लोकेश नशीने "नदीश" के दो गीत - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित ई-पत्रिका

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लोकेश नशीने "नदीश" के दो गीत


एक.
व्याकुल हो जब भी मन मेरा
तब-तब गीत नया गाता है
आँखों में इक सपन सलोना
चुपके-चुपके आ जाता है

जोड़-जोड़ के तिनका-तिनका
नन्हीं चिड़िया नीड़ बनाती
मिलकर बेबस-बेकस चीटी
इक ताकतवर भीड़ बनाती
छोटी-छोटी खुशियाँ जी लो
यही तो जीवन कहलाता है

जीवन के सारे रंगों से 
भीग रहा है मेरा कण-कण
मुझे कसौटी पर रखकर ये
समय परखता है क्यूँ क्षण-क्षण
गड़ता है जो भी आँखों में
समय वही क्यों दिखलाता है

जाने किस पल हुआ पराया
वो भी तो मेरा अपना था 
रिश्ता था कच्चे धागों का
मगर टूटना इक सदमा था
घातों से चोटिल मेरा मन
आज बहुत ही घबराता है

दो.
कई दिन से चुप तेरी यादों के पंछी
फिर सहन-ए-दिल में चहकने लगे हैं
ख़्वाबों के मौसम भी आकर हमारी
आँखों में फिर से महकने लगे हैं

उमंगो की सूखी नदी के किनारे
आशाओं की नाव टूटी पड़ी है
तपती हुई रेत में जिंदगी की 
हमारी उम्मीदों की बस्ती खड़ी है
ज़मीं देखकर दिल की तपती हुई ये
अश्क़ों के बादल बरसने लगे हैं

हर एक शाम तनहाइयों में हमारी
मौसम तुम्हारी ही यादें जगाये
तुम्हारे ख़्यालों की रिमझिम सी बारिश
मुहब्बत का मुरझाया गुलशन सजाये
पाकर के अपने ख़्यालों में तुमकों 
अरमान दिल के मचलने लगे हैं

जहन में तो बस तुम ही तुम हो हमारे
मगर दिल को अब तुमसे निस्बत नहीं है
तुम्हे चाहते हैं बहुत अब भी लेकिन
है सच अब तुम्हारी ज़रूरत नहीं है
भुला दें तुम्हें या न भूलें तुम्हें हम
खुद से ही खुद अब उलझने लगे हैं 


 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-


लोकेश नशीने "नदीश"
रामनगररामपुर
जबलपुर (.प्र.) भारत
मोब. 9200250959
ई-मेल:lokesh.nashine@gmail.com

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