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आज के कथा लेखन में स्त्री चेतना के उदात्त चित्रण की कसक देखी जा सकतीं है

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on बुधवार, अप्रैल 04, 2012 | बुधवार, अप्रैल 04, 2012


               नारी वन की भारतीय मालिन :  मुक्ता की कहानियाँ   

       मैं कामायनी की श्रद्धा नहीं इड़ा हूँ,भावना नहीं प्रज्ञा हूँ,
         मात्र स्पंदनमयी नहीं,तर्कमयी भी---
         मात्र समर्पिता नहीं अधिकारमयी भी।       (प्रसाद)
  

नारी का यह कथन उसकी नूतन मानसिकता का आलेख ,उसकी नयी चेतना का शिलालेख ,उसके सबल व्यक्तित्व का दस्तावेज, जागरुकता की प्रतिध्वनि, सजगता,समर्थता और शक्ति का प्रतिबिंब है।अपनी नयी प्रतिभा नारी ने खुद तराश की है,यह पाषाण प्रतिमा है, जिसमें तूफानों से टकराने की हिम्मत है,समस्याओं से जूझनेकी ताकत है,विपरीत स्थितियों से मुकाबला करने का हौसला भी है।
      
नारी लेखन आज के कथा-साहित्य में एक रूढ़ि बन गया है।आज के कथा लेखन में स्त्री चेतना के उदात्त चित्रण की कसक देखी जा सकतीं है,तथापि स्त्री पर लिखना और जीवन में स्त्री पर अत्याचार न करना,उसकी मुक्ति व समानता के लिए प्रतिबद्ध हो सकना बड़ा दुष्कर है।प्रगतिशीसता का छद्म तेवर ओढ़े ऐसे रचनाकारों के कथा-साहित्य में नारी के दुःख-दर्द और मुक्ति का परचम अवश्य लहराता मिलेगा,परंतु वास्तविक स्त्री जाति को लेकर कुत्सित भावनाओं में डूबे मिलेंगे।

तेजी से परिवर्तित होते आज के जीवन में नारी की स्थिति को नये संदर्भ में देखा जाना स्वाभाविक भी है और आवश्यक भी।आवश्यक इसीलिये कि संस्कारगत नारी का एक आदर्श स्वरूप हमारे मनमें सदियों से घर किये हुए है,किंतु क्या आज के कटु यथार्थ में परंपरा से चले आये आदर्श के सहारे किसीका मूल्यांकन संभव है ?आदर्श को जीवन से निकाल फेंकने की बात नहीं की जा सकती पर,आदर्श मात्र उतना ही स्वीकार किया जा सकता है जितना कि नैतिकमूल्यों को स्मरण करने या नैतिकता का पक्ष लेने में सहायक बनें। 

बीसवीं शताब्दी के अंतिम दसक में सक्षम रुप से उभरकर कथा साहित्य में छा जानेवाली मुक्ता की कहानियों पर मैं बात करना चाहूँगी।आधुनिक युग की एक सशक्त महिला कथाकारा है।बहुआयामी व्यक्तित्व की धनी है।समकालीन कहानी-कविता सर्जक के रुप में मानवजीवन की,विशेषतः नारी जीवन का चित्रण करने में वे सफल रहीं है।मुक्ताजी को नारी  की द्रष्टि से नारी का चित्रण करनेवाली लेखिका के रुप में प्रसिद्धि मिली है।आधुनिक समाज के पल-पल होते बदलाव में स्त्री मुक्ति बाहर नहीं परंतु अपने अंदर तलाश ने की छटपटाहट मुक्ता की कहानियों की विशेषता है।लेखिका ने हिंदी साहित्य को चार कहानी संकलन की अमूल्य भेंट दी।

1) आधा कोस1994,              2)  पलाश वन के घुंघरु1996,
3) इस घर उस घर1999         4)  सीढ़ियों काबाजा़र---2006.

दो कविता संग्रह भी उनके प्रकाशित हुए हैं।प्रायः सभी पत्र-फत्रिकाओं में उनकी रचनाएँ प्रकाशित होती रहीं है,आज भी वह सशक्त लेखनी चला रहीं है। वे फिल्म निर्मात्री भी हैं।आ.रामचंद्र शुक्ल और दादरानगर हवेली पर वृत्तचित्र बनाये हैं,जो वहु चर्चित रहें।

   मुक्ता की कहानियों में विषय-वस्तुगत वैविध्य है।स्त्री-पुरुष संबंध,कलाकारों के जीवन,राजनैतिक दांव-
पेच,सांप्रदायिक दंगे आदि  का चित्रण है। उन्होंने घटनाओं,संवादों विवरणों,चरित्रों को कहानियों में इस प्रकार गूंथा है कि न पाठक ऊबते हैं न ही पुनरावृत्ति का अहेसास करते हैं।इनकी कहानियाँ नारी की पीडा,उत्पीडन,अंतर्द्वंद्व को मुखरित करती है।कहानियों में स्त्री का संताप और उसकी नियति को रेखांकित किया है पर वे नारी की स्वतंत्र पहचान की आग्रही है।उनके चरित्र हताशा ,घुटन ,पीडा़ की अनवरत स्थितियों के बीच भी अपना ईगो मरने नहीं देती। कहा जा सकता है कि मुक्ता अभिजात वर्ग की चेतना से मंडित नारी की मनः स्थितियों को समजने में सिद्धहस्त हैं।

    जिस प्रकार  फुग्गे में हवा भरने से वह फूट जाता है उसी प्रकार अत्याचारों, शोषण आदि से त्रस्त नारी की सहनशक्ति का बाँध टूट जाता है,वह बिफर  उठती है। नारी में जागृत नई चेतना का कारण है उस पर ढा़ये जानेवाले सीतम,असह्य अमानुषी व्यवहार,अन्याय।

  पलाशवन के घुंघरु की कहानी कौन ठगवा नगरिया लूटन हो की नायिका रामदेई,जिसका पति उसे त्यागकर सन्यस्त धारण करता है,तब माई विधवा-सा जीवन व्यतीत करती है।एक समय था जब वह राजघराने में संगीत की शान मानी जाती थी,लोगों का दिलखुश करनेवाला संगीत परोसती थी।आज गंगाघाट पर निर्गुण पद गाकर भी भिखारियों के बीच हाँसी की पात्र बनती है।पर करे क्या पेट तो समय पर मागता ही है।भिखमंगों के अपमान के घूंट पीकर अपना पद गाती रहती है।
  परिस्थिति बदलती है,अंतिम समय है,पति असाध्य रोग से पीडि़त है,रामदेई की चाह करता है,भोली,
प्यारी माई खुशी-खुशी पति की सेवा करते हुए, पति के साथ ही अपना जीवन भी त्याग देती है।
इससे पता चलता है कि स्त्री को त्याग दिया जाय,धकेल दिया जाय पर वह अपने स्नेह सूत्र को तोड़ नहीं पाती।अंतिम समय में पति के चाहने पर सारे गिले शिकवे भूलकर सेवार्पित होती है।पुरुष जब मन चाहे छोड़ दे।यह शोषण नहीं तो ओर क्या है।

सीढ़ियों का बाझार की कहानी आईने के पार भी कुछ इस तरह की ही बात करती है।नायिका हेमा एक अध्यापिका है।पिता द्वारा मा पर हुए अत्याचार के कारण मानस पर गहरी उदासी-मायुसी छा जाती है।पर वह संघर्ष कर अध्यापिका बनती है।

  पिता द्वारा किये अन्याय के कारण उनकी जीजी मृत्यु को भेंटती है,क्योंकि बाप खुद मित्रों द्वारा रुपये
और शराब तथा परस्त्री गमन के लिये बेटी की आहूती चढ़ाता है। अंत में अपनी मां को अस्पताल में भर्ती करवाती है।

एकांत में वह फिर अतीत में सरक जाती है। जीजी की मृत्यु के बाद सब मां को घेरे हुए थे, वह दौड़
कर कस्तुरी के पास पहुँचती है,हेमा ने देखा कस्तुरी अपने आप को आईने में देख रहीं थीं,हेमा को देखते ही बाँध फूट पड़ा।उसने हेमा से कहा बिट्टो एक बार मां कहो।तुम डाईन हो मैं कभी तुम्हें मां नहीं पुकारुंगी।

 उसे लगता है----आईने को निहारते हुए अकसर उसके अंदर भी कुछ घटता है।सभी फर्क मीट जाते हैं।अम्मा..जीजी...,कस्तुरी... और उसका अपना चेहरा भी...बस एक औरत होती है...अपनी पूरी अस्मिता के साथ...भरी पूरी औरत।
   नारी के द्वारा ही नारी पनपती है, वही उसे जीवन दान देती है,यह सिद्ध होता है।

 आधाकोस संग्रह की सुनो गौतम में विसंगत मानसिकता के कारण यौन अतृप्ति की बात अंकित  है।
अध्यापिका ईला  और गौतम अपने दांपत्य जीवन से असंतुष्ट है। वर्षों बाद एक संगोष्ठी में पोंडीचेरी में मिलते हैं,निमित है ईला की पायल का समुद्र में खो जाना। गौतम पायल ढूंढ़कर पहनाता है ,और अपने आगोश में ले लेता है ईला को। दोनों की आत्मिक परितृप्ति होती है,क्योंकि वहां प्रेम भी है।गोरैया का बार-बार पंखे से आकर टकराने की कोशिष देखकर गौतम कहता है----हो सकता है उसे मालुम हो ,पंखे के पास आकर एक थ्रिल,एक सूकुन उसे मिल रहा हो।तभी तो इस पीडा़ वह बार-बार भोगना चाहती है।मैंने भी बार-बार भोगा है ईला, तुम्हारे न होने की व्यथा को।

  आज की नारी दोहरा जीवन जी रही है,बाहर संघर्ष करके भी साथी का साथ नहीं छोड़ना चाहती।मन के अंतर्द्वन्द्व में हमेशा जुलती रहती है।

सीढ़ियो का बाजार की कहानी जमन दुःख की नायिका अपने आपसे प्रश्न करती है—“कौन है वह,मुनिया-मुन्नी-मिथिलेश-मिडवाइफ-मेमसाब या मेम  साहब?”


 आजीवन आरोग्य केंद्र में डाक्टर,नर्स,दायन का काम करनेवाली मिथिलेश कैलाश यादव से आँखे मिला बैठती है। उसी गाँव का जमींदार।आनेवाले मरीजों से तो सीधे मुँह बात कभी न करती।अपढ़ लोगों से पैसा एँठना उसका धंधा था।उसकी सहकर्मी कजली परिणीत तथापि निसंतान। देवी मां की मन्न्त रखी पर कोइ परिणाम नहीं।बांज स्त्री का समाज में कोई स्थान नहीं माना जाता।

कैलाश की भाभी के एबोर्शन के लिये वह मना करती है कहती है---हमारा काम जीवन देना है लेना नहीं।गाँव के प्रधान की बीबी से  यह व्यवहार। कैलाश आगबबूला हो गया।कहता है—‘अपनी औकात में रहो।मेरी बीवी बनने के ख्वाब भूल जाओ। वह चिल्ला उठी---मैंने तो प्रेम किया था....तूने मेरा सौदा किया है।कीडे पडेंगे तुझे....।

 मिथिलेश मां बननेवाली है।रात भर उल्टी करती रही।कजली चिंतीत थी।उसने गहरे मनो द्वंद्व के बाद कजली से कहा,तूं कहती थी न कि—“मैं तुझे केस क्यों नहीं करने देती, ले दस्ताने पहन और औजार ले ले,मेरी बात ध्यान से सुन....मेरा बच्चा गिराना है।

   कितना भयावह,फिरभी जीवन का निर्णय तो करना ही पड़ता है।यही है मानसिक द्वंद्व और स्त्री होने की सजा। स्त्री की कठोरता , कडापन की अब तो उसका बीज चाहिये ही नहीं।मुक्ता की नारी खुद्दार,
स्वाभिमानी, मेहनतकश है।

  मुक्ता ने आधुनिक नारी के लिये स्वतंत्रता को महत्वपूर्ण माना है। उदा—‘जीजीविषा की नायिका सौम्या द्वारा दृढ़ संकल्पबद्ध होना।पद्मनाभ के विवाह प्रस्ताव के उत्तर में वह कहती है----मां-बाप के चाहने पर भी मैं सैटिल मेरेज के खिलाफ हूँ।मानसिक समन्वय और परिचय के बीना विवाह करना  कहाँ तक उचित है? प्रेम पर ही तो विवाह अवलंबित है।स्वतंत्र चेता,भविष्य के प्रति सजग नारी का चित्रण है।
   पुरुष प्रताड़ना स्त्री को आहत और लाचार बना देती है,उसमें पति खुद जब शामिल हो तो कहना ही क्या।इस घर उस घर की कहानी कुसुम कथा की नायिका कुसुमा ऐसी ही नारी है,जो पुरुष प्रताड़ना की शिकार हुई है।उसका पति जगदीश बीस वर्ष पूर्व उसे छोड़कर चला जाता है ,तब से कुसुमा विधवा सा जीवन अपने ससुराल में बीताती है।जगदीश ने सुनिता से दूसरी शादी की है।वह अपने भतीजे के जनेऊ पर घर आता है और कुसुमा को साथ ले जाना चाहता है,क्योंकि सुनिता अब नहीं रहीं और उसकी बेटी तथा घर को सँभालना है। पर अपने आत्म सम्मान  के रहते वह मना कर देती है।अपना स्वाभिमान बचाये रखती है।        

मुक्ता की कहानी में नारी के सकारात्मक पक्ष भी उजागर हुए हैं। सीढञियों का बाजार की कहानी संगमरमर की सड़क पर में नायिका का मनोद्वंद्व इसका साक्षी है।नायिका जैनी एक इसाई लड़की अधययन हेतु होस्टल में रहती है, उसकी रुम पार्टनर श्रुति है। जैनी अपने अभावों की पूर्ति के लिये सारे हीन मार्गों से गुजर जाती है,श्रुति  के प्रश्नों के उत्तर देना मुनासिब नहीं मानती।स्वच्छंदता की साम तो वह कब से अतिक्रमित कर चुकी है।

नवीन उसका संगीत शाला का साथी और जेनी के लिये कोमल भाव रखनेवाला लड़का था।साथ बढ़ता रहा। वह जेनी में आदर्श ,पवित्र स्त्री को ढूँढ़ता था।जेनी को पता था परीक्षा के बाद उसका विवाह तय है।नवीन उसे संगीतशाला ले जाने के लिये आता है,वह ऊचककर साईकिल पर बैठ जाती है।कहती है---नंगे तन हम चलते हैं संगमरमर की सड़क पर...लम्हों के बीच।हम भोगते हैं पूरा विश्व.......।

श्रुति नवीन के प्रेम को स्वीकार करने के लिये समजाती है पर जेनी उत्तर देती है कि नवीन मुझ में
मरियम,दुर्गा,राधा को देखता है।  श्रुति कहती है तुम उसके प्रेम का मुक्त मन से स्वीकार करो।
जेनी का उत्तर है---- यह कैसे संभव है?” श्रुति----- शरीर की पवित्रता को इतना तुल देना........।. तुम तो खुली खिड़की की बातें करतीं थीं,अब अपनी कारा में कैसे कैद हो गयी?”

   नवीन से कटने लगती है। समय रहते वह नशा करता है उसकी मृत्यु हो जाती है।लंबे अरसे के बाद गोवा में श्रुति की भेंट जेनी से होती है। वह मिशनरी के काम से जुड़ गयी होती है।जेनी श्रुति से नवीन को संदेश कहलवाती है----प्रतिपल मैंने नवीन में लय होना चाहा,लेकिन यह शरीर बाधा बना रहा....अब तो यही संतोष हा वह सुखी रहे।परंतु मृतात्माओं को संदेश की प्रतिक्षा नहीं रहती।
 इस प्रकार हम देख पाते हैं कि चुलबुली,बेफिक्र,बिन्दास जेनी को भी नवीन के साथ जुड़ने पर शरीर की पवित्रता आडे आती है। नारी के संस्कार का ,सोच का सकारेत्मक पक्ष यहाँ उजीगर हुआ है।

  सचेत होने के बावजूद स्त्री मन की संस्कार बद्धता को महत्व देनेकी प्रवृत्ति मुक्ता की लेखकीय चिंता और प्रति बद्धता को सामने लाती है।आधुनिकता किस कदर संस्कारहीन बनाती है इसका उत्तम उदा---
इस घर उस घर की कहानी चल खुसरो घर आपने में स्पष्ट झलकती है। दाल मंडी में तवायफों के बीच जीनव यापन करनेवाली मैनाबाई अपने ही बेटे-बहु से अपमानित होती है, जो पीडा़ सामाजिक लांछन से अधिक व्यथित करती है। पर अंत तक समाज उसे स्वीकृति नहीं देता।मुक्ता के पात्र पीड़ा और छटपटाहट झेलती स्त्रियाँ तो है पर वे विवश लाचार नहीं है।अतः इस घर उस घर की गोदावरी अपने पिता के घर तथा मैना बाई दालमंडी में वापस लौट जाती है।

आज भी समाज के बीच रहकर एकाकी जीवन बिताने का पीडा़ कुछ शिक्षित महिलाओं ने उठाया है,मुक्ता कहती है इरादे अगर ठोसहै मजबूत है तो बाधाएँ राह में रोडे़ नहीं बन सकती। जीजीविषा की सौम्या अध्यापिका बन उच्च स्थान पर है। अपनी ही सोच से जीवन जी रही है।यह नारी का विकसीत रुप है।

निष्कर्ष रुप में हम कह सकते हैं कि मुक्ता की कहानियाँ खरे रुप में समकालीनता की कहानियां हैं।जिसमें भावनात्मक कश्मकश,गहरे अंतर्द्वंद्व की अभिव्यक्ति है।इन कहानियों में यथार्थ के पार देखने की शक्ति है।पुरुष और स्त्री यहाँ नारों में नहीं,अपितु जीवन के गतिशील प्रवाह के साझेदार है।इनके चरित्र पीडा़,छटपटाहट,झेलती संघर्षरत नारियाँ है, पर वे विवश नहीं है,सूर्य को संबोधित करनेवाली स्त्रियाँ है। ये कहानियाँ अपनी सामाजिक संरचना और समय के वर्तमान दूषित परिवेश में हाशिये की जिंदगी जी रहे, सामाजिक न्याय से वंचित लोगों की पीड़ा और संघर्ष को भी रेखांकित करती है। तथा उसकी अधिकार चेतना के प्रति मुखर है।  

 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-                                      डॉ.नयना डेलीवाला
(कथा साहित्य एवं अनुवाद में रूचि,राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सगोष्टियों में आलेख पढ़े हैं.कभी कभार कविता कर लेती हैं.देशभर की पत्र-पत्रिकाओं में छपती रहे हैं.)
एफ.डी.आर्ट्स कॉलेज,
जमालपुर,अहमदाबाद1
सचल ध्वनि-09327064948
ईमेल-

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