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प्रेमचंद गोश्वामी का काम नए मूल्यों की शुरुआत और उसे गति देने के संदर्भ में भी स्मरणीय

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on सोमवार, मार्च 19, 2012 | सोमवार, मार्च 19, 2012

 जयपुर  
प्रेमचंद गोश्वामी जिनका जन्मः १९३६ में बीकानेर मन हुआ था अब १५ मार्च २०१२ के बाद से भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं रहे. प्रेमचन्द्र गोस्वामी के काम को राजस्थान की आधुनिक कला के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो इनकी जगह उन इने-गिने कलाकारों में मानी जानी चाहिए , जिन्होंने एक समय अपने चित्र-ढंग को लेकर ख्याति और अभिशंसा अर्जित की थी इनका चित्रांकन प्रान्त की कला में नए मूल्यों की शुरुआत और उसे गति देने के संदर्भ में भी स्मरणीय है। इन्होंने कला पर और साहित्यिक लेखन में भी गहरी रुचि प्रदर्शित की थी तथा कला पर पत्रकारिता के ढंग से लिखने वाले यहाँ के परिचित परिश्रमी लेखकों में वह रहे उनकी बहुत सी किताबें भी छपी

कला-समीक्षक प्रयाग शुक्ल ने उनके चित्रों पर टिप्पणी करते हुए अपने स्तंभ में कभी यह कहा था-‘‘प्रेमचन्द्र गोस्वामी एक अर्से तक राजस्थान की युवा चित्रकार प्रतिभाओं का परिचय भिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने वाले लेखों के जरिए देते रहे हैं। उन्होंने ढेरों कहानियाँ भी लिखी हैं और यह आकस्मिक नहीं है कि हम उनके चित्रों में भी एक प्रकार का साहित्यिक रुझान देखते हैं शीर्षकों से लेकर उसके संयोजन तक में वे अभिव्यक्ति के लिएवैविध्यढूंढने वाले कलाकार ही अधिक हैं फिर भी उनकी कुछ प्राथमिकताएँ तो दिखती ही हैं लहराते रूपाकारों, दो रूपाकारों के बीच की दूरी, प्रस्फुटन के भावों आदि को हम देखते ही देखते हैं नगर-दृश्यों के प्रति भी वे पर्याप्त संवेदनशील हैं ‘‘ अपने बहुत से समकालीनों की तरह प्रेमचन्द भी अपने अमूर्त चित्रों को शीर्षक दिया करते थे, किन्तु कई बार लगता है कि शीर्षक, अमूर्त चित्रों की विशाल दुनिया को समझने के लिए बहुत छोटे दरवाजे का काम करते हैं। सम्भव है प्रेक्षक के मन में उनकी वजह से एक खास तरह की सुझावात्मकता और पूर्वाग्रह का विकास हो सकता हो, और इस तरह शीर्षक प्रेक्षक की संवेदना को अनपेक्षित रूप सेबांधनेका खतरा भी पैदा करता हो। अमूर्तन के संदर्भ में यह बात शायद अतिरिक्त महत्व की है।

अतः शीर्षकों पर जा कर प्रेमचन्द गोस्वामी के चित्रों का विश्लेषण करें तो हम यह कह सकते हैं कि उनमें कही बात को बदल कर कहने की भूमिका भी है। यद्यपि वहविषयवस्तुको कहीं-कहीं बहुत अहमियत देते हैं और एक योजनाबद्ध किस्म के अमूर्तन का रचाव करना चाहते हैं, किन्तु प्रेमचन्द गोस्वामी के वे चित्र अधिक संष्लिष्ट और परिपक्व हैं, जिनमें केवल रंग-संयोजन से कुछ अर्थ उत्पन्न करने का प्रयास किया गया है। इस आधार पररंग-षयनऔररंगोत्सवही ऐसी शृंखलाएँ हैं, जिनके माध्यम से उनकी षैलीगत मौलिकता को भली प्रकार पहचाना जा सकता है।

काल-क्रम के लिहाज से कहें तो 1954 के आसपास इन्होंने चित्र बनाने शुरू किए थे और धीमे-धीमे कई बरसों में अपने अपने स्ट्रोकों और रंग-योजना की प्रायः निजी शैली विकसित की परम्परा के प्रभावों से एकाएक मुक्त हो सकना और अपनी बात कहने के लिए कोई नया अंदाज विकसित करना, पचास के दशक-मध्य में असंभव नहीं, तो कठिन अवश्य था। यह वह समय था जब कि बंगाल-स्कूल से प्रभावित कलाकार जिनमें बहुतेरे युवा भी थे, परम्परागत या यथार्थवादी चित्रांकन में लगे हुए थे वाश और टैम्परा ही उनके बीच अधिक लोकप्रिय माध्यम थे। पर तैलरंगों के सम्मोहन ने बहुत जल्दी प्रेमचन्द गोस्वामी को बाँध लिया उन्होंने अपनी कला की घोषित शुरुआत तैलरंगों से की और 1955 में अपनी अपरम्परागत रचनाओं का पहला प्रदर्शन बीकानेर जैसी छोटी जगह में किया। याद रखें, तब प्रेमचन्द्र गोस्वामी शायद 19-20 साल के अनुभवहीन, पर सक्रियतर नवयुवक कलाकार रहे होंगे।

यद्यपि उस दौर के इनसे वरिष्ठ और सजग कलाकारों में द्वारकाप्रसाद शर्मा, भूरसिंह शेखावत, रामनिवास वर्मा, बी.सी. गुई, पी.एन. चोयल आर.वी.साखलकर और राम जैसवाल जैसे कई कलाकार सक्रिय थे जो परम्परागत, प्रभाववादी या बहुत हुआ तो नवयथार्थवादी शैलियों में प्रकृति चित्र, धार्मिक विषयों के चित्र या जनजीवन के अनुकरणमूलक चित्रों की रचनाएँ कर रहे थे, किन्तु बीकानेर जैसे अपेक्षाकृत छोटे शहर में रह कर भी इन्होंनेप्रयोगवादका जो रास्ता अपने लिए चुना, उससे इनकी प्राथमिकता औरहिम्मतका संकेत मिलता है प्रेमचन्द्र गोस्वामी ने 1954 से 1964 के दशक में जलरंगों में विभिन्न विषयों का अंकन किया
प्रेमचन्द्र गोस्वामी की कृतियों के मिजाज को आरम्भ से परखें तो हम कह सकते हैं कि इनमें रंगों से भरा हुआ मूर्तहीन परिवेश ही उपस्थित है। यहाँ वर्णों की उन्मुक्त और सघन दुनिया है- जिसे नाइफ के सहारे फलक पर फैलाया गया है। यहाँ रंग कभी गुड्ड-मड्ड हो कर आडे़-तिरछे पडे़ हैं, तो कहीं वे उठ कर खडे़ होने की तजवीज में हैं इन चित्रों की दुनिया के रंग बहुत आतुर हैं उनमें एक अजीब सी कसमसाहट, गति और मंथन है

व्यग्र रंगों के इस मथाव में गहरी रेखाओं की अपनी जगह और भूमिका है वे रंगों की इस सघन बेचैनी और सुगबुगाहट को और बढ़ाती हैं हल्के रंगों की पृष्ठभूमि पर कुछ वर्ण उभरते हैं, जिन्हें चाकू या ब्लेड सहारे मूल फलक पर मंडित किया गया है। ये आकार हमें याद दिला सकते हैं कुछ गहरी, चमकीली सम्वेदनाओं की, जो रंगों के फैलाव में से उठ रही हैं। इस अनगढ़ रंग-मेले में आड़ी-तिरछी, गोल, नुकीली, लहराती रेखाएँ भी मौजूद हैं, जो बहुधा एक दूसरे को काटती हैं और क्षुब्धता का गतिशील वातावरण रचती हैं। यहाँ ऐसा कुछ नहीं है-जिसे हम किसी स्पष्ट बिम्ब या मूर्त संज्ञा से जोड़ना चाहें-वे केवल हलचलें हैं - रंगों की बैचैन हलचलें

बहुधा ऐसे चित्रों का हमारे निकट यह भी अर्थ हो सकता है कि आंखों को अच्छी लगने वाली संरचनाएँ उनमें उपलब्ध हैं, और गर्म रंगों की प्रकृति को पहचानने का एक प्रयास वैसे बैंगनी, एक दौर-विशेष में लम्बे समय तक इनका प्रिय रंग रहा है। इस आलोक में अगर उनकी श्रंृखलारंग-शयनको देखें तो यही लगेगा कि मूल रंगों का सीधा प्रयोग और फलक पर आई हुई गहरी बोल्डनैस प्रेमचन्द्र गोस्वामी के चित्रों की विशेषताएँ हैं।
आकारों का विरूपण इनकी कृतियों की एक और प्रवृत्ति है, जिसके बारे में यहाँ कुछ कहना समीचीन हो। आकारों को निराकार में बदलना अगर षुरुआत में इनके लिए सम्भव नहीं हुआ है, तोडिस्टॉर्षनके माध्यम से उनमें किंचित बदलाव लाने की कोषिष तो इन्हांेने की ही है इसीलिए इनकी आकृतियाँं और उनके प्रयोजन यहाँं बहुत हद तक बदले हुए हैं।

1980 के बाद में इनके काम में लाल रंग उभरा है। हल्के रंगों के मध्य लाल या नारंगी टुकड़ों का होना कुछ ऐसा ही है जैसे फायरप्लेस मंे चटखते हुए अंगारे।कई बार प्रेमचन्द्र कीसिटीसीरीज के चित्र हमें अनायास ही रामकुमार के 1963 से 1966 के बीच बनाए चित्रों की याद दिला सकते हैं, पर अपने अमूर्त आकारों के रचाव में रामकुमार अधिक सचेत और धुंधले हैं जबकि प्रेमचन्द्र गोस्वामी षीघ्र ही अपनी मुखर रेखाओं की सक्रियता और रंग-फैलाव की भिन्नता के कारण इस साम्य से बच जाते हैं। रेखाओं का नुकीलापन इनकी रचनाओं में अक्सर उपस्थित रहा है, वह फलक पर उतरी हुई भीड़-भाड़ को बढ़ाता है। शायद इसी बहाने से क्या पता प्रेमचन्द्र हमें आदमी के भीतर की छटपटाती हुई महत्वाकांक्षाओं और नगर की भीड़ के यथार्थ से सम्बद्ध करत्र रहना चाहते रहे हों?

प्रतीकात्मक अर्थों में प्र्रेमचन्द्र गोस्वामी की कृतियों में हमें आकांक्षाओं से भरे एक अस्थिर किन्तु युयुत्सु-मन का आभास मिलता है- जिसके गतिमान रंग षायद किसी अनजानी सी उम्मीद में व्यग्र हैं।
चटख और गहरे मूल रंगों का प्रयोग प्रेमचन्द्र गोस्वामी अपनी कला-यात्रा मेंएक स्वाभाविक विकासही मानते हैं।चित्र-रचनाकी प्रयोगवादिता में ऐसा होना संभव है, यह परिर्वतन अनायास नहीं। ’’ वह कहते हैं।
कैनवास के आकारों में भी विगत दषकों में अन्तर दिखलायी देता है। इधर के वर्षों में उनका चित्र-फलक भी पहले से अब अधिक बढ़ा है।

‘‘पहले मै पूरे कैनवास को रंगों से भर दिया करता था, पिछले कुछ अर्से में ज्यामितिक आग्रहों के प्रति मेरा रुझान बढ़ा है। पर यह ज्यामिति पारम्परिक ज्यामिति से भिन्न है।’’

प्रेमचन्द्र गोस्वामी अपनी कला में प्रायः सभी तरह के रंग उपयोग में ला रहे हैं। वह रंगों के वैविध्य और उन से उत्पन्न होने वाले प्रकाष के प्रति बहुत आग्रहषील हैं। उनके निकट कला का एक प्रयोजन प्रेक्षक के मन में एक उल्लास और आनन्द जगा पाना भी है। ‘’कला मूलतः आनन्ददायी होनी चाहिए। वह मनुष्य की कष्ट-मुक्ति का साधन ही तो है। मैं अपने चित्रों में जीवन के उल्लास और हर्ष को व्यक्त करना चाहता हूँ । और इसलिए अलग-अलग रंगों को एक साथ उपयोग में लेने के अलावा कोई विकल्प नही देखता ....’’

उनकी धारणा है ‘‘चित्र से जुगुस्सा नहीं, सौम्यता ही जागनी चाहिए।’’ इसी से उनकी कुछ कृतियों में आँखों को भाने वाले अनेक रंग दिखलायी देते हैं। इस मायने में वे चित्र जीवन की सकारात्मकता को और उनके साथ जुड़े हर्ष की अभिव्यक्ति हैं। प्रेमचन्द्र गोस्वामी यह भी चाहते हैं कृतियाँ अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचें। प्रेमचन्द्र कहते हैं - मैं कला-कर्म कोस्वांतः सुखायनहीं मानता। कला ज्यादा से ज्यादा लोगों कोअपीलकर सके इसके लिए कला के रंग, रेखाओं, संयोजन और माध्यम में सम्प्रेषणीय भी होनी चाहिए। कृति यदि प्रेक्षक को प्रसन्न करती है, तभी वह सार्थक कृति है। फिर चाहे वह मूर्त हो या अमूर्त ’’

जीवन के हर्ष, सम्भावना और प्रसन्नता का बेहतरीन प्रतीक है-फूल। फूलों के रंगों, छटाओं और आकारों के प्रति प्रेमचंद के मन में विषेष अनुराग है, उनके कुछ चित्र एक प्रकार से ऐसे ही फूलों की वर्ण आभाओं को लेकर रचे गए है।कलाकृति के निर्माण से पहले वह उसके रेखांकन बनाना उपयोगी मानते है। पहले वह ऐसा नहीं किया करते थे। पर पिछले कुछ वर्षों से वह चित्र बनाने से पहले उनके स्याही या रंगीन रेखांकन बना लेते हैं। ‘‘इसका लाभ यह है कि पहले से निष्चित भाव की धारणा को रंगों में कैनवास पर उतारते समय अनावष्यक फेर बदल या उलट-फेर की जरूरत नही पड़ती। यही मेरे लिए ऐसे रेखाकनों की सार्थकता है।‘‘अब प्रेमचंद गोस्वामी इस दुनिया में नहीं हैं, और आज सुबह उनकी देह भी अग्नि को समर्पित कर दी जायेगी, पर उनका प्रेम, मेरे प्रति विश्वास और आदर कभी भुलाया जा सकेगा - ये बात असम्भव है

 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-



हेमंत शेष
(राजस्थान में प्रशासनिक अधिकारी होने के साथ ही साहित्य जगत का एक बड़ा नाम है.लेखक,कवि और कला समीक्षक के नाते एक बड़ी पहचान.इनके कविता संग्रह  'जगह जैसी जगह' को बिहारी सम्मान भी मिल चुका है.अब तक लगभग तेरह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है.हाल के दस सालों में सात किताबें संपादित की है.साथ ही 'राजस्थान में आधुनिक कला' नामक एक किताब जल्द आने वाली है.)
hemantshesh@gmail.com

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