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कोलेज शिक्षा का माहौल वाया 1998

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शनिवार, मई 05, 2012 | शनिवार, मई 05, 2012


 हमारे देश के अधिकांश महाविद्यालयों पर एक सरसरी निगाह डालना ही इस बात को समझने के लिए काफी है कि उनमें उच्च शिक्षा आज अपने लक्ष्य से कोसों दूर भटक गई है। आज कुछ ही महाविद्यालय इस स्थिति का अपवाद कहे जा सकते हैं। न केवल अधिकांश महाविद्यालयों को, बल्कि हमारे देश के अनेक विश्वविद्यालयों को उनमें व्याप्त अनैतिकता और भ्रष्टाचार ने आज उच्च शिक्षा के अध्यापन के लिए पूरी तरह अयोग्य व भीतर से खोखला बना दिया है। बौद्धिक परिवेश और विद्याध्ययन से जुड़ी नैतिकता एवं पवित्रता, जो इन शिक्षण संस्थाओं  को समाज में एक विशिष्ट स्थान दिलवाती थी, अब अतीत बन कर रह गई है। महाविद्यालयों में पहले पाया जाने वाला पारिवारिक आत्मीयता और विश्वास का वातावरण आज लुप्त होता जा रहा है।

अब इन संस्थाओं पर संदेह, भय और अविश्वास की छाया बराबर ही मंडराती रहती है। कॉलेजों में होने वाले जिन विवादों और झगड़ों को पारिवारिक झगड़े मान कर पुलिस को उनसे दूर रखने की सलाह दी जाती थी, उन्होंने आज इतना विकराल रूप ले लिया है कि इनमें होने वाली किसी सामूहिक गतिविधि को अब पुलिस प्रबंध के बिना शांतिपूर्वक सम्पन्न करवा लेने की उम्मीद ही नहीं की जाती। धात्री माता (एल्मा मेटर) का जो स्नेहपूर्ण भाव छात्र पहले अपनी शिक्षण संस्था के प्रति अंतर्मन में अनुभव करते थे, उसका आज की युवा पीढी के मानस में कहीं नामोनिशान तक नज़र नहीं आता। हमारे देखते-देखते हमारी ये उच्च शिक्षण संस्थाएं आज जड़ और चेतना शून्य इमारतों में तब्दील होती जा रही हैं।

अधिकांश महाविद्यालयों को नज़दीक से देखने पर लगता है कि वे अनेक कारणों से उस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अयोग्य व अनुपयुक्त होते चले जा रहे हैं, जिसे उच्च शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य कहा जा सकता है। यह उद्देश्य निश्चय ही उन युवा नागरिकों को तैयार करना है, जो विभिन्न विषयों से संबंधित आधुनिकतम ज्ञान से भलीभांति सम्पन्न व परिचित हों और जो उसका समुचित उपयोग कर इस देश को सही दिशा देने तथा इसे श्रेष्ठता व प्रगति के मार्ग पर ले जाने में समर्थ हों। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उपयुक्त स्थितियों व वातावरण के संबंध में कोई प्रश्न उठाने के बजाय आज अधिकांश अभिभावक केवल अपने पुत्र-पुत्रियों की भौतिक सफलता-असफलता पर अपनी दृष्टि केन्द्रित रखते हैं और इस आत्मकेन्द्रित प्रवृत्ति के कारण अपना उल्लू सीधा करने के लिए तमाम काूनन और नियमों को ताक पर रख कर कई बार समूचे उच्च शिक्षा तंत्र को भ्रष्ट व कमजोर बनाने में कोई संकोच नहीं करते। उच्च शिक्षण संस्थाओं के प्रति समाज के ऐसे उदासीन व व्यक्तिवादी रवैये का ही परिणाम है कि वे आज हर प्रकार की अनैतिकता, भ्रष्टाचार, शोषण और अनेकानेक बाहरी तत्त्वों की दख़लन्दाजी का शिकार बनती जा रही हैं। 

   उच्च शिक्षा के लिए हमारे महाविद्यालयों के वातावरण की उपयुक्तता पर विचार करते हुए यदि हम सर्वप्रथम उनमें पढ़ रहे छात्र-छात्राओं को देखें, तो हमें लगेगा कि इनमें से अधिकांश विद्यार्थी तो उच्च शिक्षा के वास्तविक लक्ष्य की ठीक-ठीक कल्पना कर पाने में ही असमर्थ हैं। उनका उद्देश्य पाठ्य विषयों से संबंधित ज्ञान का गहरा अन्वेषण करना न होकर केवल वार्षिक परीक्षा में अधिक अंक अथवा कोई ऊंचा स्थान प्राप्त करने तक सीमित रहता है। अपने ज्ञान में अत्युत्तमता अथवा अपनेे कार्य निष्पादन में दक्षता कोे अपना लक्ष्य बनाने के बजाय केवल किसी पुरस्कार अथवा डिग्री को ही वे अपनी सर्वोच्च उपलब्धि के रूप में देखते हैं। मुफ़स्सिल कॉलेजों में पढ़ रहे अनेक विद्यार्थियों की भाषा समझ का स्तर इतना नीचा होता जा रहा है कि वेे अधिकांश मानक ग्रंथों के उपयोग द्वारा ज्ञान का स्वतंत्र अन्वेषण करने में समर्थ ही नहीं रह गए हैं। पढ़ाई के पीछे उनका उद्देश्य अब सिर्फ नौकरी का रास्ता खोजना रह गया है और इस नौकरी के लिए भी वास्तविक योग्यता व कार्यक्षमता विकसित करने से अधिक ध्यान ये विद्यार्थी और उनके अभिभावक सामान्यतः परीक्षा में अधिक अंक अर्जित कर पाने की ओर देते हैं। वस्तुतः जिन महाविद्यालयों में ये विद्यार्थी पढ़ रहे हैं, उनमें से कइयों के पास तो उन भौतिक साधन-सुविधाओं का ही अभाव होता है जो इन विद्यार्थियों को ज्ञान के स्वतंत्र अन्वेषण में समर्थ बना सकें। 

ज्ञान के वास्तविक और स्वतंत्र अन्वेषण से विलग ये छात्र महाविद्यालय जीवन की विभिन्न औपचारिकताओं में अस्थायी उत्तेजना के स्रोत तलाशते रहते हैं। सत्र के प्रारंभ में यह उत्तेजना प्रवेश के लिए संघर्ष, सिफारिशों व अटकलों से  शुरू होती है, जो कुछ समय बाद नवागन्तुक छात्रों की रैगिंग जैसी अमानवीय व आपराधिक गतिविधियों का रूप ले लेती है। थोड़ा समय बीतते न बीतते उच्च शिक्षा परिसरछात्र संघ चुनावों की गिरफ़्त में आ जाते हैं और तब विविध स्वार्थों से प्रेरित अनेक बाहरी तत्त्वों का प्रवेश महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में होने लगता है। इसी बीच दशहरा-दीपावली की छुट्टियां, शिविर, शैक्षणिक टुअर आदि आ जाते हैं। अवकाश के बाद विभिन्न परिषदों के गठन, उद्घाटन, टूर्नामेंट, वार्षिक खेलकूद, सांस्कृतिक कार्यक्रम आदि गतिविधियां इस उत्तेजना के वातावरण को हवा देतेे रहते हैं। शीतकालीन अवकाश के बाद ट्यूशनों की गहमागहमी शुरू हो जाती है जो देखते-देखते विद्यार्थियों को तैयारी की छुट्टियों तक ले आती है। परीक्षा के दिनों में भी कई विद्यार्थियों का ध्यान विषय की गहराई में जाने के बजाय परीक्षा मेें अधिक अंक लाने संबंधी अटकलबाजियों में लगा रहता है और वे महत्त्वपूर्ण प्रश्नों, गैस-पेपरों आदि के चक्कर में फंसे रहते हैं। परीक्षा हो चुकने सेे लेकर परीक्षा परिणाम घोषित होने तक के समय को छात्र अक्सर अपनी मानसिक थकान उतारने के समय के रूप में देखते हैं। परिणाम घोषित होते ही छात्र के लिए अगले सत्र का वही चक्कर दुबारा शुरू हो जाता है। 

ज्ञान की खोज में असमर्थ और उससे प्राप्त होने वाले आनंद से अपरिचित एवं वंचित युवा छात्र-छात्राएं हमारे यहां बराबर उत्तेजना के कई अन्य स्रोतों की भी तलाश में लगे रहते हैं। उच्च शिक्षा परिसरों में सेक्स,  हिंसा, धूम्रपान, तम्बाकू, शराब और मादक द्रव्यों का बढ़ता प्रचलन इस बात का द्योतक हैे कि इनमें उपस्थित युवा वर्ग अब उस ऊर्जा के विसर्जन के लिए निरन्तर नए मार्गों की खोज में बेचैन रहता है, जिस ऊर्जा को वस्तुतः  ज्ञान की तलाश में लगाए जाने की उम्मीद से उन्हें वहां प्रवेश दिया गया था। ज्ञान के क्षेत्र में मौलिकता, सूक्ष्मता या अत्युत्तमता की प्राप्ति के लिए अब तो कोई बिरले ही विद्यार्थी यत्नशील रहते हैं।  विद्यार्थी जगत् और शैक्षणिक परिसरों की इस विकृत छवि को जनमानस में और अधिक गहरा करने में अनेक बाह्य तत्त्वों का भी महत्त्वपूर्ण योग रहता है। उदाहरणार्थ लोकप्रिय प्रेस इन परिसरों के अनैतिक, गर्हित और उत्तेजक पक्ष को बराबर अतिशयोक्तिपूर्ण ढंग से वर्णित कर सामान्य पाठकों तक पहुंचाता रहता है, किन्तु उसमें सुधार के लिए किन्हीं ठोस व रचनात्मक सुझावों के प्रकाशन-प्रसारण में उसकी रुचि नगण्य रहती है। 

दृश्य मीडिया भी इसी तरह शैक्षणिक परिसरों की रूमानी, हिंसापूर्ण या अन्य भड़कीली गतिविधियों को बढ़ा चढ़ा कर आम जनता के मनोरंजन के लिए परोसता रहता है। विभिन्न राजनीतिक दल छात्र वर्ग में अपने वोट बैंक और अपने लिए युवा कार्यकर्ताओं की तलाश में लगे रहते हैं। छात्र संघ चुनाव जैसे अवसरों पर परस्पर विरोधी प्रत्याशियों के कंधों पर हाथ रख कर जहां वे इन चुनावों द्वारा अपनी पार्टी का चालू तापक्रम नापने का प्रयत्न करते हैं, वहीं छात्र-संघ चुनावों के दौरान ही वे उन्हें अशिष्टता, अपव्यय, झूठ, बेईमानी, विश्वासघात, भ्रष्टाचरण, हिंसा, जातिवाद, सांप्रदायिकता आदि दुर्गुणों का भी समुचित प्रशिक्षण दे देते हैं। छात्रों को जनतांत्रिक प्रक्रिया का एक आदर्श मॉडल प्रस्तुत करवाने के नाम पर होने वाली यह छात्र गतिविधि इस तरह भाईचारे, सहयोग और उत्तरदायित्व के स्थान पर केवल वैमनस्य, असहयोग व अधिकारों के दुरुपयोग की जन्मदात्री साबित होती है। ये स्वार्थी लोग छात्रों को कभी भी उनकी संकीर्ण दलगत राजनीति से ऊपर उठ कर तटस्थ व आलोचनात्मक दृष्टि से सोचने अथवा राजनीतिक परिपक्वता हासिल करने में समर्थ नहीं बनाना चाहते। उच्च शिक्षा संबंधी नीतियों का निर्धारण भी अनेक राज्यों में शिक्षाविदों से अधिक राजनेताओं और उनके राजनीतिक अनुचरों द्वारा होता है। 

बाज़ार के अनेक व्यापारिक स्वार्थ भी अपनी बगुला दृष्टि बराबर इन महाविद्यालयों और उनके छात्र-समुदाय पर गड़ाए रहते हैं। जिन शिक्षा संस्थाओं के प्रशासक व शिक्षक छात्रों की शिक्षा के बारे में पर्याप्त रूप से सावधान व जानकार नहीं होते, वहां बाजारों में घात लगा कर बैठे व्यापारी इन छात्रों को ज्ञानान्वेषण के वास्तविक मुख्य मार्ग से दूर ले जाकर कम मेहनत से परीक्षा पास करने के शॉर्ट कट की ओर फुसला लाने में सफल हो जाते हैं। पिछले कुछ वर्षों में किसी भी विषय के विद्वत्तापूर्ण मानक ग्रंथों का बाजारों से लोप होने के साथ-साथ पास बुक किस्म की पुस्तकों का जो प्रचलन बढ़ा है वह किसी भी गंभीर व संवेदनशील शिक्षक को चौंकाने के लिए काफी है।

इस संबंध में महाविद्यालयों की गफ़लत का आलम यह है कि कई पुस्तक विक्रेता तो इन पास बुकों को, जिन्हें छूने तक से पहले विद्वान और प्रतिष्ठित शिक्षक परहेज करते थे, उनके पुस्तकालयों तक पहुंचाने में सफल हो जाते हैं। ये व्यापारी अपनी तरह-तरह की व्यापारिक चालों से कई दूसरे-तीसरे दर्ज़े की पुस्तकें कम लागत से छाप कर अथवा पुरानी व अप्रासंगिक पुस्तकें पुनर्मुद्रित कर इन महाविद्यालयों द्वारा ऊंचे दामों पर उनके पुस्तकालयों के लिए खरीदवा लेते हैं। पुस्तकों का यह अनुपयोगी कबाड़ एक बार खरीद लिए जाने पर इन पुस्तकालयों में वर्षों तक यूं ही पड़ा रहता है, जबकि आवश्यक धन व जानकारी के अभाव में नवीनतम श्रेष्ठ व उपयोगी वस्तुएं इनमें कभी पहुंच तक नहीं पाती। 

महाविद्यालयों के विद्यार्थी इस तरह बौद्धिक परिपक्वता, वैचारिक सूक्ष्मता और मौलिकता अथवा रचनात्मकता की दिशा में बढ़ने की चेष्टा करने के बजाय इन संस्थाओं में बिताए समय को बेफ़िक्री और मौज मस्ती के एक लम्बे अन्तराल के रूप में देखते हैं। इन विद्यार्थियों के अभिभावक भी मोटे तौर पर उनके इसी सोच के साथ समझौता करते हुए उस दिन का इन्तज़ार करते हैं जब वे स्वयं अधिक समझदार होकर जिम्मेदारी अनुभव करते हुए अपने लिए कोई न कोई रोज़गार खोज लेंगे और मौज-मस्ती की इस सैरगाह को धीरे-धीरे अलविदा कह देंगे। 

अब यदि हम महाविद्यालयों में अध्यापन करने वाले प्राध्यापकों की ओर ध्यान दें तो और भी निराशाजनक तस्वीर हमारे सामने आती है। उच्च शिक्षा संस्थाओं के अधिकांश अध्यापकों को तो उस नैतिक गिरावट का कोई अहसास ही नहीं है जो उनके व्यक्तित्व और चरित्र में अब रच बस गई है। उच्च शिक्षा व्यवस्था ने उन्हें जो विशेषाधिकार दिए हैं, उनका दुरुपयोग करने में उन्हें लेशमात्र भी लज्जा अनुभव नहीं होती। एक ओर जहां वे अन्य कर्मचारियों के मुकाबले अधिक ऊंचे वेतनमानों की मांग करते नहीं अघाते, वहीं दूसरी ओर वे उतने समय तक भी अपनी शिक्षण संस्थाओं में रुकना अपने लिए आवश्यक नहीं समझते, जितने समय अपने कार्यालयों में अन्य कर्मचारी रुकतेे हैं। कॉलेजों की नौकरी को कई शिक्षक एक प्रकार के कार्यविहीन पद (साइनिक्युअर) के रूप में देखते हैं, जिसे एक बार प्राप्त कर लेने के बाद वे जैसे उसके एवज़ में पर्याप्त काम किए बिना ही ऊंची तनख़्वाह के हकदार हो जाते हैं। महाविद्यालयों में ऐसे प्राध्यापकों के किस्से अक्सर सुनने में आते हैं जो कई बार एक ऑटोरिक्शा किराए करके महाविद्यालय में आते हैं और उसी से कुछ देर बाद वापस घर लौट जाते हैं। गृहिणियाँ महाविद्यालय शिक्षण को इसलिए सर्वाधिक उपयुक्त सेवा मानती हैं कि इसे करने के साथ-साथ वे अपने घर-परिवार की देखभाल भी अपेक्षाकृत आसानी से कर सकती हैं। 

    जहां अन्य किसी कार्यालय में यह प्रश्न कोई नहीं उठाता कि वहां किसी अधिकारी अथवा कर्मचारी के लिए कितने बजे से कितने बजे तक रुकना ज़रूरी है, वहीं महाविद्यालयों व विश्वविद्यालयों में यह प्रश्न बार-बार उठाया जाता है कि उनमें प्राध्यापकों का न्यूनतम ठहराव समय क्या हो। इसके पीछे तर्क सामान्यतः यह दिया जाता है कि प्राध्यापक जितने समय कक्षा में शिक्षण करता है, वही उसका वास्तविक कार्य समय नहीं होता। उस शिक्षण से संबंधित अन्य कार्यों में उसके द्वारा लगाए जाने वाले समय को भी वस्तुतः इसके कार्य समय में शामिल किया जाना चाहिए। यह तर्क वैसे अनुचित भी नहीं प्रतीत होता, क्योंकि यदि उच्च शिक्षा से जुड़ा कोई वरिष्ठ शिक्षक किसी महत्त्वपूर्ण सेमिनार में भागीदारी के लिए कई घंटे संबंधित विषय के गूढ़ अध्ययन और उसकी बारीकियां खोजने में लगाता है तो उसके इस श्रम का लाभ भी परोक्षतः उसके छात्रों अथवा उच्च शिक्षा तंत्र को ही मिलता है। 

यह भी सही है कि ज्ञान का गंभीर अन्वेषण और उसकी प्रगति तभी संभव है जबकि विद्वानों को अन्य बहुत सी चिंताओं से मुक्त रखते हुए पर्याप्त फ़ुर्सत एवं स्वतंत्रता उपलब्ध करवाई जाए। किन्तु हमारे महाविद्यालयों में हालात आज जिस तरह बदल रहे हैं, उन्हें देखते हुए क्या यह प्रश्न उठाना उचित नहीं होगा कि उच्च शिक्षा से जुड़े शिक्षक ज्ञान के सतत् अन्वेषण के लिए उन्हें मिली हुई इस आवश्यक छूट का उपयेाग किन्हीं ऐसे कामों में तो नहीं करने लगे हैं, जिनका ज्ञानवृद्धि से कोई संबंध ही नहीं है ? 

आजकल आए दिन इस प्रकार की शिकायतें सुनने को मिलती है कि अमुक व्याख्याता अपने विषय के अध्ययन से अधिक रुचि ज़मीनों की ख़रीद-फ़रोख़्त में लेने लगे हैं अथवा फ़लां प्राध्यापक अपनी संस्था के अन्य छात्रों के कल्याण से अधिक कल्याण उन छात्र-छात्राओं का चाहते हैं जो प्रतिमाह कुछ भेंट राशि के एवज़ में इन प्राध्यापकजी के घर  इनसे मार्गदर्शन प्राप्त करने आते हैं। कुछ अपने विषय से अधिक रुचि शेयर बाजार के अध्ययन में लेते देखे जा सकते हैं तो अन्य कुछ पाठ्य पुस्तक लेखन अथवा पासबुक लेखन को ही अपने प्रमुख कार्य के रूप में देखने लगते हैं। इन तमाम प्रवृत्तियों का परिणाम यह होता है कि ये शिक्षक अपनी शिक्षण संस्था में कम से कम समय रुक कर शेष समय अपने इन दूसरे कार्यों को देना चाहते हैं।

जिस फुर्सत का उपयोग उन्हें अपने विषयों के व्यापक व गहरे अध्ययन में करना चाहिए था, उसका दुरुपयोग बराबर इस प्रकार के अशैक्षणिक कार्यों में करते रहने के कारण ये शिक्षक कभी वह उच्च बौद्धिक या वैचारिक स्तर भी प्राप्त नहीं कर पाते जो समाज में उनकी अलग पहचान बना सके और जो समाज के अन्य वर्गों से उन्हें उनकी विद्वत्ता के लिए अतिरिक्त सम्मान दिलवा सके। अधिक धन और अधिक सुख-सुविधाओं की मरीचिका के पीछे भागते हुए और एक सामान्य उपभोक्ता संस्कृति के सर्वप्रचलित मूल्यों से ही परिचालित ये शिक्षक न तो अपने स्वधर्म का पालन ठीक से कर पाते हैं और न ही घोषित रूप से धनार्जन में जुटे व्यापारियों के मूल्यों को अपनाकर धन संग्रह के ही कोई अनोखे कीर्तिमान स्थापित कर पाते हैं। अपनी तुलना अधिक सत्ता, वैभव या साधन-सम्पन्न लोगों से करते हुए वे बारंबार एक विचित्र कुंठा व हीनता अनुभव करते रहते हैं और अपनी उस विशिष्ट बौद्धिक व वैचारिक समृद्धि की कोई कल्पना नहीं कर पाते जो उन्हें दूसरों से अलग कर विशिष्ट सम्मान का अधिकारी बनाती है। 

उच्च शिक्षा में लगे और किसी विशिष्ट विषय पर अधिकार रखने वाले ज्ञानान्वेषी विद्वान की तुलना वस्तुतः किसी ऐसे पर्वतारोही से की जानी चाहिए, जिसका स्वयं की जान जोखिम में डाल कर किन्हीं अविजित व दुर्गम पर्वत शिखरों पर चढ़ने का प्रयास भले ही किसी को मूर्खतापूर्ण व आत्मघाती लगे, पर्वतारोहण की दृष्टि से उसे जीवन की अन्यतम उपलब्धि ही कहा जाएगा। उच्च शिक्षा क्षेत्र के उन विद्वानों को, जो ज्ञान को ही ओढ़ते-बिछाते हैं, हमारा समाज आज तक इस तरह की एक विशिष्ट कसौटी पर ही परखता रहा है और उस पर खरे उतरने वालों को सदैव कृतज्ञता पूर्ण सम्मान देता रहा है। 

आज दुर्भाग्य से महाविद्यालयों के अधिकांश शिक्षक उस विशिष्ट मूल्य प्रणाली को विस्मृत करते जा रहे हैं जिसके आधार पर उनकी उपलब्धियों का मूल्यांकन हमारा समाज अब तक करता रहा है और जिसके आधार पर उनका मूल्यांकन बहुत कुछ उनको  स्वयं को भी करना चाहिये। जो सम्मान ज्ञान केे प्रति उनके समर्पण, त्याग और सत्ता व सुख सुविधाओं के प्रति उनकी उदासीनता की बदौलत उन्हें अब तक मिलता रहा है, उस ज्ञान के प्रति उनके लगाव में अब लगातार कमी आती जा रही है। यदि आज बहुत से मुफ़स्सिल कॉलेजों के पुस्तकालयों को जाकर देखा जाए तो उनमें आधी से अधिक पुस्तकें ऐसी मिल जाएंगी, जिन्हें मुश्किल से ही कभी किसी ने पढ़ा होगा। इन पुस्तकों का अंग्रेज़ी में होना कई प्राध्यापकों के लिए उनकी अगम्यता को और भी बढ़ा देता है। 

    हालात ये होते जा रहे हैं कि यदि इनमें से कई महाविद्यालयों के व्याख्याताओं को उनके विषयों से संबंधित मानक ग्रंथों की सूचियां तैयार करने का कहा जाए तो उनमें से अधिकांश लोग इस कार्य में अपने आपको असमर्थ पाएंगे। उनके विषय से संबंधित ज्ञान में हो रहे नवीनतम विकास की जानकारी कई बार उन्हें सर्वप्रथम उनके छात्रों केे लिए निर्धारित पाठ्य पुस्तकां अथवा किन्हीं पूर्वाभिमुखीकरण पाठ्यक्रमों द्वारा प्राप्त होती है। इनमें से कई प्राध्यापक तो वर्षों तक कक्षाओं में अपने छात्र काल केे नोट्स के आधार पर ही पढ़ाते रहते हैं। महाविद्यालयों के पुस्तकालयों व वाचनालयों को नवीनतम जानकारी से लैस रखने की इच्छा या सामर्थ्य अब बहुत कम शिक्षकों में ही दिखाई देती है। 

राजकीय महाविद्यालयों में काम कर रहे प्राध्यापकों के द्वारा भरे जाने वाले वार्षिक मूल्यांकन प्रतिवेदनों को यदि ध्यान से पढ़ा जाए तो यह सरलता से देखा जा सकता है कि वे अपनी भूमिका को प्रमुखतः निर्धारित पाठ्यक्रम पूरा करवाने, अपेक्षित संख्या में कक्षाएं पढ़ाने और अपने छात्रों के परीक्षा-परिणामों को एक निर्धारित प्रतिशत से नीचे नहीं जाने देने के रूप में देखते हैं। यह स्वाभाविक ही है कि ऐसे प्राध्यापक अपने छात्रों को  उत्तरोत्तर गहरा व विस्तृत अध्ययन करने की प्रेरणा देने के बजाय पाठ्यक्रम के कुछ चुने हुए भागों का अध्ययन करके केवल परीक्षा में अधिक अंक प्राप्त करने के लिए ही प्रोत्साहित करें।

अनेक महाविद्यालयों के प्राध्यापक और संस्था प्रधान प्रतियोगी परीक्षाओं में चयनित होने वाले छात्रों को उनकी संस्था की सर्वोच्च उपलब्धि मानते हैंे। किसी विषय की जटिलता ओर सूक्ष्मता का अन्वेषण करते समय जिस विशिष्ट संतुष्टि व आनंद की अनुभूति उस विषय के विद्वान को होती है, उस अनुभूति की सामर्थ्य ही अब इन शिक्षकों में नहीं रह गई है। इसीलिए अपने छात्रों को उस विशिष्ट अनुभूति की दिशा में ले जाने का कोई प्रश्न ही इन शिक्षकों के संदर्भ में नहीं उठाया जा सकता। अपने विशिष्ट ज्ञान की आभा से मंडित और उसकी सूक्ष्मताओं के लोक में विचरण करते हुए महाविद्यालय शिक्षक जिस तरह पहले कभी अपनेे आपको जन सामान्य से अलग और कुछ ऊपर उठा हुआ महसूस करते थे, उस तरह का अनुभव आज के महाविद्यालय शिक्षकों के लिए केवल एक अव्यावहारिक व कल्पित आदर्श की वस्तु बन गया है। कोई आश्चर्य नहीं कि आज इन शिक्षकों के इस तरह आभाशून्य हो जाने पर इनके छात्र भी ज्ञान के उस आलोक से वंचित रहंे जो पहले उन्हें उनके सान्निध्य में सहज ही प्राप्त होता रहता था।

व्यक्तिगत उपलब्धियों के रूप में ज्ञान की समृद्धि व श्रेष्ठता संबंधी किन्हीं विशिष्ट जीवन मूल्यों के बजाय जन-सामान्य में प्रचलित उपभोक्ता संस्कृति के मूल्यों से ही परिचालित ये प्राध्यापक अब शैक्षणिक जगत में व्याप्त अनेक प्रकार के भ्रष्टाचारों में लिप्त रहते हैं। प्राइवेट ट्यूशनों अथवा निजी संस्थाओं में कोचिंग के अलावा अनुपस्थित विद्यार्थियों को उपस्थित दर्शाने, प्रश्नपत्रों की गोपनीयता भंग करने, अयोग्य विद्यार्थियों के प्राप्तांक बढ़ा देने एवं व्यक्तिगत द्वेष के कारण किसी निरपराध छात्र का भविष्य खराब कर देने में इन्हें कोई पाप-बोध नहीं होता। सरल स्वभाव वाले कई शिक्षक किसी व्यक्तिगत चुनौती के उपस्थित हो जाने पर भ्रष्टाचार व अनुशासहीनता को किसी कारगर उपाय से नियंत्रित करने का कोई प्रयास करने के बजाय आजकल स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के  लिए आवेदन कर देते हैं और इस तरह उनके रणक्षेत्र से ही पलायन कर जाते हैं। अधिकांशतः वे ही शिक्षक अब प्रशासनिक पदों पर बने रहना पसंद करते हैं जिनकी रुचि उन पदों से जुड़े विशेषाधिकारों, साधन-सुविधाओं, सम्मान, ऊंचे संबंधों या अन्य किन्हीं लाभों में होती है। गिरे नैतिक चरित्र वाले ऐसे पदों को कई बार अपने लिए किसी अतिरिक्त अनुचित आय का साधन बना लेने में भी संकोच नहीं करते। 

    महाविद्यालयों में काम करने वाले शिक्षकों में से अधिकांश के कुछ न कुछ स्वार्थ शिक्षा के इस ह्रासोन्मुख स्वरूप के साथ संयुक्त हो गए हैं। इनमें से कुछ तो इस सेवा में मिलने वाली फुर्सत का लाभ बराबर अपने अन्य कामों के लिए उठाते रहना चाहते हैं, जबकि कुछ दूसरे ट्यूशनों, परीक्षाओं आदि से मिलने वाले अन्य लाभों से वंचित नहीं होना चाहते। यही कारण है कि ऊपर से इस पतनशील शिक्षा पद्धति की आलोचना करते हुए भी वे मन से कभी इसमें सुधार के लिए किसी गंभीर प्रयास की शुरूआत नहीं करना चाहते। किन्हीं पराजित सैनिकों की भांति वे शिक्षा व्यवस्था के अधःपतन का समूचा दोष समाज, संस्कारों, राजनेताओं अथवा शिक्षाविदों के मत्थे मढ़ स्वयं को किसी भी प्रकार के उत्तरदायित्व से बरी मान लेते हैं। शिक्षा में लगातार आ रही गिरावट और शिक्षा परिसरों में निरंतर बढ़ती अनुशासनहीनता को रोकने के लिए संकल्पपूर्वक कोई सार्थक प्रयत्न करने के बजाय वे अपनी बातों में बराबर एक प्रकार की निरुपायता व पराजयवादिता प्रकट करते रहते है

महाविद्यालयों की शिक्षा व्यवस्था का एक तेजी से बढ़ता हुआ अनैतिक पक्ष यह है कि उसमें छात्र को कमजोर और सहायताहीन पाकर उसकी कोई मदद करने के बजाय कई शिक्षक उसकी असहायता का लाभ उसके आर्थिक शोषण के लिए उठाने की इच्छा रखते हैं। कई हृदयहीन चिकित्सक जिस तरह आजकल किसी कष्ट पाते हुए रोगी के तत्काल कष्ट निवारण का अपना चिकित्सकीय धर्म छोड़ कर उसकी इस विवशता का इस्तेमाल अपने आर्थिक लाभ के लिए करने की कोशिश करते हैं, उसी तरह कई शिक्षक भी आज शैक्षणिक दृष्टि से कमजोर छात्र को ट्यूशन 

आदि के लिए प्रेरित कर अपना उल्लू सीधा करने में संकोच नहीं करते। अपने सभी छात्रों के प्रति किसी गहरी करुणा या सहानुभूति से प्रेरित होने के बजाय वे अपनी परवाह का दायरा केवल अपने परिचितों व संबंधियों तक सीमित कर लेते हैं। अधिकांश प्राध्यापक छात्रों के व्यवहार को तभी तक अपनी ज़िम्मेदारी के रूप में देखते हैं जब तक वे उनकी कक्षा में हैं। उनकी हिंसा, शराबखोरी या किसी व्यक्तिगत अनैतिकता से जैसे उनका अब कोई सरोकार नहीं रह गया है। प्राध्यापकों और छात्रों के बीच का यह अलगाव आज शिक्षा परिसरों में व्याप्त अनुशासनहीनता के मूल कारणों में से एक है। इस अलगाव का ही एक परिणाम यह भी है कि कई शिक्षक और संस्था प्रधान अपने निजी स्वार्थों के लिए छात्रों की ‘युवा शक्ति‘ का उपयेाग दूसरों को डराने धमकाने अथवा उन पर अनुचित दबाव डालने के लिए करने में भी नहीं हिचकिचाते हालांकि कालान्तर में इसकी सज़ा कई बार स्वयं उन्हें भी भोगनी पड़ सकती है। महाविद्यालयों के वातावरण में पारस्परिक सद्भाव और पारिवारिक भावना को बनाए रखने की ज़रा भी परवाह न करते हुए शिक्षक और संस्था प्रधान इस ‘युवा शक्ति‘ का प्रयोग एक दूसरे के खिलाफ़ तक कर डालते हैं। हमारे समाज में बढ़ती हुई आत्मकेन्द्रितता भी, जो व्यक्तिगत लाभ को किसी संस्था के स्वास्थ्य औरकल्याण से ऊपर रख कर देखती है, और जो उसके लिए साधनों की नैतिकता-अनैतिकता के बारे में बहुत कम ही विचार करती है, इन संस्थाओं में बढ़ते हुए शोषण और भ्रष्टाचार के लिए बहुत कुछ उत्तरदायी है।

आज के इस बदले हुए माहौल में भी हमें चंद ऐसे शिक्षक अवश्य मिल जाएंगे, जिन्होंने स्वेच्छा से शिक्षण के व्यवसाय को चुना और जो शिक्षा जगत के विशिष्ट आदर्शों और मूल्यों से ही परिचालित होते हैं। ज्ञान और शिक्षा को समर्पित ये शिक्षक अध्ययन-अध्यापन में आज भी उस आनंद का अनुभव करते हैं, जो इस व्यवसाय के ही लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध लोगों को प्राप्त होता है। किन्तु इन प्राध्यापकों की स्थिति आज बहुत कुछ लंका में विभीषण की सी हो गई है। इनके सहकर्मी सामान्यतः इन्हें आदर्शवादी ठहरा कर इनका उपहास करते हैं और यदि ऊंचे वेतनमानों के एवज में ये उनका ध्यान उनके वास्तविक कर्त्तव्यों की ओर दिलाएँ तो वे इन्हें अपने ही वर्ग के प्रति गद्दार समझते हैं।

    देश की प्रगति व कल्याण की चिंता करने वाले किसी भी व्यक्ति को उच्च शिक्षा में व्याप्त इस अनैतिकता, भ्रष्टाचार और जन-धन के अपव्यय को रोकने की सक्रिय चेष्टा करनी चाहिए। उच्च शिक्षा की कोई भी संस्था खोलने या चलाने का अधिकार किसी को भी तब तक नहीं मिलना चाहिए, जब तक कि वह उस संस्था के ज्ञान की वृद्धि के लिए हर प्रकार से समर्थ व उपयुक्त होने का आश्वासन न दे सके। हमारे उच्च शिक्षा संस्थानों को शिक्षा के अनधिकारी युवाओं के अस्थायी शरणस्थल अथवा युवक-युवतियों के लिए एक सैरगाह बने जाने से  रोका जाना चाहिए। ऐसा न किए जाने की दशा में हमारा युवा वर्ग यहां रह कर अधिकाधिक दिशाहीन, हिंस्र, अपराधी व समाजविरोधी बनता जाएगा। हमारे उच्च शिक्षा परिसर इस तरह उन आपराधिक तत्वों का प्रजनन क्षेत्र बन जाएंगे, जो अंततः हमारी सामाजिक व्यवस्था को ही छिन्न-भिन्न कर डालेंगे। भारतीय समाज को इसीलिए हमारे उच्च शिक्षा तंत्र के स्वास्थ्य के प्रति उदासीन नहीं रहना चाहिए। यह आवश्यक है कि हमारे महाविद्यालय हमारी युवा पीढ़ी को अधिक अनुशासित, शिष्ट तथा रचनात्मक, बौद्धिक व वैचारिक दृष्टि से निरन्तर विकासमान बनाए रखनेे में समर्थ रहें। जिन महाविद्यालयों में विद्यार्थियों के लिए पर्याप्त फ़र्निचर, पुस्तकंे, भवन, वाचनालय, सभागृह आदि उपलब्ध न हों और जहां प्राध्यापक स्वयं इच्छित समय तक बैठ कर शांतिपूर्वक अध्ययन करने में असमर्थ हों, उन महाविद्यालयों को महाविद्यालय कहना केवल उच्च शिक्षा का मज़ाक उड़ाना है। हमारी युवा पीढ़ी के एक प्रबुद्ध वर्ग को इस देश के भविष्य निर्माण के लिए भलीभांति तैयार करना हम सभी की सामूहिक ज़िम्मेदारी है। 

कोई भी समाज अनैतिकता को शायद पूरी तरह निष्कासित नहीं कर सकता। व्यापार में, राजनीति में, युद्ध आदि में अनैतिकता की उपस्थिति पर लोगों द्वारा सामान्यतः आश्चर्य नहीं प्रकट किया जाता। किन्तु न्याय, चिकित्सा और शिक्षा जैसेे क्षेत्रों में, जिनका कि मूलाधार ही लोक-कल्याण व मानव प्रकृति का परिष्कार है, यदि अनैतिकता प्रवेश कर जाए तो यह किसी भी समाज के लिए भयावह व घातक सिद्ध हो सकता है। उच्च शिक्षा में धर्मपालन और नैतिकता का प्रश्न इसीलिए एक बुनियादी और निर्णायक प्रश्न बन जाता है, जिसे सरलता से टाला नहीं जा सकता। उच्च शिक्षा जगत में छात्रों व शिक्षकों की नैतिक अर्हता भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण  है, जितनी कि उनकी शैक्षणिक अर्हता। 

किसी तंत्र में एक बार जब अनैतिकता का प्रवेश हो जाता है तो समय बीतने के साथ धीरे-धीरे उसे एक प्रकार की सामाजिक स्वीकृति भी मिल जाती है। कई सरकारी विभागों में आज घूस और भ्रष्टाचार को उनके अविभाज्य अंग के रूप में देखा जाने लगा है। अस्पृश्यता, दहेज, दासता, गैर बराबरी आदि अनेक अनैतिकताओं को भारतीय समाज ने कभी धीरे-धीरे स्वीकार कर लिया था। उच्च शिक्षा के प्रति यदि आज हमारा समाज इसी तरह उदासीन व लापरवाह रहा तो उसका समूचा तंत्र हमारे देखते-देखते कुशिक्षा व निरर्थकता की उस अधोगति तक पहुंच जाएगा, जहां से उठा कर उसे पुनः किसी श्रेष्ठ स्थान पर प्रतिष्ठित कर पाना हमारे लिए अत्यन्त कष्टसाध्य व दुष्कर हो जाएगा।

यहां यह कहना भी अनुचित व अप्रासंगिक नहीं होगा कि शिक्षकों और शिक्षण संस्थाओं पर भरोसा करके ही संरक्षक युवा छात्र-छात्राओं को उन्हें सौंपते हैं। प्रत्येक संरक्षक यह अपेक्षा करता है कि ये शिक्षण संस्थाएं इन युवाओं के सर्वांगीण विकास का अपना दायित्व पूरा करेंगी। वे उन्हें परिष्कृत रुचियों वाले बेहतर इन्सान और अनुशासित व सुसंस्कृत नागरिक बनाएंगी, जो न केवल उनके परिवारों के लिए बल्कि समाज और समूचे राष्ट्र के लिए सहायक व उपयोगी सिद्ध होंगे। गुरुओं को कभी हमारे यहां इतना सम्मान प्राप्त था कि राजा तक अपने पुत्रों को उन्हें सौंपने में आनाकानी नहीं करते थे। शिक्षकों को उनके कार्य में छूट और आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध करवाने वाला समाज उनसे एक आंतरिक जवाबदेही की अपेक्षा रखता है और आज भी उन्हें ज्ञान और नैतिकता के संरक्षकों व मार्गदर्शकों के रूप में देखता है। शिक्षण संस्था प्रधानों के निर्णय में हस्तक्षेप करने में पहले न्यायालय और कार्यपालिकाएं भी संकोच करती थीं। आज यदि हमारे महाविद्यालय समाज में पहले जैसा ही सम्मान व महत्त्व प्राप्त करना चाहते हैं तो उन्हें उस अनैतिकता से ऊपर उठना होगा, जो दिनोंदिन उनकी छवि को धूमिल कर रही है। उनका स्वयं वैसा न कर पाना उन्हें भविष्य में कभी समाज के उस दंड का भागी बना देगा, जो किसी के भी साथ विश्वासघात करने वाले को मिलता है। 

 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

डॉ.सदाशिव श्रोत्रिय
नई हवेली,नाथद्वारा,राजस्थान,मो.09352723690,ई-मेल
(स्पिक मैके,राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य रहे डॉ. श्रोत्रिय हिंदी और अंग्रेजी में सामान रूप से लिखने वाले लेखक हैं.ये निबंध उनके हालिया प्रकाशित  निबंध संग्रह 'मूल्य संक्रमण के दौर में' से साभार लिया गया किया है,जो मूल रूप से    रचनाकाल: जून, 1998  में प्रकाशित हुआ था. ये संग्रह प्राप्त करने हेतु बोधि प्रकाशन से यहाँ mayamrig@gmail.com संपर्क कर सकते हैं. )

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