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सपना जिसे फलीभूत होते देखने पहले ही गुज़र गए मार्क्स

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on सोमवार, मार्च 19, 2012 | सोमवार, मार्च 19, 2012

 मार्क्‍स ने जिस राजनैतिक और सामाजिक-आर्थिक बदलाव की प्रक्रिया का सपना देखा था, उसे वे अपने जीवनकाल में फलीभूत होते नहीं देख पाए। बरसों बाद 1917 में रूसी क्रान्ति और 1949 में चीनी क्रान्ति के माध्‍यम से जो समाजवादी व्‍यवस्‍था कायम हुई,उनकी अपनी-अपनी परिणतियां रहीं। रूसी और चीनी समाज के दूसरे गणराज्‍यों की वस्‍तुगत स्थितियां इतनी अविकसित और अपरिपक्‍व रहीं कि वह व्‍यवस्‍था जनता के बीच कभी ठीक से जड़ नहीं जमा सकीं। सामन्‍ती संस्‍कारों और धार्मिक विश्‍वासों ने कभी वहां की आम जनता को समाजवादी सिद्धान्‍तों के अनुरूप विकसित होने ही नहीं दिया, ऊपर से विश्‍व-व्‍यापी पूंजीवाद की जो साजिशें कायम थीं, उनसे तो यह व्‍यवस्‍था अन्‍त तक जूझती ही रही।
 
लेकिन सबसे बड़ी विडंबना ये रही कि खुद समाजवादी व्‍यवस्‍था से जुडे अगुवा लोग भी अपने को निम्‍न-पूंजीवादी प्रवृत्तियों से कभी उबार नहीं पाये और दिनो-दिन सर्वहारा की ताकत कमजोर होती गई। खुद कम्‍युनिस्‍ट पार्टियों को भी जितना आत्‍म-विश्‍लेषण कर सुधार करना चाहिये था, वह प्रक्रिया भी एक तरह से बंद हो गई। वहां भी एक किस्‍म का ब्‍यूरोक्रेटिक सिस्‍टम हावी होता गया, जो एक बार कम्‍यून का मुखिया हो गया, उसने उसे अपनी जागीर समझ लिया, जबकि मार्क्‍स हमेशा इसी बात पर बल देते रहे कि सत्‍ता और पार्टी परआम कम्‍युनिस्‍ट (सर्वहारा) का नियंत्रण हमेशा बना रहना चाहिये। रूस की समाजवादी व्‍यवस्‍था में स्‍टालिन के बाद जो कमजोरियां विकसित हुईं, जिस तरह 18 साल तक ब्रेजनेव सत्‍ता पर काबिज रहे और आम कम्‍युनिस्‍ट की आवाज दब कर रह गई, उस स्थ‍िति में येल्‍तसिन जैसे अमेरिकी पूंजीवाद के दलाल के हाथों जो हश्र होना था, वह हुआ और उसी को अनजान लोगों ने मार्क्‍स के दर्शन की पराजय मान लिया। 
 
मार्क्‍स बराबर प्रतिक्रान्ति के खतरे के प्रति आगाह करते रहे हैं, लेकिन उनकी इस चेतावनी पर बहुत कम ध्‍यान दिया गया।जो लोग सोवियत क्रान्ति की हार को मार्क्‍सवाद की पराजय के रूप में देखते हैं, वे अक्‍सर यही गलती दोहराते हैं। ये ध्‍यान भी कम्‍यून-संगठनों को ही देना था।पार्टी-संगठन से जुडे हर व्‍यक्ति पर यह नजर रखना जरूरी होता है कि उसमें व्‍यक्तिवादी और निम्‍न-पूंजीवादी प्रवृत्तियों तो नहीं विकसित हो रही। ऐसे लोगों को पार्टी संगठन के शुरुआती दौर में ही नियंत्रित कर लेना जरूरी था, लेकिन यह अक्‍सर नहीं हो पाता। हमारे अपने देश में 65 वर्ष के लोकतंत्र के बाद भी लोगों में लोकतांत्रिक प्रक्रिया का विकास बहुत निम्‍न स्‍तर पर है, बंगाल का अनुभव भी हमारे सामने है, वहां भी पार्टी संगठन का ऐसी कमजोरियों पर नियंत्रण का कोई उपयुक्‍त तरीका विकसित नहीं हो पाया। जो लोग पोलित ब्‍यूरो या संसद में पहुंच जाते हैं, वे सत्‍ता का सुख छोड़ने को तैयार नहीं होते और पार्टी-संगठन को भी अन्दर ही अन्‍दर इतना कमजोर बना देते हैं कि उसमें विकास की कोई संभावना शेष नहीं रह जाती। 
 
इन सारी कमजोरियों और अन्‍तर्विरोधों के बावजूद आज भी अगर मार्क्‍स के विचार प्रासंगिक बने हुए हैं,तो इसी वजह से कि उस वैज्ञानिक दर्शन में कोई खराबी नहीं है, कमजोरी सिर्फ उसके लागू करने के तरीके में है और उस पर नियंत्रण का तरीका खोजना ही होगा। हम अब तक सभी तरह की राजनैतिक व्‍यवस्‍थाओं के प्रयोग देख चुके हैं,सभी व्‍यवस्‍थाएं जनता को बेवकूफ बनाने के लिए समाजवादी व्‍यवस्‍था की शब्‍दावली का ही उपयोग करती हैं, यहां तक कि जिस लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था के डींगें हांकी जाती हैं, कोई राजनैतिक दल यह नहीं चाहता कि लोग अपने विवेक का उपयोग कर अपने वोट का प्रयोग करें। हर कोई उन्‍हें झूठे झांसे में रखना ही अपना बचाव समझता है। ऐसी स्थिति में मार्क्‍स का दर्शन ही एकमात्र ऐसा विकल्‍प है, जिसमें मानवता का भविष्‍य देखा जा सकता है। यह कब संभव हो पाता है, इसकी कोई भविष्‍यवाणी तो नहीं की जा स‍कती, लेकिन अगर परिस्थितियां ऐसी ही बनी रहीं तो मार्क्‍स के इस क्रान्तिकारी विचार को सजग मनुष्‍य आजमायेगा अवश्‍य।

 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

नन्द भारद्वाज
कवि और राजस्थानी साहित्यकार 
(हमेशा से श्रेष्ठ लेखन के कलमकार जो हाल ही में अपने नए कविता संग्रह 'आदिम बस्तियों के बीच' से खासी चर्चा में है.)

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