Latest Article :
Home » , , , , , , » चार दशकों की साहित्यिक हलचलों का ज़रूरी दस्तावेज़ 'हमसफरनामा'

चार दशकों की साहित्यिक हलचलों का ज़रूरी दस्तावेज़ 'हमसफरनामा'

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on सोमवार, मार्च 26, 2012 | सोमवार, मार्च 26, 2012


लेखक से सगेपन का अहसास जगाता - हमसफरनामा 
(ये समीक्षा हाल के अंकों में देश की जानीमानी पत्रिका 'वागर्थ' में छप चुकी है
जिसे इंटरनेट के पाठकों की सहूलियत को देखते हुए
 हम यहाँ साभार छाप रहे हैं.
-सम्पादक) 

जानेमाने कथाकार स्वयं प्रकाश 
जिनकी जनवादी कहानियां
हमेशा पाठकों को
आकर्षित करती रही है.सूरज कब निकलेगा,
आदमी जात का आदमी,
पार्टीशन,
ज्योतिरथ के सारथी के साथ हमसफरनामा
समेत कई चर्चित कृतियों
के रचयिता,
देशभर की घुमक्कड़ी और
चित्तौड़ में लम्बे प्रवास
 के बाद हाल 'वसुधा'
का सम्पादन करते हुए भोपाल
 में बसे हुए हैं.उनका ईमेल पता 
स्वयं प्रकाश की पुस्तक ‘हमसफरनामा’ अपने अतंरगं परिचय के दायरे में आये इक्कीस लेखकों पर लिखे रेखाचित्रों का संकलन है। कथाकार स्वयं प्रकाश ने वैसे तो सभी रेखाचित्र पृथक - पृथक लिखे हैं पर इनकी अंतर्भावना लेखकों के जीवन, परिवेश,व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में पाठकों को  यह बताना रही है कि वे भी आम आदमी की तरह सुख-दुःख, राग - विराग और सांसारिकता से घिरे रहते है और इस संघर्ष  की राह से मानव जीवन को उत्तम बनाने की जो दिशा वे पाते हैं, वहीं उनके सृजन कर्म की आधारशिला होती है। 
इन रेखाचित्रों को पढ़कर पाठक स्वयं प्रकाश के 21 हमसफरों के व्यक्तित्व एवं कृतित्व से अंतरग परिचय तो पाता ही है, साथ ही गुजरे चार दशकों की साहित्यिक हलचलों से भी अपने को जोड सकता है। स्वयं प्रकाश की भाषा पठनीय और पाठक को रमाने वाली है, यह विशेषता इस संग्रह में भी बखूबी दिखती है। संकलन के रेखाचित्रों में संस्मरणात्मकता एक अतिरिक्त विशेषता के रूप में मौजूद है।
किताब का प्रथम रेखाचित्र ‘योग्य गुरू: योग्य शिष्य’ वरिष्ठ समालोचक नामवरसिंह पर है। लेखक ने उनकी आलोचक क्षमता का वर्णन करते हुए लिखा है कि ‘वे हिन्दी के एक मात्र सरस आलोचक हैं।’ उनकी भाषा में बड़बोलेपन , खामखां का जोश और अनावश्यक बलाघात नहीं है। बल्कि इसकी जगह कहीं -कहीं व्यग्यं का पुट और कहीं-कहीं कविता की सी लचक हैं। स्वंय प्रकाश की नजर में नामवर सिंह अच्छे वक्ता हैं, विनम्र व्यक्ति हैं और साथ ही श्रेष्ठ अध्यापक भी जो अपने विधार्थियों से क्लास रूम के बाहर भी मतलब रखते हैं। पर क्यों रखते हैं ? यह लेखक ने नही बताया।
भीष्म साहनी की सज्जनता, सुन्दरता और अनुशासन की खूब तारीफ़ लेखक करता है। भीष्म जी द्वारा स्वयं की हौसला-अफ़जाई से भी लेखक अभिभूत है पर उनके सृजन पर ठीक -ठाक  टिप्पणी नहीं हुई है। इस  संकलन में आये कुछ रेखाचित्रों में यह कमी खटकती है कि किसी रचनाकार के केवल जीवन पर ही लिख दिया गया है, जैसे प्रकाश आतुर तो किसी के कृतित्व की ही चर्चा हुई है, मसलन मणि मधुकर या आलमशाह खान । ऐसा वर्णन संकलन में असन्तुलन का अहसास जगाता है।
            
कमलेश्वर के समान्तर कहानी आंदोलन की याद दिलाते हुए लेखक लिखता है कि इस आंदोलन की उपलब्धियॉं शून्य रहीं हैं। स्वयं प्रकाश बतातें है कि कमलेश्वर के कहानीकार से इतर कार्यो मसलन दूरदर्शन, फिल्म और संपादन ने उनकी स्टार हैसियत बनाई है। परसाई जी के लेखन पर गहनता से विचार करते हुए लेखक कहता है कि ‘व्यंग्य’ को परसाई के पूर्व ‘हास्य व्यंग्य’ कहा जाता था जिसे उन्होंने गंभीर व्यंग्य बनाया। बालकृष्ण भट्ट जैसे नवजागरणकालीन लेखक की परम्परा को विकसित करने में परसाई जी का भारी योगदान रहा है।
निर्मल वर्मा की कहानियों के बारे में स्वयं प्रकाश के विचार बडे़ प्रभावी हैं। उनकी भाषा के बारे में वे कहते हैं ‘वह कविता नहीं, गीत नहीं, उसमें लालित्य और बिम्बात्मकता नही थी। वह तरल नही, कुछ धुंध जैसी थी। मुलायम रेशमी और अल्पपारदर्शी।’ आगे लेखक कहता है कि उनकी कहानियो में अक्सर पात्रों के नाम नही होते थे, कहानियों में सर्वनाम बहुत होते थे और उनके वक्तव्य भी सबसे अलग व अनुठे होते थे। निर्मल वर्मा के कृतित्व के सभी दुर्बल पक्षों पर रोशनी डालने का लोभ यहॉ स्वयं प्रकाश नही छोड़ पाए। फिर भी निर्मल वर्मा के निजी जीवन, सादगी आदि की प्रशंसा करके लेखक अपनी दृष्टि संतुलित होने का अहसास कराता है।
           
हिन्दी साहित्य में बच्चों की उपेक्षा का सवाल खड़ा करते हुए स्वयं प्रकाश आपका बंटी लिखने वाली मन्नू भंडारी को खूब दाद देते हैं। मन्नू जी की भाषा पर मुग्ध होकर उन्हें हिन्दी महिला कथा लेखन की भाषा निर्मित करने वाली तक साबित करते हैं। पर हमसफरनामाकार का मानना है कि महाभोज की लेखिकां ने जितना लिखा है, उससे कहीं अधिक की उम्मीद हिन्दी संसार को थी और है।
ज्ञानरजंन के कृतित्व की प्रशंसा करते हुए उनका कहना है कि ‘ज्ञानरंजन हमारी भाषा के एक ऐसे कहानीकार हैं जिनमें क्लासिक बनने की पूरी कुव्वत थी और है, लेकिन वह क्लासिक बन नही पाते।’ ज्ञानरंजन बहुत समय से चुप हैं, स्वयं  प्रकाश इसका विभिन्न तर्को से समर्थन करते हैं, वहीं राजेन्द्र यादव ( नामवर जी वाले रेखाचित्र में ) की इसी कमी पर उन्हें केासने से नही चूकते हैं। शायद यह स्वंय प्रकाश का ज्ञानरंजन के प्रति अतिरिक्त अनुराग ही है।
हिन्दी कहानी के क्षैत्र में सबसे अलग और अनुठे कृतित्व वाले काशीनाथ सिंह के लेखन की स्वंय प्रकाश जमकर तारीफ़ करते हैं। वे उनकी किताबें नहीं जिन्दगी पढ़ने की खासियत पर मुग्ध हैं। हमसफरनामाकार नामवर जी के छोटे भाई होने पर भी काशीनाथ सिंह को लाभ नहीं मिला , ऐसा मानते हुए उनके स्थापित होने को बड़ी जीवटता कहते हैं।
रमेश उपाध्याय पर लिखे रेखाचित्र को पढकर लगता है कि स्वयं प्रकाश अपने अंतरंग मित्र के बारे में जो कहना चाहते थे, वह नहीं कहकर जमाने भर की कह गए है। रमेश उपाध्याय के परिश्रम, सृजन और हौसले की तारीफ करते हुए लेखक उनके विचार व प्रतिबद्धता को सराहते है। डॉ0 कमला प्रसाद पर लिखे रेखाचित्र के बहाने स्वयं प्रकाश ने मध्यप्रदेश की तत्कालीन साहित्यिक राजनीति और उखाड-पछाड का विवरण दिया है। कमला प्रसाद की संगठनकर्ता के रूप में  प्रभावी भूमिका का सुन्दर चित्रण यहॉ उपस्थित है। 
मणि मधुकर पर लिखे रेखाचित्र में कहते है ‘सामूहिक कर्म मे अनास्था का ही परिणाम होता है, विचारधारा की अनुपस्थिति और इसकी परिणति रूपवाद मे ही होती है। और तब अराजकता, यौन उच्छृंखलता और उलजलूल की तरफ निकलते कहानीकार को देर नही लगती’। मणि मधुकर के साथ भी ऐसा ही हुआ। लेकिन इसमें भी कोई शक नही कि अंततः भाषा ही मणि की पहचान रही है और उसी के लिए वह याद किए जाते रहेगें। यहॉ कथा साहित्य का गंभीर विश्लेषण स्वयं प्रकाश के बारीक अध्ययन, समीक्षकीय क्षमता और सुस्पष्ट विचारों का परिचायक है। 
हमसफरनामाकार असगर वजाहत के बारे मे लिखते है - ‘जो सर्व सवीकृत है वही करते जाने मे असगर की बहुत दिलचस्पी नही हैं। उसकी प्रतिभा नये रास्तों की तलाश मे रहती है और इसके लिए वह विघा को तोडने छोडने बखेरने मे संकोच नही करता’। आत्मीय गद्य का विलक्षण उदाहरण बन पड़ा है यह रेखाचित्र। स्वयं प्रकाश ने कॉलेज मंे असगर के कमरें से लेकर घर के फर्नीचर,कार , चिट्ठियां उनकी कद काठी, व्यक्तित्व और मस्तमौलापन का जो खाका खींचा है, वह लुभावना है।    
अगले रेखाचित्र में प्यार का रस कुछ ज्यादा ही गाढा है। कवि राजेश जोशी के घर, परिवार और मस्ती-फुसर्त की चर्चा के साथ-साथ स्वयं प्रकाश ने उनकी कविता, नाटक व कहानी पर भी ठोस बातें कही जो धारदार है। पर लेखक उनके कविरूप को अतिरिक्त पंसद करता है, और कहता है ‘यदि हमारे किसी समकालीन कवि मे राजेश से अधिक कल्पना समृद्धि हो तो मुझे इसकी जानकारी नही है।’
लहर के यशस्वी संपादक प्रकाश जैन को याद करते हुए लेखक कहता है ‘शायद उनके साफ-साफ किसी दल या विचारधारा विशेष से नहीं जुडे होने के कारण ही ‘लहर’ मुक्त विचार और विमर्श का एक सफल और सार्थक मंच बनी और बनी रह सकी। प्रकाश जैन में अच्छे और बुरे, स्तरीय और घटिया साहित्य मंे तमीज करने की एक जबरदस्त सूझबूझ थी।’ लहर के संपादक व कवि के रूप में  स्वर्गीय जैन के संधर्ष और साहित्यिक प्रतिबद्धता को स्वयं प्रकाश ने बडे गरूर से याद किया है।
नंद चतुर्वेदी की जिन्दादिली , उनका अजातशत्रुपन और युवाओं के साथ युवा हो जाना करामात ही है, उनके चिर यौवन पर हमसफ़रनामाकार प्रफुल्ल्ति है और इसे अपने लिए चिरकिशोर बने रहने की प्रेरणा मानतें हैं। नंदबाबू की प्रचार से दूर रहकर यशोलिप्सा से पृथक रहने की कुव्वत को लेखक प्रशंसनीय मानतें है, पर उनकी श्रेष्ठ वक्तृता को  उनके लेखकीय कर्म के लिए अहितकर ठहराते हैं।
‘संबोधन’ के संपादक कमर मेवाड़ी की सूफियों जैसे निश्छलता स्वंय प्रकाश को  अत्यन्त आल्हादित करती है और आर्द्र भी। वे कमर मेवाड़ी के बहाने आठवें दशक में राजस्थान के उर्वरा साहित्यिक माहौल को  दिल की गहराई से याद करते है। संबोधन संपादक की यारबाजी, सेवाभाव और सहजता जैसे गुणों को बताकर लेखक, एक साहित्यकार की निष्कलुष्ता को प्रतिबिम्बित करते हैं।
राजस्थान साहित्य अकादमी के अध्यक्ष रहे प्रकाश आतुर के सुधार कार्यक्रमों और लेखकों  के सम्मान केा लौटाने वाले प्रयासों की लेखक ने प्रशंसा की है। आलमशाह खान के बारे में लिखें रेखाचित्र में स्वयं प्रकाश ने उनकी कहानियों के सभी पक्षों पर बेबाक राय दी है।हबीब कैफी के बारे में लेखक का कहना हैं ‘वह दिखाने से ज्यादा छिपाने में यकीन रखते हैं। जितना कहेगें उससे ज्यादा नहीं कहेगें। उनका सारा आर्ट इसी में है।’ कैफी की कहानियों के चरणबद्व विकास को भी बताने का उघम यहॉ संक्षिप्त पर भावभरा हैं। इसमें लेखक ने साहित्यकारों के प्रति समाज के उपेक्षा भाव पर रोष प्रकट किया है। राष्ट्रीय  परिदृश्य पर तेजी से उभर रहे राजस्थान के कहानीकार रघुनंदन त्रिवेदी की अचानक हुई मौत को हमसफरनामाकार कहानी जगत के लिए अपूरणीय क्षति मानते हैं। रघु के साथ हुई अपनी मुलाकातों और पत्र- व्यवहार के बहाने स्वयं प्रकाश आठवें नवें दशक से आगे की कहानी का मिजाज बताते हैं। 
    
हमसफरनामा में जिन  सर्जको के बारे में लिखा गया हैं उनमें से चार-पॉच केा छोडकर  बाकी अभी सक्रिय हैं और ये सभी लिख रहे हैं। सक्रिय लेखकों  के बारे में लिखते समय स्वंय प्रकाश अनेक स्थानों पर ठिठक जातें है। पाठक को लगता है कि लेखक यहॉ कुछ और भी कहना चाहता है पर कह नहीं पाया है। यह लेखक की सीमा है या रेखाचित्र विधा की? फिर भी स्वयं प्रकाश की सहज बोलचाल की भाषा जिन्दादिली का अहसास कराने में सक्षम साबित हुई है। उन्होनें व्यक्तित्व के साथ - साथ कृतित्व  पर भी गंभीर दुष्टि जमाई हैं जो इस संकलन की विशेषता हैं।
बहरहाल हिन्दी  के लेखकों  के बारे में पाठकों की जानकारी अत्यन्त कम रही है और ऐसे में लेखकों और पाठकों के  बीच सगेपन का रिश्ता काफी कमजोर है। इस सगेपन के रिश्ते को मजबूत बनाने की दिशा में यह महत्वपूर्ण प्रयास डॉ. स्वयं प्रकाश ने अपने  ‘हमसफरनामा’ में किया है। अन्य रचनाकार भी इस ओर ध्यान देकर अपने समकालीनों - अग्रजों से पाठकों को  रूबरू करायेंगे तो निश्चय ही रचनाकार - पाठक की नजदीकी बढे़गी जो साहित्य के हित में होगी।  

हमसफरनामा
लेखक स्वयं प्रकाश 
एक्सटेंशन -प्प् गाजियाबाद-201005 
(उत्तर प्रदेश) 
फोन:- 0120-6475212/
मूल्य 110/- रू.


 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-


डॉ.कनक जैन

चित्तौडगढ की साहित्यिक संस्था संभावना के सह संयोजक और बनास जन जैसी लघु पत्रिका के प्रबध सम्पादक है.यादवेन्द्र चन्द्र के साहित्य और कृतित्व पर शोध किया है.वर्तमान में स्कूले शिक्षा में हिन्दी के प्राध्यापक हैं.नगर में संचालित ठीक-ठाक विचारों की सामाजिक/सांस्कृतिक संस्थाओं के आयोजनों में आपका आना जाना है.मूल रूप से विज्ञान के छात्र है मगर हिन्दी के नाम से ख़ास पहचान है.मोबाईल-9413641775

Share this article :

0 comments:

Speak up your mind

Tell us what you're thinking... !

'अपनी माटी' का 'किसान विशेषांक'


संस्थापक:माणिक

संस्थापक:माणिक
अपनी माटी ई-पत्रिका

सम्पादक:जितेन्द्र यादव

सम्पादक:जितेन्द्र यादव
अपनी माटी ई-पत्रिका

सह सम्पादक:सौरभ कुमार

सह सम्पादक:सौरभ कुमार
अपनी माटी ई-पत्रिका

यहाँ आपका स्वागत है



यहाँ क्लिक करके हमारी डाक नि:शुल्क पाएं

Donate Apni Maati

रचनाएं यहाँ खोजिएगा

हमारे पाठक साथी

सम्पादक मंडल

साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका
'अपनी माटी'
========
प्रधान सम्पादक
सम्पादक
सह सम्पादक
तकनिकी प्रबंधक
========
संपर्क
apnimaati.com@gmail.com
========

ऑनलाइन

Donate Us

 
Template Design by Creating Website Published by Mas Template