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मोहन श्रोत्रिय जी की आज के दौर की पड़ताल करती कवितायेँ

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on सोमवार, अप्रैल 02, 2012 | सोमवार, अप्रैल 02, 2012


(1)
रुकना चाहिए यह सिलसिला
सही वक़्त पर सही सवाल
खड़े करने से कतराते रहने का
यह सिलसिला कभी टूटेगा भी
या चलता ही रहेगा यह
यूं ही अनवरत? ज़रूरी है
सब कुछ की समीक्षा
बेलाग बेलौस ढंग से.

यों तो पुस्तक समीक्षा भी ज़रूरी है बेशक
पर लगता है कई बार कि
समीक्षाओं की समीक्षा ज़रूरी है
क्योंकि
समीक्षाओं से उनके छद्म का
तिलिस्म तो टूटता नहीं दिखता
पता ही नहीं चलता क्यों
लिखी जाती हैं जैसी
लिखी जाती हैं वे? जुगाड़ किया जाता
है जो, रहस्यों को परत-दर-परत
छिपाने का ही करता है काम
रचना का, समीक्षा का पूरा सच
नहीं पाता सामने.

कैसे हो जाता है
कि युवा कवि लिख देता है
चार कविताएं "बड़े" कवि की शान में
और औचक रह जाती है साहित्यिक दुनिया
जब पा जाता है युवा कवि एक
प्रतिष्ठित पुरस्कार " कुछ कविता"
के बूते पर! पुरस्कार के लिए अनुशंसा भी
तो समीक्षा ही होती है, मूलतः और
अंततः ...

मज़ा यह कि तिकडम के सहारे
इस तरह बहुत कुछ पा जाने वाले
रोते ही रहते हैं रोना फिर भी
शिकार बन जाने का  जाने किस-किस
तरह के पूर्वाग्रहों का
पुरस्कृत-सम्मानित होते हुए भी
वंचित रखे जाने का
ध्यान अपने पर से हटाने का
समय-सिद्ध टोटका है यह जब
भीड़ में घुस कर चोर ही चिल्लाने लगे
"चोर,चोर" क्योंकि कर ही नहीं सकती
कोई शक़ ऐसे आदमी पर वह भीड़
जो भागी जा रही है चोर की तलाश में !

कैसा लगे जब पता चले
कि कविता में पूरी धरती से
सरोकार जताने वाला कवि
परदे के पीछे
"पुरबिया" बन जाता है
पुरस्कार पाने को, एक
"बड़े" कवि-निर्णायक का
दुमछल्ला बन जाता है !

कि कैसे एक कवि
अच्छी-दिखती कविताएं लिखने
के साथ-साथ ही
गुमनाम पत्र भी लिखता है
बेहद पुरअसर और फलदायी
अपने "नामित प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ़
पुरस्कार-आयोजक-संपादक की
सलाह पर ! नेपथ्य में चलता रहता है जो
वह दुनिया को, हमारी दुनिया को
कुछ ज़्यादा ही बदसूरत बना देता है.
"भीतर" और "बाहर" के बीच ऐसा
फ़र्क़ तो नहीं होता था आज से
कुछ समय पहले तक. यों लोभ-लालच से
मुक्त नहीं थी दुनिया तब भी
पूर्वाग्रह काम करते थे तब भी
निजी पसंद-नापसंद का मसला
उतना "गौण" नहीं हो गया था,
और जात-बिरादरी का खेल झांक ही
जाता था उन दिनों भी
यानि समीक्षा का स्वर्ण युग वह भी नहीं था
फिर भी इतनी समझदारी नहीं
गई थी, समयपूर्व
कवियों में
"साधने" की कला में ऐसी महारत
हासिल नहीं थी...अपवाद हो सकते थे
इक्का-दुक्का. और खेल की चालें भी
उतनी उजागर नहीं हई थीं.

समीक्षा के औजारों की समझ  जितनी ज़रूरी है
उससे कम ज़रूरी नहीं है
समीक्षा के औजारों की समीक्षा.
इसीसे संभव होगी समीक्षा की समीक्षा
इसीसे खुलेंगे रचना-समीक्षा के प्रयोजन
गिरोहबंदियां भी होंगी उद्घाटित इसी से.
खुला खेल फ़रुक्काबादी
कैसे चल सकता है अनवरत?

तो क्यों नहीं होनी चाहिए कवियों की
पक्षधरताओं  की और
उतनी ही कड़ी समीक्षा समीक्षकों,
निर्णायकों और
प्रस्तावित-अनुमोदित-प्रोन्नत
करने वालों की भी?

यह सब नहीं होगा तो
जीवन की समीक्षा का क्या होगा?
और जीवन की समीक्षा नहीं
तो साहित्य की क़ीमत क्या?

(2)
तब और अब
बहुत पुरानी नहीं है यह बात
गर्मी के मौसम में बढ़ती थी जैसे ही
किल्लत पानी की
हर दूसरे-चौथे दिन झंडों की अगुवाई में
निकलती थी औरतें
मुसे कपडे पहने हुए, पर
इस सबके प्रति बेपरवाह
निकलती थी औरतें
टीकाटीक दुपहरी में पुराने मटकों को
रख कर सिर पर
पानी के दफ़्तर में फोड़ने के लिए
कोसते हुए सरकार को समवेत स्वर में.

महंगाई और जमाखोरी के खिलाफ़
निकलती थी रैलियां
ट्रेड यूनियनों की तरफ़ से
गुंजाते हुए आसमान को ओजस्वी नारों से
आम सभा में बदल जाती थी रैली
शहर के बीचो-बीच. बहरों के कान पर
नगाड़े बजाने की क़वायद जो कई दिनों तक
चढ़ी रहती थी लोगों की जुबान पर.
रैली निकालने वालों से पांच गुना भीड़
इकठ्ठा होती थी इन सभाओं में.
जहां 'सींग समाएं' वहीं बैठे-खड़े
सुनते थे वक्ताओं को.

यह कैसा उदारवाद आया है
जिसने हर दुख-तकलीफ़ को
झेलने और हालात के अपरिवर्तनीय होने का
ज़हरीला भाव भर दिया है जन-गण के मन में
नियति ही मान लिया गया हो जैसे
फालिज मार गया हो प्रतिरोधी मंसूबों को.

और ये जो कलश-यात्राएं देख रहे हैं आप
कभी भागवत कथा और कभी
गायत्री शांति-संपन्नता यज्ञों के नाम पर?
इन्होंने जगह ले ली है मटका-फोड़ अभियानों की
कितने उत्साह से
गहनों से लदी-फंदी महिलाएं चमचम
वस्त्रों में हंसती-बतियाती उल्लसित
निकालकर लाई जाती हैं घरों से पूरी
तैयारी के साथ जैसे जता रही हों
सबको कि सब कुछ तो ठीक है
इतना जितना पहले कभी नहीं था
धर्म-ध्वजा फहरा रही है
चमक रहा है आर्यावर्त्त
अब और क्या चाहिए? नव-धनाढ्य वर्ग
पाता है सामाजिक प्रतिष्ठा
मन को गहरे गुदगुदाने वाली स्वीकार्यता
अधर्म से अर्जित धन को उलीच कर
धर्म के नाम पर. एक ज़माना वह था
जब बुरा माना जाता था
प्रदर्शन धन का और
वैभव का निर्लज्ज प्रदर्शन
और आज? मुंह बाए देखते रहते हैं
राहगीर, और श्रद्धा(?) से बैठे दर्शक-श्रोता
मन के भीतर चलता हो जो भी
ऊपर से जयकारा है खुले गले से
धन्य धन्य धन्य धर्मात्मा,
त्यागी, दानी, अपरिग्रही
और जाने क्या-क्या!

बच्चों की परीक्षाएं चल रही हैं
ज़ाहिर है पढ़ना तो तब तक है ही
जब तक एक भी पर्चे का धरा हुआ है बोझ छाती पर
यह पत्थर हटेगा तो रख जाएगी
कोचिंग की शिला जो धरी रहेगी अगले
साल की परीक्षा तक. दुविधा में
मां-बाप
नहीं कह पाते खुलकर कि गूंजते
लाउड स्पीकर के स्वर बरछी से चुभते हैं
उनकी छाती में और
उनके बच्चों के कानों में
और यह गूंज अंधियारा फैला देती है
उनकी आंखों के सामने. दुविधा पैदा होती है
इस डर से कि उन्हें नास्तिक धर्म-विरोधी
समझ लिया जाएगा. मैंने कहा
ऐसे कुछ दुखियारों से कि विरोध
पाखंड का, ढोंग का, वैभव के नंगे प्रदर्शन का
करने पर मिलता है ख़िताब गर
नास्तिकता का तो यह
बात शर्म की नहीं विजय की है
उल्लास मनाया जाना चाहिए जिस पर.
खुद के हितों पर पड़ रही हो चोट
फिर भी सच को सच कहना
और ग़लत ढंग से प्रतिष्ठा अर्जित करने वालों
को बेनक़ाब करने से कतराना
व्यावहारिकता नहीं कायरता है
और कायरता की शर्मिंदगी उठाते
चले जाना चिंता की बात है
नास्तिकता का तमगा गर्व की बात है
वे चाहे गाली के रूप में ही कह रहे हों इस बात को.

तब और अब का फ़र्क़ दिखाना
प्रेरित नहीं है अतीत-मोह से
झुंझलाहट है जो पैदा होती है
खुले दिमाग, खुली आंखों और अच्छी स्मृति
के संयोजन से. लुप्त होते चले जाना अच्छी चीज़ों का
और दिखते रहना असहनीय ग़लत चीज़ों का
पैदा तो करता ही है गुस्सा
यह गुस्सा सामूहिक गुस्से में कब बदलेगा?
"उदात्त सामूहिक क्रोध" में जो भस्म करने की शक्ति से
भरा हो, और राख से नया सृजन करने की
संभावना को मूर्त रूप देने के
भाव और जोश से भर दे, हम सबको.

(3)

आत्म-मुग्धता हरण कर लेती है विवेक का
और बन जाती है यह
दुधारी तलवार जो
ज़ख़्मी करती है सिर्फ़ उसे नहीं
जिसे हम अपना विरोधी समझने लगते हैं
बल्कि उसको भी जो आज़माता है हाथ
या कहें
भांजता है तलवार को. वहम भी तो
होते हैं पैदा आत्म-मुग्धता से अनिवार्य तौर पर
यानि दुर्निवार होता है बच पाना जिनसे.

ज़िंदगी ने लगाई हैं कितनी ठोकरें
या सिखाए हैं कितने सबक़
इससे मिलती है वह दृष्टि जो
करती है प्रेरित खुद पर चलाते
रहने को चाबुक या यों कहें
कर देती है तैयार अलग तरह से देखने को
चीज़ों को.


(4)

जीवन ने गुज़ारा है इतनी
कड़ी परीक्षाओं से, इतने लिए हैं इम्तिहान
जिनमें फ़ेल हो-होकर भी पास हुआ अंततः
सिर्फ़ इस बूते पर कि
छल, फ़रेब और विश्वासघात को मौक़ा
नहीं दे सकता था मेरी अपनी "खुदी" को तोड़ देने का.
मेरी क़ीमत पर खुशियां मनाने का,
उन सबको जिन्होंने कर दिया था
लगभग सुनिश्चित कि
मैं पगला जाऊं या फिर करलूं
आत्म हत्या. बीस से अधिक साल
हो गए और वे "विचार-वीर" दुखी से
ज़्यादा चकित हैं कि "मैं अभी भी हूं"
यहीं, सबके बीचो-बीच
सक्रिय और प्रसन्न.


(5)

मंज़िलें कितनी भी तय हों
रास्ते सीधे नहीं जाते वहां तक
साथ चलनेवाले भी कहीं भी छिटक कर
हो सकते हैं अलग.
बहुत संभव है
आगे मिल जाएं कुछ और लोग
जिनके साथी भी हो गए हों दूर
उनसे छिटक कर. कुछ समय के लिए
ग़लत साबित हो सकता है
भरोसा करना मनुष्य की जन्मजात
अच्छाई पर. सब कुछ के बावजूद
अच्छाई ही सर्वकालिक सत्य होती है,
आज जो भी लगे.
ईर्ष्याएं जीवित रहती हैं, टुच्चापन भी
और अहंकार भी
ज़ाहिर है, ये प्रतीक हैं अंधेरे के
पर हर अंधेरी सुरंग के परे रौशनी होती है,
कितनी ही मद्धिम और क्षीण क्यों हो !


 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

मोहन श्रोत्रिय
(जे.एन.यूं. में पढ़े,कोलेज शिक्षा से सेवानिवृति,प्रखर वक्ता और लेखक ,चर्चित त्रैमासिक 'क्‍यों' का संपादन - स्‍वयंप्रकाश के साथ किया,राजस्‍थान एवं अखिल भारतीय शिक्षक आंदोलन में अग्रणी भूमिका रही,लगभग 18 किताबों का अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद. लगभग 40 किताबों के अनुवाद का संपादन.जल एवं वन संरक्षण पर 6 पुस्तिकाएं हिंदी में/2 अंग्रेज़ी में. अनेक कविताओं, कुछ कहानियों तथा लेखों के अनुवाद पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित.)


Contact:- 
G-001, PEARL GREEN ACRES
Shri Gopalnagar,Gopalpura

Bypass,Jaipur, India 302019,
Cell-9783928351,

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