सोलह कहानियों में सामाजिक विद्रुपताओं का लेखा जोखा है - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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सोलह कहानियों में सामाजिक विद्रुपताओं का लेखा जोखा है


पुस्तक समीक्षा
समाज के भीतर समाज के विरूद्ध ‘ सोलह कहानियां ’
            
हृदय में जब तरंगे हिलकोरों लेने लगती हैं, तब विचार बनते हैं और जब विचार संवेदना की गिरफ्त में आ जाते हैं तो कथा बनती है। इन्हीं समय, विचार संवेदना का संवेद स्वर लेकर सामने आया है हरीश पाठक का ताजा कहानी संग्रह ‘सोलह कहानियां’। हरीश पाठक चर्चित कथाकार है। इसके पूर्व ‘सरेआम’,‘गुम होता आदमी’, त्रिकोण के तीनों कोण पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। ग्वालियर के दैनिक स्वदेश से इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत की।‘मुक्ता’ तथा ‘धर्मयुग’ से संबद्ध रहे। कुवेर टाइम्स के कार्यकारी संपादक, दैनिक हिन्दुस्तान के समन्वय संपादक, एकता चक्र व पूर्ण विराम के संपादक रहे हैं।संप्रति राष्ट्रीय सहारा  पटना संस्करण के स्थानीय संपादक हैं। पत्रकारिता के साथ-साथ साहित्य जगत में भी इनकी खास पहचान है। अरसे से कथा साहित्य में उपस्थित   हरीश पाठक  की कहानियों का अपने समय संदर्भें की पड़ताल है। पुस्तक उन्होंने चित्रा मुद्गल एवं अवधनारायण मुदगल को समर्पित किया है। पुस्तक की भूमिका में ही ओमा शर्मा ने स्पष्ट कर दिया है कि संघर्ष, त्रास, प्रेम , आकांक्षा, उत्पीड़न, अपराध और प्रतिषोध उनकी कहानियों के संपूर्ण फलक पर अपना तांडव करते हैं तो कभी व्यक्ति परिवार के स्तर पर। उनकी कहानियां आम जिन्दगी पर ज्यादा केन्द्रित रहते हैं।

        प्रकाशित पुस्तक में सोलह कहानियों में सामाजिक विद्रुपताओं का लेखा जोखा तो है ही साथ ही पारिवारिक संबधों पर खींची गयी दीवार और उस पर प्रेम तथा स्नेह की दरारों की प्रतिचिंता भी है। सच मायने में हरिष पाठक का लेखकीय दायित्व पारिवारिक संबंघों की वुनावट से निकलकर समकालीन ययार्थ के बीच आवाजाही करता है। समकालीन यथार्थ की विद्रुपताएं आज की सबसे बड़ी लेखकीय चिंता है। इन विद्रुपताओं को नजरअंदाज कर जो भी लिखा जाएगा, वह पाठकीय अवहेलना से वंचित नहीं रहा पाएगा।  हरीश पाठक समकालीन यथार्थ की नब्ज पर अंगुली तो रखते ही हैं, साथ ही पाठकों को अपनी चिंता से अवगत कराते हुए एक नयी राह तैयार करने के लिये आंदोलित करते हैं।

संग्रह की पहली कहानी ‘भेज रहे हैं नेह निमंत्रण’ यह पूरी कहानी पारिवारिक रिश्तों का ताना-वाना बुनती नजर आती है। कहानी के दो महत्वपूर्ण पात्र हैं- प्रभुदयाल और बिरेन बहादुर, इन्हीं दो पात्रों के माध्यम से पूरी कहानी आगे बढ़ती है और अंत में संवेदनाओं के विस्फोट के साथ समाप्त होती है। लेखक ने कहानी की अंतिम  पंक्ति में इस ओर संकेत भी किया है- ‘ देर तक चिता जलती रही’’।  संग्रह की दूसरी अन्य कहानियां ‘जलतरंग’, ‘खेल’, ‘प्रेतछाया’, ‘शहर की मौत’,‘ दवा हुआश्विद्रोह’, ‘ खोई हुई औरत’ , ‘विरुद्ध’,‘ कितने इंतहान’, ‘ एक दिन का युद्ध’, ‘ कितने सच’, ‘दरअसल’, ‘ तिर्यक’, ‘टूटता हुआ पुल. ‘अभिषप्त’,‘ अंतिम किष्त’ हैं।

   ‘ अंतिम किश्त'  मे लेखक की भूमिका एक दृष्टा की तरह है, लेखक ने जो देखा है उसे अपनी संवेदनाओं के लहू से कागज पर उतार दिया है। ऐसे तो  संग्रह की पूरी कहानियों को पढ़ने के पश्चात यह अनुभव होता है कि   हरीश पाठक  का कथा लेखन स्वपन और कल्पनाओं के  दोराहे पर दम तोड़ने को विवष नहीं होता है, बल्कि यथार्थ की परतों को उघारते हुए कुछ सोंचने के लिये विषय भी करता है। यह उनकी कथा लेखन की सफलता है और उन्हें यथार्यवादी लेखक कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिये।संग्रह की सारी कहानियां पठनीय है। भाषा शिल्प, संवेदना एक साथ कदम से कदम मिलाकर चलती है। भाषा के मामले में परिवेश की आवष्यकताओं को देखते हुए देशज शब्दों और वोलियों को काफी वारीक अंदाज में उपयोग किया गया है, जिससे कहानियों में लालित्य तो आता ही है साथ ही पठनीय स्वाद में परिवर्तन भी होता है।

         कहानी ‘ भेज रहे हैं  नेह निमंत्रण’ को ही लिया जाय तो इसमें लेखक ने  मध्य प्रदेश  के एक छोटे से कस्वे में वोली जानेवाली भाषा को काफी सलीकेपूर्ण तरीके से प्रयोग किया गया है। लेखक के स्वयं यह स्वीकार किया है कि ‘ दिक्कत गांव’,‘ गांव की भाषा’, विवाहों में गाये जानेवाले बन्ना- बन्नी, वहां की रश्में उन्हें जानने समझने में मुझे अरसा लगा। जाहिर है कि ‘ भेज रहे नेह निमंत्रण का प्लॉट काफी पहले जन्म ले चुका था, परन्तु दिक्कत थी कि  प्लॉट की चौहद्दी के ईद गिर्द वोली जानेवाली भाषा । लेखक ने इसे नजरअंदाज नहीं किया और कहन की छटपटाहट ने प्लॉट के परिवेश के साथ जोड़ दिया। तत्पष्चात एक अच्छी और पठनीय कहानी का जन्म  मुकम्मल हो सका।  हरीश पाठक की लेखकीय विरासत जो कल्पना के आधार पर कही जा सकती है , प्रेमचंद की विरासत से काफी मिलती जुलती नजर आती है। शायद यही कारण है कि   हरीश पाठक एक अमर कहानीकार बनने की सारी शर्तों को अपने पास रखते हैं।


समीक्षित कृति
सोलह कहानियां
कहानी संग्रहद्ध
कहानीकारः- हरीश पाठक
प्रकाषक:- ग्रंथ अकादमी,1659 पुराना दरियागंज, नई दिल्ली
मूल्य: दो सौ रुपये
 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

कुमार कृष्णन
स्वतंत्र पत्रकार
 द्वारा श्री आनंद, सहायक निदेशक,
 सूचना एवं जनसंपर्क विभाग झारखंड
 सूचना भवन , मेयर्स रोड, रांची
kkrishnanang@gmail.com 
मो - 09304706646

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