अम्बेडकर के चिंतन की आज के समाज को कितनी ज़रूरत? - अपनी माटी (PEER REVIEWED JOURNAL )

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शनिवार, अप्रैल 14, 2012

अम्बेडकर के चिंतन की आज के समाज को कितनी ज़रूरत?

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पाठक साथियों नमस्कार

डॉ.कनक जैन

प्रतापगढ़ की आदिवासी तहसील अरनोद के दलोट गाँव  में पले-बढ़े जहां छट्टी कक्षा से ही साहित्यिक पृष्ठभूमि की बाल पत्रिकाओं के चक्कर में गए.बाद के सालों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् जैसे छात्र आन्दोलन में भी अनेक दायित्व निभाएं.कोलेज के ठीक बाद पत्रकारिता में भी हाथ साफ़ किया.

चित्तौडगढ की साहित्यिक संस्था संभावना के सह संयोजक और बनास जन जैसी लघु पत्रिका के प्रबधसम्पादक है.यादवेन्द्र शर्मा 'चन्द्र' के साहित्य और कृतित्व पर शोध किया है.वर्तमान में स्कूल शिक्षा में हिन्दी के प्राध्यापक हैं.

नगर में संचालित ठीक-ठाक विचारों की सामाजिक/सांस्कृतिक संस्थाओं के आयोजनों में आपका आना जाना है.मूल रूप से विज्ञान के छात्र है मगर हिन्दी के नाम से ख़ास पहचान है.मोबाईल--9413641775

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