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रविन्द्रनाथ टैगोर के सन्दर्भों में :वर्ण व्यवस्था का भूत अब भी लोगों के दिलो दिमाग पर हावी है।

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शुक्रवार, मई 04, 2012 | शुक्रवार, मई 04, 2012


  • जन्मदिन 7 मई पर विशेष
  • रविन्द्रनाथ टैगोर और सामाजिक चेतना
  • लेखिका-सोमा विश्वास


रविन्द्रनाथ टैगोर एक बड़े और सही मायने में एक मुकम्मल साहित्यकार थे। उनका लंबा जीवनकाल कर्मप्रधान रहा। उनकी रचनाएं देशकाल की सीमा लांघकर वैश्विक धरातल पर चर्चित हुई। वे निरंतर इस बात के लिये प्रयत्नशील रहे कि पूर्व और पश्चिम  एक दूसरे  के निकट आएं और उनमें एक ऐसा मेल उत्पन्न हो, जिसके आधार पर विश्व की मानवता एक सूत्र में  बंध जाए। उनके इसी दृष्टिकोण ने उन्हे विश्वकवि के रूप में प्रतिष्ठापित किया।उनके कलम में जादुई ताकत थी। उनका एक जीवन दर्शन था। इस जीवन दर्शन के माध्यम से अपने कृतित्व की एक विशेष छाप छोड़ गए हैं।

            इस प्रसंग में यह सवाल उठता है कि समाज मूल्यांकन की क्या आवश्यकता है?यह बड़ी आसानी से कहा जा सकता है कि हमारे जिन्दा रहने के जरूरत के लिये यह मूल्यांकन जरूरी है। सामाजिक उन्नति के लिये क्या जरूरी है ?इसका जवाब उनके जीवन दर्शन में तलाशा जा सकता है।शिक्षा का सर्वाधिक प्रचार, स्वास्थ्य नारी कल्याण तथा अन्य मुद्दों को समाज शास्त्रियों ने सामाजिक उन्नति के सूचक बनाये हैं। इन सवालों पर रविन्द्रनाथ ने न सिर्फ अपने समय सोचा था बल्कि उस पर काम भी किये। यह उनकी दूरगामी दृष्टि का परिचायक है। रविन्द्रनाथ ने इसके मानव के पारस्परिक सहयोग, आपसी सामंजस्य को भी उस समय की सामाजिक व्यवस्था में जोड़ा। वे इंसान को समाज के लायक तैयार करना सर्वोपरि मानते थे। यह सबसे बड़ी त्रासदी है कि उनके सपनों को हम अपने कर्म के माध्यम से साकार नहीं कर पाये। इस लिहाज से गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर जीवन दर्शन की प्रासंगिकता और बढ़ गयी है जब हमारा समाज टूटन के कगार पर है। मानवीय मूल्यों का क्षरण हो रहा है। वर्ण व्यवस्था का भूत अब भी लोगों के दिलो दिमाग पर हावी है। नारी विज्ञापन की बस्तु है। उसे बाजार में परोसा जा रहा है।

      गुरूदेव की रचनाएं किसी काल के लिये नहीं बल्कि एक युगदृष्टा की भांति उनकी रचनाओं में समाज के शुभ के संदेश छिपे हैं। गुरूदेव का जिस काल में आर्विभाव हुआ , वह नवजागरण का काल था।साथ ही समाज के प्रति उनका अपना दृष्टिकोण, जिसका प्रयोग उन्होंने जीवन की प्रयोगशाला में किया।1905 के बंगभंग आंदोलन के दौरान उनमें जो स्वदेश प्रेम जागृत हुआ, वह आजीवन एक देशभक्त की तरह कायम रहा। गांधी जी के साथ वे मिले थे , लेकिन उनके जीवन दर्शन और गांधी के जीवनदर्शन में बहुत फर्क था। गुरूदेव ने यदि शातिनिकेतन की स्थापना की तो गांधी ने सावरमती आश्रम की। दोनो ने ही देश तथा समाज के लिये काम किया। गुरूदेव का था एक व्यापक अस्तित्ववोध। इसका आधार था एक बड़ा सूत्र। वह था मै के साथ दूसरे से,प्राणिजगत से नैसर्गिक जगत के साथ युक्त होकर एक वृहत जीवन बोध को तलाशना। ‘ मैं’ इस सत्य के केंद्र से मुक्त होकर समाज, देश और नैसर्गिक पृथ्वी और महाजगत को भी अपने अंदर अंतर्मुक्त कर लेते है। उनकी सामाजिक भावना भी असल में इस दिशा में  प्रयास का एक बड़ा हिस्सा था। समतामूलक सामाजिक व्यवस्था के वे पक्षधर थे। उनकी मृत्यु के सत्तर साल बाद भी यह कायम नहीं हो सका है। वे इतनी दूरगामी दृष्टि रखते थे कि इंसान के कल्याण और जगत के कल्याण की प्रतिभा तलाश लेते थे। 

यही  मानवजीवन की सार्थकता है।भारतीय समाज की मूल समस्याओं मे वर्चस्ववादी दृष्टिकोण और उसका इस्तेमाल। वर्चस्ववादियों द्वारा शोषण । यह विभिन्न रूपों में उभरकर सामने आता है। कभी धर्म के रूप् में तो कभी जाति के रूप में, कभी शिशु पर बड़ों का तो कभी नारी का पुरूष पर, यह अनेक रूपों में है। गुरूदेव के जीवनकाल में भी ये सारी समस्याएं थी और उसे उन्होंने बहुत करीव से देखा। सतीदाह विधवा विवाह आदि के सवाल थे। ये प्रथाएं खत्म हो गयी। ये प्रथाएं अर्थनैतिक कारण से चालू हुए थे। उनकी रचनाओं में भी इसका चित्रण है। अपने पुत्र की शादी एक विधवा के साथ कराकर समाज को एक संदेश देने की कोशिश उन्होंने की थी। मारगेट संगर के साथ हुई चर्चा में उन्होंने जन्म नियंत्रण की चर्चा की थी। उनके इस दृष्टिकोण से नारी का स्वाधीनतावोध तथा सामाजिक उन्नयन की भावना और दूरगामी दृष्टि परिलक्षित होती है।

                            हिन्दु और मुस्लिम के सौहार्द कायम रखने के लिये उन्होंने पल्ली समाज की स्थापना की। सिर्फ मुस्लिम ही नहीं, निम्न श्रेणी के हिन्दु तथा शुद्र जिनकी जनसंख्या अधिक थी तथा ये लोग तथाकथित उच्चवर्ग से प्रताड़ित होते थे। इस दृष्टिकोण से दोनो में विभाजन था तथा वर्गो में बंटे हुए थे। विभिन्न समा समितियों में जातिवादी व्यवस्था पर करारा प्रहार किया और आलोचना की। इस कारण उन्हों आलोचना का भी शिकार होना पड़ा। बंगभंग आंदोलन के दौरान ऐसे लोगों की उन्होंने पहचान की जो आगे तो आये थे लेकिन बाद में पीछे हट गये। इसलिये पल्ली समाज के पुनर्गठन में उन्होंने सभी वर्गो के लोगों को जोड़ा।

                  गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर उच्च शिक्षा में अंग्रेजी भाषा के साथ-साथ मातृभाषा में शिक्षा के पक्षधर थे। अंग्रेजी शिक्षा में शिक्षित नये लोगों को भारतीय सनातन समाज में संनिहित एक्यवोध के प्रति कोई दृष्टि नहीं थी। गुरूदेव का चिंतन था यह धारणा समाज को कमजोर कर देगी। उनकी दिली इच्छा थी कि उच्च शिक्षा में अंग्रेजी के साथ-साथ बंग्ला में भी शिक्षा हो। इसका मुख्य कारण यह था कि अपनी मातृभाषा में किसी चीज को समझना जानना आसान होता है। इससे अपनी उपलव्धि बांटना आसान होता है और दूसरे को भी अपनाना सहज होता है। इसकी आवश्यकता आज भी है।

     उनके जीवन दर्शन से ग्रामोत्थान भी जुड़ा हुआ था। यह सवाल महत्वपूर्ण है कि कैसे इस दिशा में काम शुरू हुए, किस प्रकार चले और इस दिशा में क्या क्या काम हुए? ग्रामोत्थान के लिये उनके सहयोगियों किन तरीको को अख्तियार किया। एक समय सामाजिक क्रांति का प्रतीक रहा ग्रामोत्थान अपने सफर में क्यों दिग्भ्रमित हो गया? यह दर्शाता है कि वे आज के दौर में कितने प्रासंगिक है। गुरूदेव की इच्छा थी सामाजिक उन्नयन का काम निचले स्तर से आरंभ हो। वर्तमान में उनकी सामाजिक चेतना के तीन क्षेत्र हैं- ग्रामोत्थान, हिन्दु- मुस्लिम के बीच सद्भाव और और मातृभाषा में शिक्षा। उनकी सामाजिक भावना  पूरी तरह ग्रामीणउत्थान से जुड़ी हुई है। उनका मकसद था आदर्श ग्राम तैयार करना, अंधविश्वास से मुक्ति दिलाना, पेयजल की सुविधा सुनिश्चित हो तथा खाद्यान्न का अभाव न हो। उनका कहना था कि ‘वे अकेले पूूरी भारत की जवाबदेही नहीं ले सकते हैं। एक या दो गांवों को आदर्श गांव बना सकता हूँ , जिसे देखकर पूरे भारत में आदर्श गांव बनेगा। साथ ही पूरा भारत आदर्श बनेगा।’ ग्रामीण सभ्यता और उनकी गहरी अभिरूचि थी, श्रद्धा और निष्ठा भी। गांवो के पुर्नगठन  का काम उन्होंने अपने जीवन के पहले भाग में ही आरंभ किया। अपने इलाके में 1907-08 में मंडली प्रथा की नींव रखी तथा सियालदह परगना के पांच हिस्सों में विभक्त कर काम की जिम्मेदारी सौंपी। इसके तहत रास्तों का निमार्ण, सफाई और अन्य कार्य थे। अकाल का सामाना करने के लिये  उन्होंने धर्मगोला की स्थापना की जिसकी प्रासंगिकता आज भी है।

    गुरूदेव का मानना था कि आर्थिक उन्नयन के साथ -साथ आत्म उन्नयन भी जरूरी है। इसलिये उन्होने बार-बार सामाजिक विकास की बात की।शांतिनिकेतन और श्री निकेतन उनके इसी दृष्टिकोण का परिचायक है। पश्चिम बंगाल के सुदूर और बंजर गांवों को लेकर उन्होंने अपने काम की शुरूआत की। उन्होंने इसे अंजाम तक पहुॅचाया। आत्मशक्ति समन्वय एवं उन्नयन के प्रयोग उन्होंने  अपनी जमीनदारी से शुरू की और बाद में उन्होनें 1889 में उनके उपर जमीनदारी के काम सौंप दिये। उसके बाद पंचायतीराज की रखी।1892 मे एल्मएस्ट साहव के साथ श्री निकेतन का काम शुरू किया। इसमें सामाजिक ,मानसिक और सांस्कृतिक उन्नयन के काम थे। आरंभिक दौर में तो यह कृषि कार्य से जुड़ा हुआ था। बाद में मछलीपालन ,बागवानी, कुटीर उद्योग, स्वास्थ्य, शिक्षा, लोक शिक्षा आदि जुड़ गये। वीज उत्पादन, जैविक खाद, किसानों के लिये बाजार आदि की व्यवस्था की।1922 में शांतिनिकेतन में जब दवाखाना खोला गया तो उस समय वह इलाका मलेरिया के प्रकोप से आक्रंात था।इलाज में पुरूषों के साथ-साथ महिलाओं ने भी हिस्सा लिया। यह उस दौर के लिये अहम् था।़ऋणदान , समन्वय समिति, क्रेता- बिक्रेता समन्वय समिति, किसान समन्वय समिति आदि का गठन किया। इसके पीछे उनका मकसद था कि आर्थिक रूप से गरीव और अनाथ भी अपने पैरों पर आत्मनिर्भर हो सकें। भारत सरकार गुरूदेव के सभी कामों को अपने कार्यक्रमों में शामिल किया। उन्होंने अपने बेटे और दामाद को अमेरिका कृषि के तरीके सीखने भेजा ताकि दूसरों को इसकी तालीम दे सके।

      सामाजिक उन्नयन के कार्यक्रमों में उन्होंने उत्सव को भी शामिल किया। उत्पादित अनाज बाजारीकृत करने तथा भाईचारा को बढ़ावा देने के लिये उन्होंने बहुत सारे मेलों तथा उत्सव की बुनियाद डाली। ये उत्सव आज भी बंगाल में हो रहे है। बंगभाषियों के सौदर्य कलाप्रियता के कारण ये उत्सव अपनी पूर्णता की ओर है। इसका श्रेय गुरूदेव को ही है। इन सबके वाबजूद उनके ग्राम उन्नयन के काम राह से भटक जाते हैैं। सांगठनिक तौर पर समन्वय का अभाव था। बंगाल के गांवो में उस दौर में गरीबी, सुखाड़ और महामारी था। इसलिये श्रीनिकेतन को कर्मगत पब्लिक सेवा से हटकर सेवामूलक कार्यो की ओर ज्यादा ध्यान देना पड़ा। अकेले मिलनेवाले कामयावी से ज्यादा वेहत्तर है सामूदायिक कामयावी।1955-60 में जब इस प्रकल्प को विश्वभारती और सरकारी कार्यक्रमों से जोड़ दिया जाता है तो श्री निकेतन का ग्रामीण उन्नयन अपनी दिशा से पूरी तरह खो जाता है।

       सामाजिक उन्नयन की विशाल जमीन तैयार की जो परिवर्तन का एक कारगर औजार बना, जिस आधार पर बंगाल का ग्रामीण समाज आज भी खड़ा है। उनके ग्रामीण उन्नयन के अंदर एक साधना थी। अपने प्रयासों से उन्होंने मानवीय मूल्यों की स्थापना की। अकेले इंसान ने 150 वर्ष पूर्व जो पहल की वह अनेक रूपों में परिलक्षित होता है और यही गुरूदेव के दर्शन की मौजूदा दौर की प्रासंगिकता है। काव्य और कर्म के अद्भुत प्रतिभा के धनी थे गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर।  

 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

सोमा विश्वास

युवा हस्ताक्षर 
सोमा विश्वास बांग्ला सिनेमा में प्रोडक्शन मैनेजर
बतौर संस्कृतिकर्मी खासी पहचान  
उनसे फ्लैट नं सी 1- टी 31 अलका आवासन,
 पश्चिम दिगंत,प्रेमिशेस नं-01-0323,
एक्शन एरिया-1,डी,प्लाट नं -डीजे -7,न्यू टाउन,
कोलकाता 700156,मो.-9433465773,9804830084,
 ई-मेल  पर संपर्क किया जा सकता है 

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2 टिप्‍पणियां:

  1. सोमा जी आपने तो गुरूजी के सामाजिक पक्ष और दर्शन को अच्छे से समेट लिया है
    बहुत ही अच्छा लेख है... इससे रविन्द्रनाथ टैगोर के कवि व्यक्तित्व से परे उनके सामाजिक दर्शन को समझा जा सकता है

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत ही तारतम्यता के साथ यह लेख लिखा गया है . आपने गुरुदेव को 'गुरुदेव' बनाने वाले तत्वों पर प्रकाश डाल कर तथ्य को सामाजिक,सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टिकोण से मजबूती प्रदान की है. गुरुदेव के बारे में एक नई जानकारी के साथ आपका उपस्थित होना आपकी गंभीर लेखन कौशल को दर्शाता है. इसके लिए सोमा जी को बहुत-बहुत बधाई !

    उत्तर देंहटाएं

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