भाषा के मुद्दे पर संजीव निगम का कविताना हस्तक्षेप - अपनी माटी (PEER REVIEWED JOURNAL )

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सोमवार, अप्रैल 09, 2012

भाषा के मुद्दे पर संजीव निगम का कविताना हस्तक्षेप


सपना मुत्तुकृष्णन
एक :
सपना एक बच्ची है ,
मेरे पड़ोस की एक छोटी सी सुंदर बच्ची है .
सपना बोल सकती है ,
और बोलती भी है सपना,
पर, सपना तमिल नहीं बोलती,
ही अंग्रेजी,
हिंदी भी नहीं बोलती ,
और ही गुजराती, मराठी.
फिर भी, बोलती है सपना
और हम समझते हैं कि
वह क्या बोलती है.
हिंदी, तमिल, अंग्रेजी,गुजराती, मराठी
सब मिला कर ,
अपने मासूम विचारों कि मासूम सी पोटली खोलती है ,
और हम समझते  हैं, सब समझ जाते हैं .
भाषा का कोई बंधन
उस पर लागू नहीं होता.
भाषा का परहेज़ ,
उसकी समझ से बाहर है .
मेरी भाषा भी उसके लिए उतनी ही अपनी है ,
जितनी उसके जन्म के बदले
उससे जुड़ने वाली भाषा.

दो :

देखो इस समय
चुप रहो तुम.
ये वक़्त तुम्हारे बोलने का नहीं है .
आज तक तुम अपनी भाषा से
उगलते रहे अलगाव ,
शब्दों के, भावों के विराट समुद्र को मथ कर,
निकालते रहे कालकूट .
अब तो चुप रहो,
 और देखो ,
देश का सुखद सपना कैसे
अपने छुटपन में मिठास घोल रहा है


 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
संजीव निगम 
कविताकहानी,व्यंग्य लेख,नाटक आदि विधाओं में सक्रिय रूप  से  लेखन कर रहे हैं.कई सम्मान प्राप्त.कुछ टीवी धारावाहिकों,18 कॉर्पोरेट फिल्मों का लेखन.आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से 16 नाटकों का प्रसारण.मूलतः दिल्ली निवासी पर अब मुंबई में स्थायी निवास. यहाँ की कई साहित्यिक सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हुए.एक राष्ट्रीयकृत बैंक के मुख्य प्रबंधक [मार्केटिंग, प्रचार जनसंपर्क ] के  पद से स्वेच्छा से त्यागपत्र देकर अब सक्रिय रूप से स्वतंत्र लेखन. विज्ञापन जगत से जुड़े हुए. जनसंपर्क  विज्ञापन विशेषज्ञ 

[मोबाइल-9821285194]

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