त्रिलोक सिंह ठकुरेला के हाइकू गीत - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित ई-पत्रिका

नवीनतम रचना

त्रिलोक सिंह ठकुरेला के हाइकू गीत


                       सुनो  कबीर
 सुनो, कबीर
बचाकर रखना
अपनी पोथी.
सरल नहीं
गंगा के तट पर
बातें कहना  .
घडियालों  ने
मानव बनकर
सीखा रहना .
हित की बात
जहर सी लगती ,
लगती थोथी .
बाहर कुछ
अन्दर से कुछ हैं
दुनिया वाले .
उजले लोग ,
मखमली कपड़े,
दिल है काले.
सब ने रखी
ताक पर जाकर
गरिमा जो थी.                                      
                        
                                   
                             
                          बगिया का मौसम

बदल गया
बगिया का मौसम
चुप रहना .
गया बसंत,
गया पतझर ,
दिन बदले.
कोयल मौन,
और सब सहमे ,
पवन जले.
मुश्किल हुआ
दर्द उपवन का
अब सहना .
आकर गिद्ध
बसे उपवन में
हुआ गज़ब.
जुटे सियार
रात भर करते
नाटक अब.
अब किसको
आसान रह गया
सच कहना.


                अभिलाषा का रथ

सच कहना
अभिलाषा का रथ 
कब रुकता .
मिल जाते हैं
प्रियतम के सुख
प्रेम-डगर.
राजमहल,
सत्ता-सुख,सम्पति,
गाँव ,नगर.
किन्तु हिसाब
आज तक मन का
कब चुकता.
रहा भागता
तिर्यक पथ पर
पागल-मन .
कम ही रहा
बहुत पाकर भी    
जीवन-धन.
झुकता तन,
ये अहंकार शत
कब झुकता.


 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-


त्रिलोक सिंह ठकुरेला
(अभी तक विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में, कविता, दोहे, गीत, नवगीत, हाइकु, कुण्डलिया, बालगीत,  लघुकथा एवं कहानी प्रकाशित हो चुके हैं.प्रकाशित कृतियों में राजस्थानी ग्रंथागार, जोधपुर से 'नया सवेरा बालगीत संग्रह)' शामिल है.)

बंगला संख्या - एल-99, रेलवे चिकित्सालय के सामने, आबू रोड - 307026 (राजस्थान) मो.- 09460714267,trilokthakurela@gmail.com

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