सुशीला शिवराण की रचना - अपनी माटी Apni Maati

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सुशीला शिवराण की रचना


बीता हुआ कल
रहता हूँ साथ  
कभी हँसी
कभी उदासी बनकर
कभी जीत
कभी हार बनकर
तुम्हारी छाया हूँ
तुमसे जुदा कहाँ?
बीत कर भी बीता कहाँ ?
बीता हुआ कल!
  
बीता हुआ कल हूँ !
फिर भी साथ हूँ

पल-पल
कभी मीठी याद
कभी आसूँ बनकर
कभी बेबसी
कभी टीस बनकर
ले ही आता हूँ
कभी होठों पे हँसी
बीता हुआ कल!



होली कल और आज



आया फाग
लाया मन अनुराग
होली के वे चित्र
बन गए हैं जीवन मित्र
फिर आ-आ गले मिलतेहैं
अतीत को जीवंत कर देते हैं !


नयनों में घूमे वही चौपाल
सजता हर रात नया स्वांग
होती महीने भर की होली
सखियों संग हँसी-ठिठोली
ढप और चंग की थाप
झूम उठते दिल और पाँव
जुटता सारा गाँव
होते सुख-दुख सांझे
सबको बाँधे प्रीत के धागे !


महानगरों के कंकरीट जंगल में
खो गये होली के रंग
घुटती हुई भांग कहाँ दिखती है
गाती-बजाती टोलियाँ कहाँ दिखती हैं
कहाँ छनकते हैं रून-झुन घुंघरू ?


सोसाइटी पार्क में 
सज जाती हैं मेजें
तश्तरियाँ,पकौड़े,चाय/कॉफ़ी,शीतल पेय
लग जाता है म्यूज़िक सिस्टम
भीमकाय स्पीकर
फ़िल्मी गीत
बच्चों का हुड़दंग
बालकनियों से झाँकती आँखें
छितरे-छितरे से लोग
हाथों में अबीर-गुलाल
ढूँढते हैं परिचित चेहरे
उल्लास, उत्साह पर दुविधा की चादर
कौन करे रंगने की पहल
दुविधा में ही बढ़ जाते कदम !

कहाँ वो ज़ोर-जबर्दस्ती
वो लुकना-छिपना
वो ढूँढना
रंगो से नहला देना
खिल-खिल गले मिलना
ढोल पर झूम उठना
उल्लास पर काबिज सौम्यता
मस्ती में भी संयम, गरिमा !


नहीं चढ़ती कड़ाही
नहीं बनती घर पर
शकरपारे और गुजिया
हो जाती है होम डिलीवरी
मीठा तो है
माँ के हाथ की मिठास कहाँ
त्योहार तो है
वो उमंग, वो उल्लास कहाँ
अब उत्सव भी जैसे
परंपरा निभाए जाने की
औपचारिकता भर रह गए हैं
अंतर्जाल की दुनिया के
ब्लॉग, फ़ेसबुक, ट्‍वीटर पर
सिमट कर रह गए हैं !

 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
सुशीला शिवराण
(जन्म से झुंझूनू राजस्थान की सुशीला जी लिखने-पढ़ने वाली रचनाकार हैं.मुंबई और कोच्ची में नेवल पब्लिक स्कूल, बिरला पब्लिक स्कूल, पिलानी, डी.ए.वी. गुड़गाँव से अपनी शिक्षण-यात्रा करते हुए आजकल सनसिटी वर्ल्ड स्कूल,गुड़गाँव में अध्यापनरत.सालों से अध्यापकी कर रही है.दूजी रुचियों में खेल और भ्रमण शामिल हैं. इनसे संपर्क हेतु उनके ब्लॉग और ई-मेल पर जुड़ेगा.)

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