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समकालीन भारतीय चित्रकला:हुसैन के बहाने

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on मंगलवार, मार्च 20, 2012 | मंगलवार, मार्च 20, 2012


अशोक भौमिक की दो नवीनतम पुस्‍तकें

हुसैन आज़ादी के बाद के भारतीय कला परिदृश्य में सबसे महत्त्वपूर्ण कलाकारों में से एक हैं। उन्होंने आधुनिक भारतीय कला को एक सुस्पष्ट दिशा दी है जो दुर्भाग्य से विकसित होते बाज़ार के अंधेरे में आम जनता के लिए लगभग ओझल रही है। मगर काफी समय बाद आज एक बार फिर हुसैन के चित्र चर्चा के केंद्र में है।

                हुसैन और उनके बहाने समकालीन भारतीय चित्रकला के महत्त्वपूर्ण चित्रकार और उनके चित्र ही नहीं, इस दौर की चुनौतियों को लेकर भी एक मुकम्मल बहस को दिशा देने में प्रसिद्ध चित्रकार अशोक भौमिक की यह किताब कारगर सिद्ध होगी। इस किताब से इस दौर की कला मात्र को ही समझने में मदद नहीं मिलती बल्कि कला और समाज व बाज़ार के संबंधों एवं इससे जुड़ी अन्य जटिलताओं को भी समझने-सुलझाने में यह काम आएगी। हिंदी में यह अपने ढंग की पहली किताब है। बहसतलब, चाक्षुष और बेहद पठनीय भी!...

शिप्रा एक नदी का नाम है
मेरे साथ ऐसा बहुत कम हुआ है, जब मैंने कोई किताब हाथ में ली हो और एक बैठक में पढऩे की बाध्यता बन आई हो। अशोक भौमिक के साथ मेरी यह बाध्यता बन आई। 'शिप्रा’—यह किताब मुझे अपनी पीढ़ी के उन सपनों-आकांक्षाओं के रहगुज़र से लगातार साक्षात्कार कराती है...जब गुजिश्ता सदी के सातवें दशक में गांधी-नेहरू के भारत के नौजवानों की जेब में देखते-देखते माओ की लाल किताब आ गई। विश्वविद्यालयों के कैंटिनों से लेकर सड़क तक यह पीढ़ी परिवर्तनकामी बहस में उलझी रही, अपनी प्रत्येक पराजय में एक अर्थपूर्ण संकेत ढूँढ़ती रही।

ऐसा अकारण नहीं हुआ था। गांधी-नेहरू के बोल-वचनों की गंध-सुगंध इतनी जल्दी उतर जाएगीलोकतंत्र के सपने इतनी शीघ्रता से बिखर जाएँगेइसका कतई इम्कान नहीं था, मगर हुआ। शासक वर्ग के न केवल कोट-कमीज वही रहे, जहीनीयत और कायदे-कानून भी वही रहे जिसपर कथित आज़ाद मुल्क को चलना था। वे इम्प्रेलियिज़्म के इन्द्रधनुष से प्रभावित-प्रेरित होते रहे। इसके जादुई चाल से, आज मुक्त हो पाने का सवाल तक पैदा नहीं होता। 'शिप्रा एक नदी का नाम हैपढ़ते हुए मुझे एक मई, 1942 के दिन सुभाष चन्द्र बोस के एक प्रसारण में कही बात का स्मरण हो आया है कि 'अगर साम्राज्यवादी ब्रतानिया किसी भी तरह यह युद्ध जीतती है, तो भारत की गुलामी का अंत नहीं।यह बात आज भी उतनी ही शिद्दत से याद की जानी चाहिए।मगर दुनिया बदल चुकी है। विचारों के घोड़े निर्वाध दौड़ लगाते हैं। अभ्यस्त-विवश कृषक मज़दूर और मेहनतकश आम आदमी के क्षत-विक्षत स्वप्नों-आकांक्षाओं को आकार और रूपरंग देने के सोच का सहज भार नौजवानों ने उठाया।

शिप्रा थी, शिप्रा को लेखक ने नहीं गढ़ा। किसी भी पात्र को लेखक ने नहीं गढ़ा। वह अपने आप में है। ठोस है। उसकी साँसें अपनी हैं। यह अहसास हमेशा बना रहता है कि मैंने इन्हें देखा है। अपने अतीत में देखा है। आज भी कई को उसी ताने-बाने में देखता हूँ, तो ठिठक जाता हूँ।लेखक ने सिर्फ यह किया कि उस दुर्घर्ष-दुर्गम दिनों को एक काव्य रूप दे दिया ताकि वह कथा अमरता को प्राप्त कर जाए। उसकी ध्वनि, उसकी गूँज प्रत्यावर्तित हो जाए, होती रहे। इसलिए और इसीलिए मैं अशोक भौमिक के लेखक के प्रति आभारी हूँ कि मुझे या हमारी पीढ़ी को एक आईना दिया। 


 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-अशोक भौमिक
समकालीन भारतीय चित्रकला में एक जाना-पहचाना नाम।
जन्म : नागपुर 31 जुलाई, १९५३,वामपंथी राजनीति से सघन रूप से जुड़े रहे।जन संस्कृति मंच के संस्थापक सदस्यों में से एक। प्रगतिशील कविताओं पर आधारित पोस्टरों के लिए कार्यशिविरों का आयोजन एवं आज भी इस उद्देश्य के लिए समर्पित।,देश-विदेश में एक दर्जन से ज़्यादा एकल चित्र प्रदर्शनियों का आयोजन।, 'मोनालीसा हँस रही थी' पहला उपन्यास,'आईस-पाईस' कहानी-संग्रह, 'बादल सरकार : व्यक्ति और रंगमंच', 'शिप्रा एक नदी का नाम है' पुस्तकें प्रकाशित।संप्रति, स्वतंत्र चित्रकारिता।

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