देवेंद्र ने अपनी लाचारी और मजबूरी को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया - अपनी माटी

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देवेंद्र ने अपनी लाचारी और मजबूरी को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया


स्वप्न देखने की उम्र में बिजली के करंट का शिकार होकर अपना एक हाथ गंवा देने वाले दस साल के देवेन्द्र झाझडिय़ा के लिए यह हादसा कोई कम नहीं था। दूसरा कोई होता तो दुनिया की दया, सहानुभूति तथा किसी सहायता के इंतजार और उपेक्षाओं के बीच अपनी जिंदगी के दिन काटता लेकिन हादसे के बाद एक लंबा वक्त बिस्तर पर गुजारने के बाद जब देवेंद्र उठा तो उसके मन में एक और ही संकल्प था और उसके बचे हुए दूसरे हाथ में उस संकल्प की शक्ति देखने लायक थी। देवेंद्र ने अपनी लाचारी और मजबूरी को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया, उल्टा कुदरत के इस अन्याय को ही अपना संबल मानकर हाथ में भाला थाम लिया और एथेंस पैरा ओलंपिक में भाला फेंक स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीत कर वो करिश्मा कर दिखाया जो आज तक इस देश के लिए कोई खिलाड़ी नहीं कर सका था। 

राजस्थान के चूरू जिले की राजगढ़ तहसील के छोटे से गांव जयपुरिया की ढाणी में एक साधारण किसान रामसिंह के घर 10 जून 1981 को जन्मे देवेन्द्र ने सुविधाहीन परिवेश और विपरीत परिस्थितियों को कभी अपने मार्ग की बाधा नहीं बनने दिया। गांव के जोहड में एकलव्य की तरह लक्ष्य को समर्पित देवेंद्र ने लकड़ी का भाला बनाकर खुद ही अभ्यास शुरू कर दिया। देवेन्द्र के खेल की  विधिवत शुरूआत हुई 1995 में स्कूली प्रतियोगिता से। कॉलेज में पढ़ते वक्त बंगलौर में राष्ट्रीय खेलों में जैवलिन थ्रो और शॉट पुट में पदक जीतने के बाद तो देवेंद्र ने कभी पीछे मुडक़र नहीं देखा। 1999 में राष्ट्रीय स्तर पर जैवलिन थ्रो में सामान्य वर्ग के साथ कड़े मुकाबले के बावजूद स्वर्ण पदक जीतना देवेंद्र के लिए बड़ी उपलब्धि थी।

देवेन्द्र की उपलब्धियों का सिलसिला चल पड़ा पर वास्तव में उसके ओलंपिक स्वप्न की शुरुआत हुई 2002 के बुसान एशियाड में स्वर्ण पदक जीतने के साथ। इसके बाद 2003 के ब्रिटिश ओपन खेलों में देवेंद्र ने जैवलिन थ्रो, शॉट पुट और ट्रिपल जंप तीनों स्पर्धाओं में सोने के पदक अपनी झोली में डाले। देश के खेल इतिहास में देवेंद्र का नाम उस दिन सुनहरे अक्षरों में लिखा गया, जब उन्होंने एथेंस  पैरा ओलंपिक में भाला फेंक स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता। देवेंद्र। ओलंपिक में व्यक्तिगत स्पर्धा में स्वर्ण जीतने वाले पहले खिलाड़ी बने ।देवेन्द्र  की कामियाबियों पर उन्हें बहुत सारे पुरस्कार-सम्मान दिये जा चुके हैं। देवेन्द्र को स्पेशल स्पोट्र्स अवार्ड 2004, अर्जुन अवार्ड 2005, राजस्थान खेल रत्न, महाराणा प्रताप पुरस्कार 2005, मेवाड़ फाउंडेशन का प्रतिष्ठित अरावली सम्मान 2009 सहित बहुत सारे पुरष्कार हैं जो देवेंद्र की प्रतिभा और हौसले के प्रतीक हैं। 

भारत रत्न डॉ एपीजे अब्दुल कलाम और अपनी मां जीवणी देवी को अपना आदर्श मानने वाले देवेंद्र कामयाबी के इस आसमान पर खड़े होकर भी अपनी मिट्टी को सलाम करते हैं। खेलों के सिलसिले में 14 देशों का सफर कर चुके देवेंद्र को सुकून तक मिलता है, जब वे गांव आने के बाद थाली भरकर छाछ- राबड़ी पीते हैं और अपने खेल जीवन की शुरुआत में कर्मस्थली बनी गांव के जोहड़ की मिट्टी में अभ्यास करते हैं। मई 2007 में विवाह सूत्र में बंधे देवेंद्र की जीवन-संगिनी मंजू भी कबड्डी की राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी रह चुकी हैं। साधारण परिवेश और अभावों की बहुलता से अपने हौसले  के दम पर संघर्ष कर इतिहास रचने वाले राजस्थान के नूर और युवा पीढ़ी के प्रेरणा स्रोत देवेंद्र झाझडिय़ा को हाल ही में राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने पद्मश्री से सम्मानित किया। देवेंद्र ने अपनी यह उपलब्धि अपने माता-पिता को समर्पित करते हुए कहा कि उन्हे इस सूचना से बहुत खुशी हुई है। इससे समाज के तमाम नि:शक्तों का हौसला बढेगा और नि:शक्तों के प्रति लोगों की धारणाओं में बदलाव आएगा। 


 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

रमेश सर्राफ धमोरा

झुंझुंनू,राजस्थान
मोबाईल-9414255034 

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