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अंगप्रदेश के सांस्कृतिक इतिहास को रेखांकित करती हुई पुस्तक ‘अमृत देश: अंगप्रदेश’

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on रविवार, अप्रैल 08, 2012 | रविवार, अप्रैल 08, 2012


 अमृदेश का इतिहास है: ‘अमृत देश: अंगप्रदेश’

डॉ. अमरेन्द्र की इतिहास पुस्तक, जो रेडियो रूपक के रूप में लिखी गयी है, इसी बिन्दु से शुरु होती है और यहाँ से प्रस्थान कर वैदिक उपनिषद, रामायण, महाभारत, जैन तथा बौद्धकाल में अंगप्रदेश के सांस्कृतिक इतिहास को रेखांकित करती हुई, पालवंश के विक्रमशिला विश्वविद्यालय के उत्थान और पतन को रेखांकित करती है । रामायण, महाभारत, जैनग्रंथ और जातकों के अनेक प्रसंगों के द्वारा डॉ. अमरेन्द्र ने अपनी पुस्तक ‘अमृतदेश: अंगप्रदेश’ में उस अमृत मंथन के इतिहास का लेखन किया है, जो एकत्रित रूप में इतिहास को भी चौंधिया देने वाला है । यह अंगप्रदेश ही है, जहाँ कभी व्रात्य धर्म फूला-फला, राजा दशरथ को पुत्र प्राप्ति के लिए अंग के ऋषि ऋष्यशृंग ने पुत्रेष्टि यज्ञ किया, बुद्ध की पहली शिष्या विशाखा अंग की ही थी और महावीर की पहली शिष्या चन्दनवाला भी । इतिहासकार डॉ. अमरेन्द्र ने विभिन्न इतिहास ग्रन्थों को निचोड़ कर यह तथ्य सामने रखा है कि ऋषि अष्टावक्र ही अंगप्रदेश के नहीं थे, नचिकेता को भी इसी अमृत देश ने जन्म दिया था । 

अंगप्रदेश की चम्पा के दक्षिण में फैले नागवंशी राजाओं की कथा ही इसमें नहीं है बल्कि लोरिक, बिहुला, सलेस, विसुरॉत, नटुआ दयाल जैसे लोकदेवताओं की जन्मभूमि और कर्मभूमि रहा अंगप्रदेश ने भारतीय आजादी के संघर्ष में जो भूमिका निभाई, इसका यहाँ विस्तार से वर्णन है, जो तिलकामांझी के संघर्ष यानी 1757 से प्रारम्भ होता है । ‘अमृतदेश: अंगप्रदेश’ बुद्धकाल के उस सांस्कृतिक और आर्थिक वैभव को भी विराटता से उद्घाटित करता है, जब चम्पा के लोगों ने पूर्वी द्वीप समूहों में जाकर चम्पा उपनिवेश की स्थापना की थी और पूरे द्वीप समूहों को ‘अंगकोर’ का नाम दिया था । 

इस पुस्तक में डॉ. अमरेन्द्र की दृष्टि आरंभ से ही शोधपूर्ण रही है । भूमिका के आरंभ में ही उनकी यह दृष्टि देखी जा सकती है, ‘‘अंगप्रदेश, मुझे आरम्भ से ही स्वर्णकलश में बंद एक सूरज की तरह लगता रहा है, जिसकी छटा से अभी भारत का इतिहास परिचित ही नहीं हुआ । जो इतिहास लिखा गया है, वह इस प्रदेश के सांस्कृतिक महत्व की उपेक्षा करते हुए । अगर विचार पूर्ण तथ्य के आधार पर इतिहास लिखने की कोशिश होती तो कम्बोज में प्रथम हिन्दू राज्य के संस्थापक कौण्डिन्य को दक्षिण भारतीय बताने का अनुमान नहीं होता । यह अजीब बात है कि जिस कौण्डिन्य को दक्षिण भारत का ब्राह्मण कहा गया, उस व्यक्ति के बारे में तमिल साहित्य या दक्षिण के किसी प्रान्त के इतिहास और साहित्य में कहीं उल्लेख तक नहीं मिलता । विरोध की हद है । कौण्डिन्य ने सोमा नामक नागवंशी कन्या से शादी की थी, हमें स्मरण रखना चाहिए कि नागवंश, अंग के राजवंशों में एक है । आज भी इस प्रदेश में कौण्डिन्य वंश के चिन्ह कौण्डिया नाम से मिल जाते हैं । यह यहाँ के साहित्य और समाज में भी व्याप्त है।’’

निस्संदेह डॉ. अमरेन्द्र की सद्यप्रकाशित कृति ‘अमृतदेश: अंगप्रदेश’ अंगप्रदेश की महान संस्कृति को ही नहीं, इसकी नदियों, इसके पर्वतों, इसके वनों के इतिहास को उसी भव्यता में रखती कृति है । यह पूरे विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि अंगप्रदेश के सम्पूर्ण वैभव को समझने के लिए, वर्तमान में इससे बढ़िया कोई कृति नहीं है, जिसका मुद्रण और आवरण सज्जा वैसा ही भव्य बन पड़ा है ।

पुस्तक : अमृतदेश: अंगप्रदेश
लेखक : डॉ. अमरेन्द्र
प्रकाशक : समीक्षा प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य   : 200 रु.

 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
कुमार कृष्णन
स्वतंत्र पत्रकार
 द्वारा श्री आनंद, सहायक निदेशक,
 सूचना एवं जनसंपर्क विभाग झारखंड
 सूचना भवन , मेयर्स रोड, रांची
kkrishnanang@gmail.com 
मो - 09304706646

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