हर आदमी के पास बहुत कम फ़ु़र्सत बची है - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित ई-पत्रिका

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हर आदमी के पास बहुत कम फ़ु़र्सत बची है

  •  मूल्य संक्रमण के दौर में भारत'
  • डॉ. सदाशिव श्रोत्रिय का निबंध 
हमारा देश इस समय मूल्य संक्रमण के एक विशेष दौर से गुज़र रहा है। नैतिक-अनैतिक की हमारी अनेक पारम्परिक परिभाषाएं अब बदल रही हैं। बाल-विवाह, छुआछूत आदि अब सामाजिक अपराध की श्रेणी में आ गए हैं, जबकि गर्भ समापन जैसे कृत्य से पहले कभी जुड़ा नैतिक व सामाजिक अपराध बोध अब धीरे-धीरे समाप्त होने लगा है और इस तरह यह कृत्य अब बहुत कुछ नैतिकता के दायरे में आ गया है। भौतिक उपलब्धियों का  महत्त्व हमारे सामाजिक व पारिवारिक जीवन में अब इस तरह बढ़ रहा है कि उनकी ओर से बेफ़िक्र आदमी के लिए अब लोगों के मन में कोई प्रशंसा का भाव शेष नहीं रह गया है। त्याग, अपरिग्रह, सादगी और मितव्ययिता जैसी अवधारणाओं का पहले की तुलना में अब काफ़ी अवमूल्यन हो चुका है। हमारे पारिवारिक ढांचे में जो परिवर्तन हो रहे हैं, उनके कारण हमारे परिवारों के विभिन्न सदस्यों की पहले वाली अपेक्षाओं की पूर्ति हो पाना अब दिनों-दिन असम्भव होता जा रहा है। शहरों के विस्तार, नौकरियों की भाग-दौड़ और बढ़ते समयाभाव ने अपने लोगों की परवाह के लिए भी अब हर आदमी के पास बहुत कम फ़ु़र्सत छोड़ी है। अपने पद और कैरियर को सर्वोच्च स्थान देने वाले कर्मचारी के लिए अपने नियोक्ता के प्रति वफ़ादारी और वचनबद्धता की चिन्ता करना अब बहुत ज़रूरी नहीं समझा जाता। खोजी पत्रकारिता का एक अर्थ किसी का विश्वास प्राप्त कर उससे जाने गए गोपनीय तथ्यों को सबके सामने प्रकट कर देना भी हो सकता है। हमारे देखते-देखते पर्यटन के नाम पर आतिथ्य का और अनेकानेक शिक्षण संस्थाओं के नाम पर ज्ञान का जो व्यावसायीकरण हुआ है, उसने आतिथ्य व ज्ञान के सम्बन्ध में हमारे पारम्परिक मूल्यों की जैसे धज्जियां ही उड़ा दी हैं।

किन्तु पुराना अभी भी पूरी तरह लुप्त नहीं हुआ है और नया अभी पूरी तरह आकार नहीं ले पाया है। इसीलिए हमारे पारम्परिक मूल्यों की दुनिया में जीने वाले और अन्य लोगों से भी तदनुरूप अपेक्षाएं रखने वाले लोगों के दिमाग की नसें मूल्य परिवर्तन के इस दौर में कई बार तड़कने लगती हैं। विडम्बना यह है कि बाह्य परिवर्तन जितनी तेज़ी से होते हैं उतनी तेज़ी से मानव प्रकृति में बदलाव सम्भव नहीं है।

    शाश्वत और सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों की सुरक्षा किसी भी समाज के लिए मूल्य परिवर्तन की स्थिति में नितान्त आवश्यक है, क्योंकि उनका लोप हो जाने से मनुष्य मनुष्य न रहकर पशु की श्रेणी में आ जाएगा। दया, सहानुभूति, अहिंसा, विश्वसनीयता, प्रेम, कर्त्तव्यपरायणता, परोपकार, उदारता या ईमानदारी में कमी आना किसी समाज की पतनोन्मुखता का लक्षण है, इससे कभी भी कोई इन्कार नहीं कर सकता। इसीलिए उन बलों पर अंकुश लगाना अत्यन्त आवश्यक है जो इन सर्वकालिक और सर्वस्वीकृत मानवीय मूल्यों को किसी भांति क्षति पहुंचाते हैं। यदि किसी समाज में भ्रष्टाचार को व्यापक सामाजिक मान्यता मिल जाए और यदि उसमें ईमानदारी व अहिंसा की तुलना में बेईमानी व हिंसा मोटे तौर पर अधिक सफल होने लगे, तो यह उस समाज को रोगग्रस्त मानने के लिए काफ़ी है। अच्छे पर बुरे की लगातार जीत आम आदमी का हौसला पस्त करती है और उसमें एक पराजयवादी सोच की सृष्टि करती है। अश्लीलता और नग्नता का अत्यधिक प्रदर्शन इसलिए कभी भी उचित नहीं कहा जा सकता कि वह जनसामान्य के उस सांस्कृतिक परिष्कार में बाधा उत्पन्न करता है जिसके द्वारा अधिक अन्तरंग और गहन आत्मिक प्रेम की कल्पना कर पाना सम्भव होता है। किसी देश के मीडिया द्वारा अधिकाधिक क्रूरतापूर्ण दृश्यों का प्रदर्शन मानवीय पीड़ा के प्रति मनुष्य की संवेदनशीलता को कम करके निश्चय ही उसके निवासियों को अधिक कठोर व हृदयहीन बनाएगा। प्राचीन नाट्यशास्त्र में किसी मंच पर हिंसापूर्ण व जुगुप्साजनक दृश्यों का इसी कारण निषेध किया गया था कि उनका मंचीय प्रदर्शन सामान्य जीवन में भी वैसे दृश्यों के प्रति दर्शकों की प्रतिक्रिया को प्रभावित किए बिना न रहेगा।

यह सच है कि बाह्य परिस्थिति में परिवर्तन के साथ-साथ आने वाले सामाजिक मूल्यों के परिवर्तन को पूरी तरह टाला नहीं जा सकता, किन्तु किसी समाज को पतनोन्मुख होने से बचाने के लिए पुराने, अप्रासंगिक और ध्वस्तप्राय मूल्यों के स्थान पर किन्हीं नए और स्वस्थ मूल्यों की प्रतिष्ठा आवश्यक है।

इन नये मूल्यों का स्वरूप निरूपण कौन लोग कर सकते है? निश्चय ही केवल वे लोग, जो किसी समाज के कल्याण में वास्तविक रुचि रखते हैं, जो इसके लिए अपने व्यक्तिगत लाभों से ऊपर उठकर सोच सकते हैं, जिनके दिलों में मानव मात्र के प्रति गहरी सहानुभूति है, जो कूपमंडूक नहीं है, जो यथार्थ को कई भिन्न-भिन्न कोणों से देखने में समर्थ हैं और जिन्हें भविष्य की पदचाप बहुत कुछ स्पष्ट सुनाई  देती है। केवल ऐसे ही लोगों से कोई समाज उसमें हो रहे परिवर्तनों के सही-सही विश्लेषण की अपेक्षा रख सकता है। किसी समाज के पारम्परिक मूल्यों में जो श्रेष्ठ व वरेण्य है उसकी रक्षा तथा नये में भी जो उत्तम व ग्रहणीय है उसे उनमें समाहित करते हुए उस समाज को पतनोन्मुख होने से बचा सकने वाले मूल्यों की पुनर्प्रतिष्ठा की उम्मीद भी केवल ऐसे ही लोगों से की जा सकती है।

नये मूल्यों की प्रतिष्ठा के नाम पर किसी समाज के स्वार्थी तत्त्व जब अपना कार्य करना चाहते है तब वे उस समाज को मज़बूत बनाने की अपेक्षा उल्टे उसे अधिक विशृंखल बना देते हैं। ऐसे स्वार्थी लोग छद्म प्रगतिवादिता व समानता के नाम पर अनुशासनहीनता, व्यक्ति स्वातंÛय के नाम पर उच्छृंखलता, सामाजिक न्याय के नाम पर अयोग्य की पद प्रतिष्ठा, दमन मुक्ति के नाम पर कामचोरी व अकर्मण्यता और अन्याय के संगठित विरोध के नाम पर अव्यवस्था को प्रोत्साहन देते हैं।

ऐसे लोग यथार्थवाद के नाम पर हिंसा व क्रूरता तथा आधुनिकता व खुलेपन के नाम पर नग्नता व अश्लीलता का प्रदर्शन करके मानव की पाशविक व निम्नतर प्रवृत्तियों को उभारकर उनका आर्थिक शोषण करने की चेष्टा करते हैं। जो लोग अपने परिवार, अपने मित्रों और अपने दल के स्वार्थों से ऊपर उठकर बृहत्तर सार्वजनिक हितों की कल्पना करने में समर्थ हैं और जो समष्टि को व्यष्टि से ऊपर रख कर देखते हैं, केवल उन्हीं के द्वारा मानव के लिए वास्तविक रूप से कल्याणकारी मूल्यों की कल्पना कर पाना और समाज में उन्हें स्थापित कर पाना सम्भव है।

यह कोई अच्छी बात नहीं कि नये और अधिक प्रासंगिक मूल्यों के नाम पर नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी के मूल्यों को सर्वथा नकार दे। यदि अनुभवहीन नई पीढ़ी अनुभवी पुरानी पीढ़ी को चुप रहने को विवश कर दे, यदि बच्चे बुजुर्गों को अनावश्यक सीख देने लगें और यदि छात्र ही अपने अध्यापकों के मार्गदर्शन का बीड़ा उठा लें, तो शायद उस प्रक्रिया में ही विपर्यय आ जाएगा जो मानव की आज तक की समूची प्रगति के मूल में रही है।  पुरानी पीढ़ी को यथोचित आदर देकर उनके अनुभवों से लाभान्वित हुए बिना किसी भी नई पीढ़ी के लिए बदलती हुई परिस्थितियों में सही मार्ग खोज पाना कठिन होगा।

मानव स्वभाव की श्रेष्ठतम उपलब्धियाँ जो उसे पशु से अलग करती हैं, विश्वजनीन और शाश्वत मानवीय मूल्यों के मूल में रही हैं। शायद यही कारण है कि मूल्य परिवर्तन के किसी भी दौर में उनकी अनुगूंज अन्ततः समूची मानवता को सुनाई दे जाती है। शायद यही कारण रहा होगा कि ऐसे समय में, जबकि दुनिया तेजी से युद्ध, हिंसा और भौतिकता के मार्ग पर आगे बढ़ रही थी, कई देशों के करोड़ों लोगों को गांधीजी के बताए मूल्यों व सिद्धान्तों में आशा की एक नई किरण नज़र आई थी।                              




 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
डॉ.सदाशिव श्रोत्रिय
नई हवेली,नाथद्वारा,राजस्थान,मो. 08290479063 ,ई-मेल
(स्पिक मैके,राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य रहे डॉ. श्रोत्रिय हिंदी और अंग्रेजी में सामान रूप से लिखने वाले लेखक हैं.ये निबंध उनके हालिया प्रकाशित  निबंध संग्रह 'मूल्य संक्रमण के दौर में' से साभार लिया गया किया है,जो मूल रूप से   रचनाकाल: दिसम्बर, 1996 में प्रकाशित हुआ था. ये संग्रह प्राप्त करने हेतु बोधि प्रकाशन से यहाँ mayamrig@gmail.com संपर्क कर सकते हैं. )

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