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नयी व्यवस्था की स्थापना के लिए अहिंसा एकमात्र अचूक रास्ता है

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शनिवार, अप्रैल 14, 2012 | शनिवार, अप्रैल 14, 2012


भगवान महावीर जब धरती पर अवतारित हुए थे तो भारतीय समाज में अनेक तरह की कुरीतियों के कारण लोगों का जीवन दुष्कर हो गया था। छुआछुत, ऊँच-नीच धनी और निर्धन के भेदभाव के कारण समाज में असमानता व्याप्त थी। महावीर स्वामी समाज के निम्न निर्धन लोगों की पीड़ा से दुःखी हुए।उन्होंने स्वयं राज पाट त्यागा और सन्यास लेकर तप करने निकल पड़े। कई वर्षों के कठिन तपस्या मय जीवन बिताने के बाद जो ज्ञान प्राप्त किया। वह व्यावहारिक व समाज को बदलने वाला था। महावीर ने समाज के दोषों का विवेचन किया और व्यावहारिक तथा सरल निष्कर्ष निकाले। महावीर स्वामी के ये शिक्षा संदेश आज की पीड़ित मानवता के लिए मार्ग दर्शन बन गये। अति तुच्छ भोग-विलास व सुख सुविधाओं को त्यागकर उन्होंने सरल, सादा व कर्तव्यनिष्ठ जीवन जीने की प्रेरणा दी।

आज से ढ़ाई हजार से भी अधिक वर्ष पूर्व जैन परम्परा के चौबीसवें और अन्तिम तीर्थंकर भगवान महावीर ने एक नये विश्व एवं एक नये समाज के निर्माण हेतु तीन महत्वपूर्ण सूत्रों का प्रतिपादन किया था- अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकान्तवाद।अहिंसा- उन्होंने अहिंसा पर विशेष बल दिया था और उसे ‘परम धर्म’ की संज्ञा दी थी। ‘अहिंसा परमो धर्म’ इसमें कोई अत्युक्ति भी नहीं थी, क्योंकि समाज के अस्तित्व का आधार ही अहिंसा है और उसके अभाव में समाज खण्ड-खण्ड होकर नष्ट हो जायेगा।

किन्तु महावीर की अहिंसा केवल जीव हत्या की मनाही तक सीमित नहीं थी। मन, वचन और कर्म के किसी भी व्यवहार से किसी भी प्राणी को किंचित भी पीड़ा पहुँचाने की मना ही उसकी परिधि में आती थी। इस व्यापक अर्थ में अहिंसा अव्यवहार्य होकर कोरी कल्पना प्रतीत होने लगती है। परन्तु बात ऐसी नहीं है। जिस प्रकार साम्यवाद या संपूर्ण बराबरी के आदर्श ने व्यक्ति समाज ओर विश्व को यथासंभव बराबरी के पथ पर सक्रियता के साथ अग्रसर होने को प्रेरित किया है, उसी प्रकार सम्पूर्ण अहिंसा का आदर्श भी व्यक्ति, समाज और विश्व को यथासंभव अहिंसा के मार्ग पर निरंतर अग्रसर होने की प्रेरणा प्रदान करता रहा है।

यह सही है कि महावीर के उपदेश युद्धों और राजकीय हिंसा को रोक नहीं सके, उनका तांता चलता रहा। लाखों करोड़ों लोग इस सुगठित और आयोजित हिंसा के शिकार होते रहे। किन्तु इससे अहिंसा का महत्व घटता या असिद्ध नहीं होता है। न ही यह कहा जा सकता है कि उसके प्रति मनुष्य का रूझान लुप्त हो रहा है। हकीकत इसके बिल्कुल विपरीत है। ज्यों ज्यों संसार में हिंसा और विनाश के साधन विकसित हुए हैं या हिंसा की आशंकाओं युद्धों और हिंसा को नियंत्रित करने के प्रयासों में वृद्धि हुई है।

अन्तर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय, सामाजिक, राजनीतिक एवं वैयक्तिक स्तर पर अनेक असमानताएं मौजूद हैं, जैसे साम्राज्यवादी गुलामी, अमीर-गरीब का भेंद, जातिगत या नस्लगत उंच-नीच, तानाशाही, नर-नारी की असमानता, मानवाधिकारों का हनन आदि। इन गैर बराबरियों के विरूद्ध अनादि काल से संघर्ष चलता आ रहा है। कभी हिंसा के रास्ते से और कभी अहिंसा के रास्ते से। हिंसा का रास्ता कभी कभी त्वरित सफलता देने वाला पाया गया है। परन्तु वह स्थायी और समाधानकारी परिवर्तन का मार्ग कभी नहीं रहा। स्थानीय और सुखद परिवर्तन के लिए तो हिंसा वालों को भी अंततः अहिंसा का मार्ग ही अपनना पड़ता है। 

प्रहलाद, सुक्रान्त, बू्रनो, मंसूर और मीरा कुछ ज्वलंत नाम हैं, जिन्होंने अपने मत, दर्शन और सत्य की रक्षा हेतु दमन और हिंसा के आगे घुटने न टेक कर अहिंसा की शक्ति को सिद्ध कर दिया। हमारे अपने युग में महात्मा गांधी मार्टिन लूथर किंग और डॉ. राममनोहर लोहिया उन विभूतियों में से है। जिन्होंने स्वाधीनता, रंग-भेद के उन्मूलन और व्यवस्था परिवर्तन के संघर्षों में अहिंसा के मार्ग की क्षमता, शक्ति और सार्थकता को सिद्ध कर दिखाया।

अब दुनिया ने एक स्वर से स्वीकार कर लिया है कि विश्व में स्थायी शांति, मैत्री और बंधुत्व पर आधारित नयी व्यवस्था की स्थापना के लिए अहिंसा एकमात्र अचूक रास्ता है और उसी के जरिये विश्व में व्याप्त विभिन्न अनीतियां और विषमताएं समाप्त की जा सकेगी और एक नये तथा न्यायपूर्ण समाज का निर्णय हो सकेगा।

महावीर ने ‘जीव’ की अवधारणा को जितना व्यापक विस्तार दिया, उतना किसी भी अन्य धर्म में दिखाई नहीं देता। इस अवधारणा में पेड़-पोधों को भी समाहित कर लिया गया। महावीर का मानव जाति को सबसे बड़ा योगदान उनका वह दर्शन है, जिसमें हर ‘जीव’ की सुरक्षा की व्यवस्था है यही उनका अहिंसा का दर्शन हैं और पर्यावरण का सुदृढ़ सुरक्षा कवच भी। मनुष्य के हित में प्रकृति को बचाने की बात सभी करते है पर महावीर ने प्रत्येक जीव को बचाने की बात सोची। वस्तुतः हर जीव को बचाने का रूप देकर महावीर ने धरती को व उसके पर्यावरण को बचाने का दर्शन दिया है। सच तो यह है कि जब तक समाज में हर जीव को बचाने की जागृति पैदा नहीं होगी जंगलों को बचा पाना दुष्कर होगा। 

अपरिग्रह: आज हमारे देश में ही नहीं वरन् समूचे विश्व में आर्थिक शोषण एवं विषमता जन असंतोष का बहुत बड़ा कारण है। यह असंतोष जब तीव्र हो जाता है तो हिंसक उथल पुथल को जन्म देता है। यह परिस्थिति पैदा ही नहीं हो, इसके लिए महावीर ने अपरिग्रह का सिद्धान्त प्रतिपादित किया था। अपरिग्रह का अर्थ यह है कि व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं को  यथासंभव सीमित करने का प्रयास करें, धन संपति और वस्तुओं का निजी हित के लिए संग्रह न करें तथा संपत्ति के अर्जन में न किसी का शोषण करें और न कोई गलत काम करें। इस दृष्टि ने आर्थिक अपराधों को समझने एवं उन पर नियन्त्रण करने में बहुत योगदान दिया है कि जिस सीमा तक परिग्रह अथवा संग्रह का भाव कम होगा उसी अनुपात में कमी आयेगी, प्राकृतिक सनसाधनों के दोहन पर रोक लगेगी धन के केन्द्रीय करण का भाव कम होगा। महात्मा गांधी के अनुसार अपरिग्रह को अस्तेय से संबंधित समझना चाहिए। वास्तव में चुराया हुआ न होने पर भी अनावश्यक संग्रह चोरी का सा माल हो जाता है। 

परिग्रह का अर्थ है संचय या इकटटा करना। सत्यशोधक, अहिंसक परिग्रह नहीं कर सकता। परमात्मा परिग्रह नहीं करता। वह अपनी आवश्यक वस्तु रोज की रोज पैदा करता है। अतः यदि हमारा उस पर विश्वास है, तो हमें समझना चाहिए कि वह हमें आवश्यक चीजें रोज की रोज देता है, देगा। रोज के काम भर का रोज पैदा करने के ईश्वरीय नियमों को हम नहीं जानते अथवा जानते हुए भी पालते नहीं है। अतः जगत में विषमता और उससे होने वाले दुःख भोगते हैं। यदि सब लोग अपनी आवश्यकता भर को ही संग्रह करें तो किसी को तंगी न हो और सबको संतोष रहे।

यदि महावीर की इस शिक्षा का शतांश में भी पालन हो तो देश मिलावट, चोरबाजारी, मुनाफाखोरी, तस्करी, महंगाई, शोषण और आर्थिक गैर बराबरी के मारक नागपाश से मुक्त हो कर राहत की सांस ले सकेगा और इनके कारण जो लूट खसोट, झगडे हत्या और हिंसक संघर्षों का झमेला निरन्तर चलता रहता है, वह भी समाप्त हो जायेगा।अनेकातवाद: धर्म, दर्शन, राजनीति, शासन और संस्कृति के नाम पर मत दुराग्रह का दोष विश्वभर में पुरातन काल से चला आ रहा है। महावीर ने इस दोष को गहराई से देखा समझा तथा व्यक्ति समाज को इससे होने वाली भारी क्षति का आंकलन किया। मत दुराग्रह के कारण समाज में निरन्तर हिंसक कलह चलती रहती है। जिसमें मानवीय क्षमता व मानव प्राणों की बलि चढ़ जाती है। 

मत दुराग्रह का सबसे बड़ा दोष यह है कि उससे विचार क्रान्ति का प्रवाह अवरूद्ध हो जाता है और समाज समय के अनुसार अपने को बदल पाने में असमर्थ होकर रूढ़िवाद के गर्त में फंसकर सड़ने लगता है। महावीर का कहना था कि किसी भी वस्तु या स्थिति को देखने के एक से अधिक दृष्टिकोण हो सकते हैं और यह कहना दार्शनिक दृष्टि से कभी संभव ही नहीं है कि यह चीज ऐसी ही है। कौन सा दृष्टिकोण सत्य के सर्वाधिक निकट है, यह तो समय की कसौटी पर ही सिद्ध हो सकता है।

इसी सोच के कारण महावीर के दर्शन को अनेकांतवाद या स्यादवाद की संज्ञा मिली। पिछले दिनों दुनिया भर में जो वैचारिक खुलापन आया है और उससे विश्व शांति की संभावना में जो स्वागत योग्य वृद्धि हुई है, वह अनेकातंवाद की महत्ता को रेखांकित करती है। महावीर का दिव्यदर्शित्व इसमंे है कि उनके ये सिद्धान्त उनके काल की तुलना में आज विश्व और मानव समाज की परिस्थितियों में अधिक ही प्रासंगिक हो उठे हैं। यदि हम न्याय शांति, मैत्री और बंधुत्व पर आधारित नया मानवतावादी समाज और नयी विश्व व्यवस्था स्थापित करना चाहते हैं तो हमें तीर्थंकर महावीर द्वारा प्रतिपादित अहिसंा, अपरिग्रह और अनेकांत के सिद्धान्तों को उनका आधार बनाना ही होगा।


 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

हिम्मत सेठ 

वरिष्ठ साथी पत्रकार
उदयपुर से प्रकाशित 'समता सन्देश' 
पत्र के सम्पादक और 
समतावादी लेखक 

फोन: 0294-2413423,  मो. 94606.93560

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