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फेसबुकी विमर्श:वैचारिकता भरे या कि फिर गरिष्ठ सामग्री प्रधान ब्लॉग चलाने के मायने

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on सोमवार, अप्रैल 09, 2012 | सोमवार, अप्रैल 09, 2012

(ये विमर्श रामजी तिवारी के एक आलेख के बहाने चल पड़ा था.जिसे आप यहाँ ब्लॉग्गिंग में देशी घी परोसने वाली युवा पौध शीर्षक से पढ़ सकते हैं.यहाँ इसके बहाने आगे तक निकली और भी नई बातें हमने आपके साथ साझा करना ज़रूरी समझा.लिहाजा चस्पा कर रहे हैं.बिना अनुमति या जानकारी के गरिष्ठ सामग्री प्रधान ब्लोगों से सामग्रियां प्रिंट माध्यम में आने लगी है.गज़ब का बदलाव है.बहुत समय नहीं बीता जब ब्लॉग्गिंग को एक शगल मात्र समझा जाता था.-सम्पादक)

डिजिटल माध्यम में साहित्य का प्रसार है पर इस प्रसार को समझने की गम्भीर कोशिशें अभी नहीं हुई हैं. रामजी तिवारी के इस आलेख को मैं इस दिशा में एक प्रयास के रूप में देखता हूँ. जब भी कोई नया माध्यम आता है कलाओं को नया जीवन मिलता है. उसके रूप, रंग, गंध, और सरोकारों में भी परिवर्तन होता है. जब साहित्य मौखिक से लिखित हुआ और मुद्रित हो कर सबके लिए सुलभ हुआ तब इसके क्या परिणाम थे इससे हम सब परिचित हैं. इसने एक नई सभ्यता ही रच दी. उपन्यास जैसी विधा इस मुद्रण का ही परिणाम है. आज फिर एक नया माध्यम हमारे सामने है. यह खुला है इसीलिए चुनौतीपूर्ण है और जिम्मेदारी की मांग भी करता है. इसने हिंदी कविता को नया जीवन दिया है जिस विधा के बारे में प्रिंट मिडिया के एक महान संपादक यह घोषणा करते नही थकते थे कि यह अब अप्रासंगिक है और लुप्तप्राय है.

इसी समय में नेट पर कविता के इतने पाठक और सह्रदय मिले की सहसा विश्वास नहीं हो रहा है. आज अपने अनुभव से मैं कह सकता हूँ कि सबसे अधिक कविताएँ पढ़ी जा रही हैं. इसके साथ ही कथा और विचार के गम्भीर पाठक आज इस माध्यम में उपलब्ध हैं. इस माध्यम ने कई ऐसे लेखकों को सामने किया है जो आज महत्वपूर्ण रचनाकार के रूप में जाने जाते हैं. यह प्रिंट से इस अर्थ में अलग है कि इसमें पाठक अदृश्य नहीं है वह तत्काल टिप्पणी करता है और आपके ठीक सामने है. एक तरह से हिंदी लेखकों को पाठक वर्ग मिल रहा है. और अपनी रचनाओं पर आलोचनात्मक टिप्पणियाँ भी. 

इस माध्यम में निकले वाली ई-पत्रिकाओं, ब्लाग के रूप में साहित्य के विविध मंचों ने अपनी विश्वसनीयता परिश्रम और धैर्य से हासिल की है. इसने साहित्य को सुलभ बनाया है और लेखकों को मंच भी दिया है. चूँकि यह बनता हुआ माध्यम है अत: इसकी गम्भीरता और विश्वसनीयता की रक्षा की ज़िम्मेदारी भी हमारी ही है. व्यक्तिगत आरोप प्रत्यारोप की प्रवृति और साहित्य की राजनीति से बचते हुए इसे समृद्ध करने की जरूरत है.
राम जी तिवारी ने समालोचन को नोटिस लिया. खुशी हुई. दरअसल यह समालोचन के लेखकों और पाठकों के मेहनत का नतीजा है. और जब परिश्रम, लगन, समझ और सरोकारों की कोई नोटिस लेता है तो खुशी लाज़मी है.
ऐसा बहुत दिनों से हो रहा है समालोचन की बहुत सी सामग्री प्रिंट माध्यम ने बिना पूछे छाप दी है.. आपको एक इधर की बात बताता हूँ .. विष्णु खरे द्वारा संपादित शमशेर विशेषांक में अशोक वाजपेई का लेख छपा है यह लेख खास तौर से समालोचन के लिए तैयार कराया गया था.. और उसमें साभार में समालोचन का कही ज़िक्र तक नहीं है .. खैर मैं इसे इस माध्यम के बढते प्रभाव के रूप में देखता हूँ.

जब मैंने कथादेश पत्रिका का अप्रैल अंक देखा , तो मन भीतर से प्रफुल्लित हो उठा ...उन्होंने ब्लॉगों की इस दुनिया से अपने लिए रचनाये लेनी शुरू की है .....अपर्णा जी की कहानी 'ब्लू प्रिंट' , जो कि 'जानकी पुल’ ब्लाग पर छप चुकी है , को इस ब्लाग से साभार लिया गया है .....और भी ऐसी रचनाये ब्लॉगों से पत्र-पत्रिकाओं तक जाने लगी हैं ..|..यह एक बड़ा परिवर्तन है और साथ में इस दुनिया के लिए एक बड़ी जिम्मेदारी भी..यह हम सबके लिए गर्व का विषय है अरुण भाई ....और साथ ही साथ चुनौती भी , क्योकि स्थापित होने के बाद वहाँ बने रहना और अधिक जिम्मेदारी मांगता है ..| ...बहरहाल आप सब ब्लाग संपादकों के कार्यों को देखकर मन में बहुत उम्मीद हो चली है .

जब हमने ब्लॉग शुरू किये थे रामजी भाई तो तमाम लोग इसका मजाक उड़ाते थे. कोई चार साल पहले इसे एक दोयम दर्जे का काम समझा जाता था. अशोक ने कबाड़खाना के ज़रिये साबित किया कि ब्लॉग पर गंभीर चीजें आ सकती हैं. अनुनाद के माध्यम से शिरीष ने तो कविता के क्षेत्र में गजब का काम किया. धीरेश का "एक जिद्दी धुन" शायद गंभीर जनपक्षधर लेखों वाला पहला ब्लॉग था. जनपक्ष इसी ब्लॉग पर एक बहस के दौरान प्लान किया गया कि एक कामन ऐसा प्लेटफार्म हो जहाँ साहित्य के साथ साहित्येतर विषयों पर गंभीर चीजें दी जा सकें. और इस मुश्किल काम को भारतभूषण तिवारी, धीरेश, विजय गौड़ जैसे मित्रों की सहायता से खड़ा किया गया. साहित्य के लोग दूरी लंबे समय तक बनाए रहे लेकिन अरुण माहेश्वरी, सुभाष गाताड़े, पंकज बिष्ट, मंगलेश डबराल, राजेश जोशी, ए के अरुण जैसे प्रतिबद्ध वरिष्ठ जनों और मित्रों ने लगातार इसके लिए सामग्री उपलब्ध कराई. प्रिंट में काफी कुछ छपा इससे. आज वह दौर आया है जब कोई भी ब्लॉग की ताक़त को कम करके नहीं अंक सकता. कुलपति विवाद हो या बिनायक सेन का मसला या सोनी सौरी का मसला जनपक्ष ने हमेशा एक स्टैंड लिया है.

साथ ही साहित्य के क्षेत्र में अनेक ब्लाग्स ने वाकई गंभीर काम किये हैं इधर. समालोचन और जान्कीपुल को मैं विशेष बधाई दूंगा (असुविधा के ज़रिये कविता के क्षेत्र में नए लोगों को आगे लाने की कुछ कोशिश मैंने भी की ही है) तो पढते-पढते के लिए बस एक चीज़ है - सलाम! विजय गौड़ अपने ब्लॉग "लिखो यहाँ-वहाँ" के माध्यम से गजब का काम कर रहे हैं. मेरा तो प्रस्ताव है कि इन ब्लाग्स की विशिष्ट सामग्री अब प्रिन में आनी ही चाहिए ...एक साथ या अलग-अलग.

असुविधा ने बहुत से नए लोगों को प्रोत्साहन दिया . हमारी रचनाएँ सबसे पहले असुविधा ने छापीं.. किसी भी नए को सामने लाना चुनौती का काम होता है .. वहाँ बहुत सी बातें रहती हैं , संपादक को बहुत कुछ आंकना होता है .. नव लेखन कितना प्रभावशाली है .. क्या वह भविष्य में ज़िम्मेदारी के साथ लिख पायेगा .. पाठक के हाथ में जाने के बाद संपादक और लेखक दोनों ही आलोचना के केंद्र में होते हैं . इस दृष्टि से असुविधा , जानकी पुल और समालोचन ने बहुतों को सम्मान दिया .. हम स्वयम इन तीनों के आभारी हैं कि इन संपादकों ने जोखिम उठाया और जगह दी .

हम तो पैदाइश ही ब्लॉग समय की हैं.सिर्फ़ मैं ही नहीं, कितने ही नए लेखक ब्लॉग लिखने से ही पहचान में आए. और आज भी मैं मानता हूँ कि मेरी अपनी ऑडियंस, सच्ची ऑडियंस वहीं से बनी है. आज प्रिंट पर लिखते हैं, लेकिन अपनी शर्तों पर लिखते हैं. यह लेखन की उस पहचान की वजह से है जो ब्लॉग लेखन से मिली.और मुझे ब्लॉग लेखन इसलिए भी पसन्द है क्योंकि यहाँ मुझे लेखन में शैली का बंधन नहीं महसूस होता. मेरे लेखन में व्यक्तिगत और सार्वजनिक, निजी और राजनौतिक, गल्प और कथेतर साथ चलते हैं. ब्लॉग उन्हें उड़ने के लिए खुला आसमान मुहैया करवाता है.



हिन्दी ब्लॉग एक तरह से अभिव्यक्ति के विभिन्न माध्यमों पर उपलब्ध और निरंतर रची जा रही विधाओं के दस्तावेजीकरण का एक ऐसा प्रयास है जो व्यक्तिगत होते हुए भी सामाजिक है. इंटरनेट की आभासी दुनिया मे यह एक नए संसार की रचना मे सक्रिय है. हिन्दी भाषा का एक नया मुहावरा गढ़ते हुए यह गतिशील और गतिमान है तथा इसकी उपस्थिति और उपादेयता को अनदेखा नहीं किया जा सकता है.त्वरित लेखन, त्वरित प्रकाशन और त्वरित फ़ीडबैक की सुविधा के कारण हिन्दी ब्लाग जगत वहुविध और बहुरूपी है. इसमें लेखक ही संपादक है और उसके सामने देश काल की सीमाओं से परे असंख्य पाठक हैं जो चाहें तो तत्क्षण अपनी प्रतिक्रिया दे सकते हैं.

यह एक तरह से अभिव्यक्ति के विभिन्न माध्यमों पर उपलब्ध और निरंतर रची जा रही विधाओं के दस्तावेजीकरण का एक ऐसा प्रयास है जो व्यक्तिगत होते हुए भी सामाजिक है , एकल होते हुए भी सामूहिक है। इसके समक्ष कोई सुदीर्घ पूर्ववर्ती परंपरा नहीं है और ही भविष्य का कोई खाका ही अभी स्पष्ट आकार ले सका है इसकी व्युत्पत्ति और व्याप्ति का तंत्र वैश्विक और कालातीत होते हुए भी इतना वैयक्तिक है कि सशक्त निजी अनु्शासन के जरिए इसे साधकर व्यष्टि से समष्टि की ओर सक्रिय किया सकता है इसी में इसकी सार्थकता भी है और सामाजिकता भी।रा्मजी तिवारी का यह लेख बहुत महत्वपूर्ण है जो इस माध्यम की प्रवृत्ति और प्रस्तुति पर भरपूर रोशनी डालता है। इसे अवश्य पढ़ा जाना चाहिए।

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