सारे विचार एक साथ थमा रहा है.रचनाओं की ये भी एक ताकत ही है कि उन्हें बार-बार पढ़ने से अलग-अलग अर्थ पैदा हो रहे हैं.-माणिक )


(1)


दिल टूट गया है 

आओ 
आधा आधा पिज्जा खाते हैं 
थोड़ी सी सिंगल माल्ट पीते हैं 

* * * 

जो सामने है उसे देखा ही नहीं 
जो खो गया उसे भूले ही नहीं. 

इस दुनिया में गधे हमसे बेहतर हैं. 

* * * 

ओ लड़की 
तुम्हारी आँखों में बसी 
उदासी का सबब क्या है. 

उसने खूबसूरत बालों को खोला 
और देर तक मुस्कुराई. 

पगले, ज़हानत भी एक बड़ा रोग है . 

* * * 

लड़के ने लिखा ब्लैक बोर्ड पर 
हमें तुमसे प्यार कितना ये हम नहीं जानते 
लड़कियां बेवजह हंस कर निकल गयी 

रात ढले तन्हाई ने अंगड़ाई ली, 
उदासी ने खोली अपनी सलेटी पांखें. 

* * * 
एक हज़ार बातें करके उसने कहा 
ये दिल्लगी है साहब 

तवारीख़ खुद को दोहराती है. 
कौन कहता है नाला ए बुलबुल को बेअसर 
परदे में गुल के लाख ज़िगर चाक हो गए 
* * * 
इस रास्ते का नाम क्या है?

लड़के ने कहा फ़रेब 
लड़की बोली ज़िंदगी 

बूढा आदमी 
दो नन्हे बच्चों की अंगुलियाँ टटोलता रहा. 
* * * 

बेवजह की बातें 
चल हट, ढाई ढूश ?
[ढाई ढूश - पारी समाप्त, खेल रद्द, सौदा ख़त्म ]

आई लव यू 
माने ?
चल दारू पियेंगे और किसी को लात मारेंगे. 
* * *

प्रेम कोई विलक्षण आदिम चीज़ नहीं है 

यह अनवरत है 
अभी खो गया है, कभी फिर मिल जायेगा. 

(2)
कैंटीन की पत्थर वाली बैंच पर 
मैं अक्सर इंतज़ार करता था. 

कि एक दिन वह भी सोचेगी
आखिर ये ज़िन्दगी चलेगी कितने दिन?
* * *

एक उजड़े हुए शहर में बसे थे
उम्मीद से भरे कितने ही लोग
मगर मुकम्मल न हो सका, उनका ख़्वाब. 

प्रेम की नियति में लिखी थी सिर्फ़ बरबादी.

* * *
अक्सर मेरे हाथ लगती थी
एक तस्वीर
तनहा, गुमसुम और बेनियाज़.

कि अद्भुत रचयिता ने
लड़कियों की तामीर में
शामिल रखा, एकाकीपन.

लड़के मगर बुनते रहे 
अपना एकांत, शराब के दो प्यालों से.


(3)
उसने चश्मे की ओट से
दस्तक देने वाले से पूछा
कि कौन हो तुम?

ज़िन्दगी फिर दगाबाज़ निकली.
वहां कोई नहीं था

* * *

ईश्वर ने रचा
उसके चेहरे पर एक पिम्पल
जो छुप न सके सात पर्दों में.

कि वह अपने गाल पर
एक अंगुली रख कर बैठी हुई
दिखती है, सबसे सुंदर.

* * *
दिल पर दर्ज़ होता रहा,
तारीखों का हिसाब
चेहरे पर थी असंख्य गल्प कथाएं

कि लाल रंग का था, रोज़नामचा.

* * *
सम्मोहन का झुरमुट था
विलासी मुखौटों के आस पास

जबकि दिल में गहरे छुपे हुए थे
ज़ख्म.

ज़िंदगी के पास जितने दिन थे
उतने ही फ़रेबी चेहरे भी थे, उसके पास.

* * *

उसका चेहरा देख कर
कोई मूर्ख भी बता देता
कि वह सुबह कब सोयी थी.

ये कोई नहीं जानता
कि वो जाग किसलिए रही थी.

* * *
नकलची आईना करता रहा सवाल
नादान हवा उड़ाती रही ज़ुल्फें
सपाट छत से टपकती रही जटिल स्मृतियां.

मगर वह घुटनों को पेट में डाल कर सो गयी
कि ज़िंदगी एक भ्रम के टूटने तक का नाम है.

* * *

लाईब्रेरी में कोने वाली सीट पर
अधलेटी लड़की के
चेहरे को पढ़ रहा था, समय.

मैं अपनी बारी के इंतज़ार में था
कि चूम सकूँ आदम के इतिहास को.
* * *

रोने से चेहरे पर उपजी लकीरों को
उसने दिल पर कट पेस्ट कर दिया

उम्मीद को चाहिए, एक खाली वितान.

* * *
उसने दिव्य दृष्टि से खोला
ज़िन्दगी का आखिरी पन्ना.
और पढ़ कर चौंक उठी.

कि वह ताउम्र अकेली थी.

* * *

एक नन्हे बच्चे ने अपनी कॉपी में
लकीरों से बनाये कई उलझे हुए रास्ते
फिर सो गया आँगन के बीच में.

आधी नींद में नाचती रही उसकी पुतलियाँ
वह मुस्कुराया कई बार
और अचानक उदासी के एक वर्तुल ने काटा
उसके चेहरे पर चक्कर.

आखिर वह कच्ची नींद से उठ बैठा.

उसे नीम नींद में कोई कर गया होगा तन्हा
मुझे लगा, छूट रहा है तुम्हारा हाथ मेरे हाथ से.

(4) 
ज़िन्दगी की मेज पर रखी कटोरी में 
कुछ ही बचे थे, दाने उम्र के 
और अचानक किसी ने थपथपाई पीठ. 

थोड़ा उधर सरको, मैं भी बैठूंगी तुम्हारे पास. 

* * * 

जब याद के कांटे चुभे हो पाँव में 
और न सुन सकें, उसकी आवाज़ 

उस वक़्त 
सीने में छुप कर धड़कने की जगह 
दिल को भी पाँव बन कर देखना चाहिए. 

कि इस सफ़र में 
एक तुम ही नहीं भरे हो, तक़लीफ़ से. 
* * * 

न छुओ इन गालों को 
अपने हाथ छुपा लो, पीठ के पीछे 
और देखो इस तरह 
कि मुझे जानते ही नहीं हो. 

ये आंसू, कुछ विरले आदिम गीत हैं. 
* * * 

कभी कभी सोचता हूँ
कि तुम लौटा दो मेरा पासा 
और चला जाऊं उठ कर. 

कि इस प्रेम वाली बिसात पर 
दर्द वाले खाने कुछ ज्यादा है. 
* * *

मैं उसे समझता था 
आलसी और कामचोर 
कि वह दुनिया को बनाने के बाद 
सो गया था, प्रार्थनाघरों में. 

कल उस लड़की ने भी नहीं की 
मुझसे बात, 
तो जाना कि ईश्वर, ईर्ष्यालु भी है. 

* * * 
आंसुओं की टूटी फूटी नाव में 
अब सुस्ता सकता हूँ कुछ देर 
कि नदी में नहीं होते अलग अलग रास्ते. 

तुम कब तक रोक के रखोगी आंसू? 

* * * 
मेरे दुखों में था असीम धैर्य. 

और एक तुम थे 
जो रुक न सके इक रात के लिए. 
* * * 

तुम्हारे बारे में सोचने से पहले 
बेहतर था 
शराबघर में शामें बुझाते जाना. 

उन दिनों मालूम था कि मुझे क्या चाहिए. 
* * * 

एक महान आदमी जीता है 
तड़पती आत्मा को छिपाए हुए. 

मगर मुझे करनी है तुमसे बात 
कि रात बहुत तनहा और ज़िन्दगी ऐसी क्यों हैं. 
* * *

शुक्रगुज़ार होना चाहिए तुम्हें 

कि इस सफ़र में दर्द न होता साथ 
तो कितनी बढ़ जाती, तन्हाई. 

* * *
आखिर 
लौट आई मुस्कान मेरे चहरे पर 

जब ये सोचा 
कि तुम्हारे साथ न होने का दुःख 
सिर्फ इक ज़िन्दगी भर का ही है. 
* * * 


(5)


सफ़र कर रही लड़की के पांवों में थी 
पतली सी चप्पल 
और फानूस की गहरी रौशनी के रंग सी
घुटनों को ढकने वाली तंग पतलून. 

जब वह देख रही होती खिड़की से बाहर 
दिखती थी 
कला दीर्घा में बेजोड़ चित्रों की नुमाईश के बीच 
एक नन्ही बच्ची सी. 
* * * 

खिड़की के पास बैठी 
लड़की के चेहरे पर रौशनी और रंगों का 
अविराम कोलाज बनता और मिटता जाता था 

जैसे कोई गवैया विलंबित आलाप के बाद 
रच रहा हो द्रुत का जादुई सम्मोहन. 
* * * 

मैंने सोचा कि उसका दिल 
एक निपुण कारीगर का 
ताजा कसा हुआ वाध्य होगा. 

जिसे छूते ही आप कर सकें यकीन 
बिग बैंग थ्योरी भी हो सकती है, सच. 
* * * 

जीवन के इस सफ़र से 
अब नहीं रखता हूँ ज्यादा उम्मीद 
कि खो गयी हैं, वे चीज़ें 
जिनको रखना था, संभाल कर. 

फिर भी 
इस ख़याल से बाहर आने के लिए काफी है 
किसी कंटीली बाड़ के पार 
नन्ही बच्ची की कौतुहल भरी दो आँखें हैं. 
* * * 
(6)
मुझसे पूछता है बार बार 
उसने कितने दिनों से पूछा ही नहीं है 
तुम्हारा हाल ?

खालीपन एक चुगलखोर है. 
* * * 

यह मालूम करना मुश्किल था 
कि सुबह कितनी दूर थी. 

मगर दीये में बचा था, इतना ही तेल 
कि लिखा जा सके एक तुम्हारा नाम. 

* * *
कुछ दिनों बाद लड़ना पड़ता है 
उन चीज़ों से 
जिन्हें आप छोड़ आते हैं, भूतकाल में. 

खालीपन, इस्पात की कुदाल है. 

* * *

बेढब रूहों के जादुई करिश्मे 
और ऐयारों की 
अविश्वसनीय हरकतें पढ़ते हुए 
आप खो सकते हैं, फंतासी की दुनिया में. 

किन्तु लौटते ही पाते हैं 
कि बाहें पसारे खड़ी है, महबूब की याद. 

* * *
जिस किसी ने भी कहा 
कि उसकी बहुत याद आ रही है. 

यह वास्तव में खालीपन से 
दूर भाग जाने की एक जुगत थी. 

* * *
एक हवा के झोंके ने बिखेर दिए 
प्रेम की तस्वीर के सारे टुकड़े 

जितनी बार बेसलीका हुआ 
प्रेम उतनी ही बार था, नया नवेला. 
* * *

ज़िन्दगी अपरिभाषित दुःख नहीं 
दर्द भरी जिज्ञासा थी 

कोई खो जाता है, तो मिलता क्यों है ? 
* * *

ज़िन्दगी के ड्रामे में 
मेरे खो जाने को बुनने के लिए 
उन्होंने रचे रुदन और आंसू. 

काश, उन्होंने बुना होता 
मौन के तंतुओं से गहन खालीपन. 
* * *

किशोर चौधरी 
किसी ज़माने में जोधपुर में एक अखबार से पत्रकारिता की हुरुआत करने वाले किशोर,आकाशवाणी जैसे नामचीन विभाग में उदघोषक हैं.पहले सूरतगढ़ स्टेशन के बाद अब फिलहाल बाड़मेर केंद्र पर पदस्त हैं. हथकढ़ नामक ब्लॉग के ज़रिये डायरी लेखन करते हैं. जीवन के सभी पड़ाव पर अपने आस-पास को देखने की नई दृष्ठि रखते हैं.महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय,अजमेर से कला स्नातक और कोटा ओपन से जर्नलिस्म में मास्टर डिग्रीधारी हैं.उनका फेसबुक खाता ये रहा 

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