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व्यंग्य:किताब दर किताब

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on रविवार, अप्रैल 22, 2012 | रविवार, अप्रैल 22, 2012


 मैं एक झोलाछाप लेखक हूं। मेरे झोले में पत्र पत्रिकाआंे के अलावा किताबे भी रहती हैं। हर पुस्तक मेले में जाता हूं। किताबे उलटता हूं, पलटता हूं, कभी कभी कुछ अंष वही पर पढ़ लेता हूं या फोटोकॉपी करा लेता हूं, मगर पुस्तक खरीदना हर तरह से मुष्किल होता जा रहा है। हिन्दी संसार में पुस्तकों का क्रय विक्रय, सबमिषन, चर्चा, गोष्ठी सब लेखक की औकात पर निर्भर करती है। हर साल हजारों टाइटल छपते हैं। हर पुस्तक कम से कम सौ पृष्ठ की होती है, हर पुस्तक की हजार या पांच सौ प्रतियां छपती है, प्रकाषक उसे किसी न किसी सरकारी खरीद में भिड़ा देता है, फिर भी उसकी आत्मा रोती कलपती रहती है। लेखक को देखते ही प्रकाषक अपना दुखड़ा रोने लग जाता हैं। किताब नहीं बिकती। रायल्टी की बात मत करो। हटो तुम उठो पुस्तक क्रय समिति के सदस्यों को बैठने दो।आईये साहब आईये। बैठिये क्या लेंगे ठण्डा या गरम और प्रकाषक पुस्तक क्रय समिति के सदस्य, अध्यक्ष यापुस्तकालयाध्यक्ष को गरम मांस परोसने को तैयार हो जाता हैं।

    दुनिया बड़ी तेजी से बदली हैं। पहले लेखक द्वारा अपनी एक पुस्तक छपा लेना बड़ी उपलब्धि थी, अब हर प्रदेष में अकादमियां है जो कुछ भी छापने को तैयार है और लेखक लगातार छप रहा हैं, मगर रो रहा है। हिन्दी का प्रकाषक पुस्तके निर्यात कर रहा है मगर लेखक को जीने का हक नही देना चाहता । पुस्तक भी एक प्रोडक्ट और बाजार के नियमों से बिकती है, यह बात प्रकाषक समझते है। वह साहित्य की पुस्तको के फेर में ज्यादा नहीं पड़ता । वो अचार, मुरब्बे, चटनी, सब्जी कैसे बनाये और टेक्स्ट बुक जैसी पुस्तक बेचने में ज्यादा रूचि दिखाता है। पुस्तक प्रकाषन संसार एक सम्पूर्ण भ्रष्टाचार संस्थान है। पुस्तक सबमिषन से शुरू होने वाला यह भ्रष्टाचार चेक प्राप्त करने के बाद तक चलता रहता है। कमीषन और पुस्तक का मुद्रित मूल्य ये दो चीजे पूरे बाजार को तय करती हैं। एक पुस्तक बंगाल में कम कमीषन पर मिल सकती है तो वही पुस्तक जयपुर में अधिक मूल्य व अधिक कमीषन पर मिल जाती है। पुस्तक क्रय कमिति तय करती है पुस्तक की कीमत और लेखक का भाग्य। योगदान करता हैं प्रकाषन का मुनीम, मैनेजर, बेटा या दलाल । पुस्तक बिकती हैं। लेखक बिकता है। पुस्तकालयाध्यक्ष बिकता हैं। पुस्तक क्रय समिति के सदस्य बिकते है। सब का मूल्य बस विचार का मूल्य नहीं है। हिन्दी का लेखक कलम का मजदूर है मगर अपने आपको किताब से ऊपर मान कर चलता हैं। लेखक नया प्रकाषक ढूंढ़ता है, प्रकाषक नया लेखक ढूंढ़ता है और किताब बेचारी इधर से उधर गिरती, पड़ती उठती बैठती रहती है। पुस्तक को उधोग समझने वाले जानते है पुस्तक संसार को क्या चाहिये वे वही चीजे छापते हैं। अष्लील साहित्य के बाद आध्यात्मिक साहित्य सबसे ज्यादा बिकता हैं रोमांस के नाम पर पोर्नोग्राफी बिकती है। कामसूत्र भी बिकता है और रामचरितमानस भी।

    वास्तव में हर किताब एक मषाल हैं। एक क्रान्ति है, ऐसा किसी ने कहा था। किताब व्यक्ति के अन्दर की नमी को सोंखती है। थके हुए आदमी को पल दो पल का सुकून देती है, किताबे। हारे हुए आदमी को उत्साह, उमंग और उल्लास देती है किताबे। वे जीने का सलीका सिखाने का प्रयास करती है। सुचना, विचार दृष्टिकोण, दस्तावेज, प्यार, घृणा, यथार्थ, रोमांस, स्मृतियां, कल्पना, सब कुछ तो देती हैं किताब। मगर कोई किताब तक पहुचे तब न। किताब तो प्रकाषक के गोदाम से निकली, और सरकारी गोदाम में बंद हो गई। प्रकाषक ने अपने भवन में एक मंजिल और चढ़ा ली, बस किताब से प्रकाषक यही फायदा ले सकता था, सो ले लिया। पुस्तके हमारे जीवन का सच्चा दर्पण हैं। वे हमारे व्यक्तित्व, समाज, देष, प्रदेष को सजाती है, संवारती है, हमें संस्कार देती है मगर जीने का आधार देने वाली पुस्तक का महत्व दिन ब दिन कम क्यो होता जा रहा है ? पुस्तक क्रांति कर सकती है। दास केपिटल इसका उदाहरण है। आनन्दमठ जैसे उपन्यास से अंग्रेजों को पसीना आ गया था। प्रेमचन्द और हरीषंकर परसाई के लेखन में सच्चे भारत की तस्वीर देखी जा सकती हैं।
 व्यक्ति जो खोजता हैं वही किताब में पाता है हर पुस्तक किसी ना किसी लक्ष्य तक पहुंचाने का माद्दा रखती हैं। पूरी दुनिया में कम्प्यूटर, सूचना क्रांति के आने के बाद भी ाकिताबों का महत्व कम नहीं हुआ हैं, किताबे सभ्यता के मानवीकरण और सुचारू चलन में योगदान करती है। किताब मनुष्य को स्वतंत्र भी करती है और मनुष्य को अपना गुलाम भी बनाती हैं।

    हिन्दी में लिखना आसान है या नहीं ये बहस विषय है मगर पुस्तकों का प्रकाषन अवष्य आसान हुआ है। लेखक ही लेखक का उपभोक्ता है वह भी निषुल्क प्राप्त पुस्तक ही पढ़ता है। खरीद कर नई पुस्तक पढ़ना एक बौद्धिक व आर्थिक विलास है और हिन्दी में इस तरह का विलास करना संभव नही हैं। ऐसा अंग्रेजी या बंगला में संभव है। पुस्तक एक बच्चे की हंसी की तरह है, जो आपके दिलो दिमाग पर छा जाती है। पुस्तक आकाष फूल, समुद्र, पक्षी, चिड़िया, धूप, हवा, पानी सब का रंग बदलने की क्षमता रखती है। पुस्तक का चरित्र और चरित्र की पुस्तक पाना मुष्किल नही है। हर किताब कुछ कहती है, हर कविता कुछ कहती है। हर रचना कुछ न कुछ कहने का सार्थक प्रयास करती है। लेकिन छोटी सी जिन्दगी मे सब कुछ पढ़ा भी नहीं जा सकता। सबसे ज्यादा पसन्द की पुस्तक को बार बार पढ़ना ही काफी है। और यह यात्रा अन्दर से शुरू होकर अन्दर ही खतम हो जाती है। हर पुस्तक अन्तर्मन की यात्रा हैं। अन्तर्मन की यात्रा से पुस्तक खुलती है। लेखक खुलता हैं। लेखक पुस्तक के सहारे जीवित रहता है। पुस्तक अपने भीतर एक हलचल एक जिजिविषा पैदा करती हैं । शान्त तालाब के जल में कंकर फेंकने की तरह है एक पुस्तक । पुस्तक समाज को शासित करती है शोषण से बचाती है। उसे सही दिषा में बढ़ाती है। पुस्तक को जीना एक सम्पूर्ण जीवन जीने के समान है। बीमारी में तो पुस्तक ही सर्वश्रेष्ठ साथी है। अकेलेपन, ऊब, थकान से बचाती है पुस्तक। सूचना क्रान्ति के बावजूद किताब का वजूद था, है और रहेगा। 

    पुस्तक संस्कृति के लिए सरकारी प्रयासों पर निर्भर रहना ठीक नहीं। पुस्तक नीति, संस्कृति नीति बनाते बनाते कई सरकारे काल कवलित हो गई, पुस्तक तो अपने दम पर जिन्दा रहेगी। बिलगेट्स ने पेपरलेस दुनिया की कल्पना की थी, मगर इन्टरनेट के बावजूद पुस्तकों की प्रकाषन संख्या बढ़ रही हैं। पुस्तक प्रेमी बढ़ रहे हैं। पुस्तक विक्रेता, पुस्तक प्रकाषक बढ़ रहे है और यह एक शुभ संकेत है। क्रांति के रूप में छापे खाने का आविष्कार हुआ जो आज भी पुस्तक को, विचार को दूसरे तक पहुंचा रहा है। पुस्तक मन को मन से तन को तन से जोड़ती है। किताब जिन्दा है तो हम सब जिंदा है। किताब को जिन्दा रखने के प्रयास जारी रहने चाहिये। आईये इस बार के घरेलू बजट में पुस्तक के लिए भी कुछ राषि रखे।

    आईये धूमिल की कविता को कुछ परिवर्तन के साथ यों पढ़े-

    साहित्य से रोटी तो तुम भी नही पाओंगे,
    मगर साहित्य पढ़ोगे तो रोटी सलीके से खाओगे


 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
तीक्ष्ण व्यंग्यकार 

86, लक्ष्मी नगर,
ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर
फोन - 2670596ykkothari3@yahoo.com

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