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डॉ.पुरुषोत्तम अग्रवाल का रेखाचित्र Cum संस्मरण:गोधा जी की केन्टीन

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on मंगलवार, अप्रैल 10, 2012 | मंगलवार, अप्रैल 10, 2012


(ये रेखाचित्रनुमा संस्मरण यहाँ खासकर हमारे पाठकों के लिए हमने डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल की फेसबुक वाल से यहाँ छापने का मन बनाया हैं.आज़कल हम देखते हैं कई पाठक फेसबुक के प्रति अभी भी नकारात्मक नज़रिया पाले बैठे हैं.जिन्हें इस तरह की गरिष्ठ रचनाएं और अनुभव से वंचित होना पड़ता है.शायद हमारा ये प्रयास उन्हें कुछ रास आ जाए.-सम्पादक  )

"काश आपने कभी बोधा जी की कैंटीन की भी फोटो खींच ली होती...इसका इतना नाम सुना है आपके, प्रकाश जी के और कई अन्य लोगों के मुंह से कि सच में लगता है कि मैं इतने बरस बाद क्यूं पैदा हुआ ;)"-अशोक कुमार पाण्डेय ( साकिन गोरखपुर, हाल मुकाम ग्वालियर)

अशोक के उपरोक्त कथन से जोशित भए हैं सो यह मजमून लिख मारो है आप पंचन को भलो लगे तो आगे औरऊ लिखेंगे, सो निंदा प्रशंसा जोऊ कन्नी होए, कर डाली जाए.... 

तस्वीरें केवल कैमरे या ब्रश से तो नहीं उकेरी जातीं...

वह रेल के किसी डिब्बे का कबाड़ था, शायद छोटी लाइन की गाड़ी के छोटे से डब्बे का कबाड़, जो जाने कैसे, बाड़े पर स्थितरेनेसाँ शैली की उस इमारत के बाँए बाजू जमा था।  शायद इसीलिए वहाँ बाएं बाजू वाले ही ज्यादा जमघटा लगाते थे, हालाँकि दक्षिणपंथियों के आने पर भी कोई रोक तो नहीं थी। असल में, उन दिनों ये लाइनें इतनी तीखी थीं भी नहीं, या शायद हमीं लोगों को नहीं लगती थीं। लेकिन यह तो याद है कि विद्यार्थी परिषद ने अपने एक बड़े से कार्यक्रम में प्रकाश जी को मुख्य वक्ता के तौर पर बुलाया था और श्रोताओं ने सम्मान के साथ सुना था उन्हें।

अरे कहाँ निकल लए भैया, बात तो कछु औरई चल रही हती।

हओ, जे आए वापिस।

हाँ, तो वह छोटी लाइन की गाड़ी का परित्यक्त अंग था, कंपार्टमेंट। जिस इमारत के बाएं बाजू वह मौजूद था, उसकी सामने वाली सीढ़ियाँ चढ़ कर हम नगर के मुख्य पोस्ट ऑफिस में पहुँचते थे। बचपन में स्कूल से आते समय एक दिन बाबूजी से पूछा था, ‘इतने बड़े मकान में कौन रहता है’... ‘सरकार का मकान है यह’...बाबूजी के इस तथ्यात्मक उत्तर का अनुवाद खुराफाती बालक के दिमाग़ ने कुछ यूँ किया कि सरकार किसी औरत का नाम है, जो इसमें रहती होगी। काफी दिनों तक आलम यह रहा कि सामने से निकलूँ तो लगे कि इस समय सरकार कंघी-चोटी कर रही होगी, इस समय ब्यालू कर रही होगी। सरकार शब्द के रौब का  प्रमाण कहिए या  इमारत की भव्यता का असर  कि यह कभी नहीं लगा कि सरकार इस वक्त जीजी की तरह रोटी बना रही होगी या बद्री की अम्मां की तरह बर्तन माँज रही होगी। अब एक दिन हुआ यूँ कि उसी इमारत के सामने कुत्ते ने काट लिया, बड़े भाई ने कुत्ते के मालिक की खोज करनी चाही तो ज्ञात हुआ किसरकार का है’...आशय यह कि आवारा है...

बर्षों बाद जब यह घटना गोधाजी की कैंटीन पर याद की गयी तो भाष्य प्राप्त हुआ कि यही तो बात हैसरकारी कुत्ते क्रांतिकारियों और बुद्धिजीवियों को तभी से काटने लगते हैं जबसे कि स्वयं क्रांतिकारी को भविष्य  में क्रांतिकारी के रूप में अवतरित होने का कोई अंदेशा नहीं होता...पूत के पाँव पालने में दिखने का ही एक रूप यह भी है कि क्रांतिकारी पूत के पाँव पालने से जरा बाहर निकलते ही, साइकिल से जरा लटकते ही सरकार के कुत्ते काट सकते हैं।

जे हो का रओ है, यार, फिर से भटक लए...

सुन्नो है तो सुनो, हम तो ऐसे ही सुनामिंगे...नहीं सुन्नो तो निकल लेओ लक्ष्मण तलैया की तरफ...हाँ नहीं तो...

हाँ तोवह जो इमारत थी सामने से पोस्ट ऑफिसवही बाँये से मुंसीपाल्टी का दफ्तर भी थी। इस दफ्तर की सीढियों के साथ ही था वह डब्बा। सामने पीर सुथरे शाह की मजार, जिसके चबूतरा शाम के समय गोधाजी की कैंटीन का उसी तरह एक्सटेंशन बन जाता था, जैसे कि मुंसीपाल्टी की सीढ़ियां या मुंसीपाल्टी और सुथरे शाह की मजार के बीच सड़क का टुकड़ा।

यही थी गोधा जी की कैंटीन। डब्बे के अंदर कुछ बेंचें, कुछ बाहर। एक दो टेबलें भी जो बस थीं, कैंटीन शब्द के पारिभाषिक आग्रह को जैसे तैसे निभाते हुए। गोधाजी पता नहीं सिंधी थे, या पंजाबी या मारवाडी---इस तरह की जिज्ञासाएं उत्तर-आधुनिक डिस्कोर्स की संपन्नता से वंचित उस समय में मूर्खतापूर्ण नहीं तो अनावश्यक तो अवश्य ही मानी जाती थीं। गोधा जी की प्रसन्न पृथुल काया का दक्षिणार्ध तो खैर सामान्य पाजामे में ही सुशोभित रहता था, परंतु  उत्तरार्ध जिस वस्त्र से आवृत्त रहता था, वह कुर्ता होता था या कमीज का कोई संस्करण यह विमर्श का विषय हो सकता है। इस विमर्श में आम राय अंतत: यह बनी थी कि उस परिधान विशेष को अधकट्टा कहना सर्वथा उचित होगा। मुझे याद है कि मेरा एक कुर्ता जब बाँहों से फट गया था, और नया खरीदा जाना थोड़ा मुश्किल था, जीजी ने बांहों से उसे काट कर, तुरपाई कर अधकट्टा बना दिया था और संकोच के साथ सुझाव दिया था कि कुछ दिन इसी से काम चला ले परसोतम...

और यह देख कर चकित हुईं थीं कि मैं बड़ा खुश हुआ था उस अधकट्टे को देख कर, कि गोधाजी की स्टाइल का कुर्ता पहनूंगा...

कहा जा सकता है कि गोधा जी अपने वक्त से आगे और अपने लिए उचित भूगोल से बाहर अवतरित हो गये थे, वरना वे  अधकट्टे के डिजाइनर होते और हम्मा तुम्मा डिजाइनर गोधा के इलीट कस्टमर...गोधाजी का रंग पक्का था, गोरा सांवला, और गोल चेहरा कुछ कुछ खुतरे जामफल जैसा, बोलते कम थे लेकिन हँसते खूब थे। उस बेबाक हँसी में नायिका सुलभ इतराहट और लजीलापन तब सुना था जब प्रकाश जी ने अपने उपन्यासआधी खिड़कीमें गोधा जी का और उनकी कैंटीन का चित्रण किया।

गोधा जी की कैंटीन निंदा-रस की चौपाल भी थी और कई राजनैतिक सामाजिक सपनों का मैदान भी। वह कई सीरियस बहसों की गवाह भी थी और कई  युद्धों का रणक्षेत्र भी। वहीं कुछ लोगों के चुनावी टिकट मिल जाते थे, कई के कट जाते थे, वहीं वे थे जो चुनाव के समय दो-एक दिन के लिए जमींदोज रह कर पुन: पनपते थे और बताते थे, ‘क्या बताऊं यार, एकाएक मैडम का मैसेज गया था, परेशान हैं बेचारी कैंडिडेट नहीं मिल रहा ढंग का....लेकिन मैंने तो साफ कह दियामैडम मेरे भरोसे मत रहना....मुझे फुर्सत नहीं चुनाव के ...यापे की...’

हाँ, आपऐ अपने ...पन से ही काँ फुर्सत धरी...है के नईं

यह हृदय-विदारक टिप्पणी थी सेंगर जी की, जिनकी एक विचारणीय थीसिस यह थी कि कीसिंगर का निकास भिंड जनपद से है, वे निश्चय ही सेंगर हैं जो अमरीका जा कर कीसिंगर  हो गये हैं, “ इतेक आत्म-विश्वास से, ऐसी धाकड़ दादागीरी और कौन कर सकत है...काए प्रकाश जी...”

प्रकाश जी एंसायक्लोपीडिक अथॉरिटी थे, हर तरह की रचनात्मकता और विद्वता की। उनकी या नाग बोडस की ताईद पाने के लिए युवजन बेकरार रहते थे, इस चक्कर में  नाम-टपकन जिस तरह किया जाता था, वह बस समझ लीजिए कि जैसै आजकल फेसबुक पर कुछ मित्र छींकते-खाँसते और अन्यान्य आत्मीय क्रियाएं-प्रक्रियाएं करते विविध विदेशी लेखकों, संगीतकारों चित्रकारों आदि का स्मरण संस्मरण करते रहते हैं। यहआत्मीय क्रियाएं-प्रक्रियाएं’  वाला टुकड़ा, आप समझ ही सकते हैं, मुझ साहसहीन द्वारा तद्भव का तत्सम में किया अनुवाद ही है। और उस तद्भव का स्रोत गोधाजी की कैंटीन ही है। नाग बोडस इस नाम-टपकन पर सोबर सी प्रतिक्रिया ही करते थे, वैसे भी वे रेगुलर्स  में शामिल नहीं थे। जिस प्रतिक्रिया का तत्समीकरण मैंने किया है, उसके स्रोत दामोदर शर्मा थे। उन्होंने ही युवजनों के बीच प्रकाश जी की लोकप्रियता को शब्दबद्ध किया था, प्रकाश जी को “...यों का चुंबकअभिधान दे कर।

प्रसंगवश जिस शब्द को मैं बिंदियाँ लगा कर संकेतित कर रहा हूं वह उस समय ग्वालियर में अश्लील या गाली जैसा नहीं माना जाता था, आज का पता नहीं। मैं इसलिए परहेज कर रहा हूँ कि कोमल भावनाओं के इस जमाने में काहे किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाने का अपराधी बनूँ... 

शाम आठ बजते बजते, गोधाजी की कैंटीन का  दैनिक सत्र विधिवत शुरु हो जाता था। किसी बेंच पर लेखक समुदाय, तो किसी पर राजनैतिक कार्यकर्तागण, हालाँकि कोई कड़ा विभाजन यहाँ भी नहीं। लेखक राजनैतिक बेंच पर और राजनैतिक लेखक बेंच पर कभी भी लपक सकते थे, आवाज बुलंद हो तो दोनों सदनों की सदस्यता एक साथ निभा सकते थे। एक वाक्य लेखकीय विमर्श को अर्पित कर, अपनी राजनैतिक चर्चा में वापिस.... इस वाक्य को उलट कर भी पढ़ा जा सकता है।गोधाजी की कैंटीन उस जमाने के अनेकों अड्डों में से थी जहाँ लेखक अंतरिक्ष के और राजनैतिक कार्यकर्ता पाताल-लोक के निवासी नहीं होते थे।

लेखक राजनैतिक कार्यकर्ताओं से यत्किंचित चिढ़ते जरूर थे लेकिन वास्ता बना रहता था, राजनैतिक कार्यकर्ता भी अपनी शान के लिए ही सहीस्थानीय लेखकों, कवियों से परिचय रखना जरूरी मानते थे। सिविल सोसायटी अभी भविष्य के गर्भ में थी। वामपंथी मुहावरे तक अमेरिकी यूनिवर्सिटियों से बिना सोचे-बिचारे उठा लिए जाएं ऐसे सुदिन अभी दूर थे। राजनैतिक कार्यकर्ता होते थे, और  सामाजिक कार्यकर्ता या समाज-सेवक भी होते थे

वह सिविल सोसायटी अभी नहीं आई थी कि जिसका हिन्दी प्रति-शब्दसभ्य समाज या नागरिक समाजबनाना पड़े, बिना इस बात पर ध्यान दिये कि यह एक प्रति-शब्द एक छोटे से हिस्से  को छोड़  सारे समाज को सभ्यता से, और इने-गिनों के अलावा सारे नागरिकों को नागरिकता से वंचित कर देता है।  

कवि का अर्थ भी कवि-सम्मेलनों में भी तब तक सिर्फ और सिर्फ चुटकुलेबाज में रूढ़ नहीं हुआ था। गोधाजी की कैंटीन पर होने वाली चर्चा और चिंता के संदर्भ भी हायरार्की से अपरिचित थे, वियतनाम से लेकर हुजरात तक की समस्याओं पर बात होती थी। वियतनाम की ही बात करने वाला उच्च-भ्रू होने की कोशिश करे या हुजरात की ही चर्चा करने वाला लोकल, आथेंटिक होने का दावा करे- तो दोनों ही भैरंट ढंग से रगड़े जा सकते थे। बात का मुहाविरा लोकधर्मी भी होता था और कभी-कभार कुछ लोगों के लिए शोकधर्मी भी। यह मुहावरा गोधाजी की कैंटीन पर ईजाद नहीं होता था, बस टकसाली रूप पाता था। एक कवि की, स्वयं उन्हें अत्यंत प्रिय पंक्तियाँ थीं – ‘मुझको सोलह साल हो गये इसी ग्वालियर में/ मेरे गाल कटोरा ताल हो गये इसी ग्वालियर में...

मेरे ज्येष्ठ भ्राता जो खासे मंजे हुए हूटर थे, सिद्धहस्त माने जाते थे। कई बार उनकी सेवाएं कुकवि-शमन के लिए प्रार्थनापूर्वक अर्जित की जाती थीं। उपरोक्त पंक्तियों में उन्होंने गिरह लगाई थी, खासे चलते कवि-सम्मेलन में, कवि जी को मिलती वाह-वाही के दौरान-“ आया तुझको काल इसी ग्वालियर में...”

घटना घटी थी चैंबर ऑफ कॉमर्स के हॉल में, खबर बनी गोधा जी की कैंटीन पर। रामबाबू जी  ( जो वैसे रेगुलर विजिटर नहीं थे, और आम तौर से गोधाजी की कैंटीन की  संगत के प्रति सात्विक तिरस्कार का ही भाव रखते थे, लेकिन उस दिन अपनी प्रतिभा का प्रभाव देखने को मौजूद थे), को बुजर्ग गोधापंथियों की आशंसा और समव्यस्कों की ईर्ष्या प्राप्त हुई और कुकवि-शमन की यह घटना नगर की ओरल हिस्ट्री में शामिल हो गयी।

बाद के दिनों में हम लोग इंडियन कॉफी हाउस में बैठने लगे थे। लेकिन बात यह थी कि हमारी चिंताओं (समझदारों की  शब्दावली में आवारागर्दी) की गाड़ी खुलती जरूर कॉफी हाउस से थी, लेकिन उसका बड़ा जंक्शन तो वही था- गोधा जी की कैंटीन। वहाँ से गुजरे बिना जो दिन गुजरा वह जंत्री में गिना नहीं जाता था। इस बड़े जंक्शन पर सदाबहार मौजूदगियाँ थीं, - प्रकाश दीक्षित, दामोदर शर्मा, बैजू कानूनगो...कभी कभार मुकुट बिहारी सरोज- जिनके जबर्दस्त सेंस ऑफ ह्यूमर के बारे में इतना ही कहना ठीक है किजिसने झेला हो वह जाने”- कभी कभार ही आते थे लेकिन जब आते थे अपने शिकारों को कई दिन तक के लिए बिलबिलाता छोड़ जाते थे। इस समुदाय के साथ ही बैठते थे हम जैसे उदीयमान, जिनमें से संतोष छाजेड़ के अस्त हो जाने की खबर दो दिन पहले प्रकाश जी से ही मिली... यक्ष का स्मरण हो तो क्या होकिमाश्चर्यम् अत: परं...फिर भी संतोष के मामले में , राजेन के मामले में थोड़ी हड़बड़ी तो हुई है बॉस...पचास के जरा पार ही तो निकले थे दोनों...

खैर आपसे तर्क-वितर्क की गुंजाइश ही कहाँ, नियम तो नियम है और आपके नियमाभाव में भी तो नियम है ऐसा ज्ञानी लोग बता गये हैं सो अपनी क्या औकात...

 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
डॉ.पुरुषोत्तम अग्रवाल
कवि और लेखक 
संघ लोक सेवा आयोग के सदस्य 
लोकप्रिय विश्वविद्यालय जे.एन.यू से शिक्षित/दीक्षित हैं
साहित्य जगत का एक जानामाना नाम
'अकथ कहानी प्रेम की' नामक पुस्तक से भारी चर्चा में
मूल रूप से ग्वालियर के  हैं,फिलहाल मुकाम दिल्ली 

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