Latest Article :
Home » , , » लोकेश नशीने "नदीश" के नई ग़ज़लें

लोकेश नशीने "नदीश" के नई ग़ज़लें

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on मंगलवार, अप्रैल 03, 2012 | मंगलवार, अप्रैल 03, 2012


एक
कितना ग़मगीन ये आलम दिखाई देता है
हर जगह दर्द का मौसम दिखाई देता है

दिल को आदत सी हो गई है ख़लिश की जैसे
अब तो हर ख़ार भी मरहम दिखाई देता है

तमाम रात रो रहा था चाँद भी तन्हा
ज़मीं का पैरहन ये नम दिखाई देता है

जहाँ पे दर्द ने जोड़े नहीं कभी रिश्ते
वहां का जश्न भी मातम दिखाई देता है

ग़मों की दास्ताँ किसको सुनाता मैं "नदीश"
न हमनवां है न हमदम दिखाई देता है

दो
झरते तुम्हारी आँख से जानम नमी के फूल
खिलने लगे हैं दिल में मेरे तिश्नगी के फूल

भटके न राहगीर कोई राह प्यार की
रक्खे हैं हमने रहगुज़र में रौशनी के फूल

दिल में तुम्हारी याद का जो चाँद खिल गया
झरने लगे हैं आँख से भी चांदनी के फूल

अपना लिए हैं जब से तुमने ग़म मेरे सनम
हर सांस महकती है लिए बंदगी के फूल

है तसफिये की ख़ुशी से बेहतर ग़म-ए-हयात
खिलते हैं दर्द के चमन में ज़िन्दगी के फूल

छूकर ग़ुल-ए-ख्याल-ए-नाज़ुकी को तुम्हारी
होंठों पे गुनगुना रहे हैं शायरी के फूल

भूलेगा कैसे तुझको ज़माना कभी "नदीश"
अशआर तेरे आये हैं लेके सदी के फूल 

 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
लोकेश नशीने "नदीश"
रामनगररामपुर
जबलपुर (.प्र.) भारत
मोब. 9200250959
ई-मेल:lokesh.nashine@gmail.com

Share this article :

0 comments:

Speak up your mind

Tell us what you're thinking... !

'अपनी माटी' का 'किसान विशेषांक'


संस्थापक:माणिक

संस्थापक:माणिक
अपनी माटी ई-पत्रिका

सम्पादक:जितेन्द्र यादव

सम्पादक:जितेन्द्र यादव
अपनी माटी ई-पत्रिका

सह सम्पादक:सौरभ कुमार

सह सम्पादक:सौरभ कुमार
अपनी माटी ई-पत्रिका

यहाँ आपका स्वागत है



यहाँ क्लिक करके हमारी डाक नि:शुल्क पाएं

Donate Apni Maati

रचनाएं यहाँ खोजिएगा

हमारे पाठक साथी

सम्पादक मंडल

साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका
'अपनी माटी'
========
प्रधान सम्पादक
सम्पादक
सह सम्पादक
तकनिकी प्रबंधक
========
संपर्क
apnimaati.com@gmail.com
========

ऑनलाइन

Donate Us

 
Template Design by Creating Website Published by Mas Template