डॉ. नन्द भारद्वाज की डायरी में रवीन्द्रनाथ ठाकुर - अपनी माटी Apni Maati

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डॉ. नन्द भारद्वाज की डायरी में रवीन्द्रनाथ ठाकुर


रवीन्द्रनाथ ठाकुर-छायाचित्र गूगल से -साभार 

 पिछले दो-तीन सप्‍ताह बेहद सार्थक गुजरे। विगत 7 मई से 9 मई तक रवीन्‍द्र मंच सोसाइटी और नाट्यकुलम संस्‍था ने गुरूदेव रवीन्‍द्रनाथ ठाकुर के 150 वें जयन्‍ती वर्ष पर एक राष्‍ट्रीय संगोष्‍ठी का आयोजन रखा था। इस संगोष्‍ठी के सिलसिले में जब भारतरत्‍न भार्गव ने मेरे सारे सुझावों को एक तरफ कर मुझ पर यह जिम्‍मेदारी डाली कि इस संगोष्‍ठी के सभी सत्रों का संयोजन दायित्‍व मुझे संभालना है, तो एकबारगी तो मैं चिन्‍ता में पड़ गया। मुझे जरूरी लगा कि इसके लिए मुझे गुरूदेव के साहित्‍य को दुबारा से चित्‍त लगाकर पढ़ना होगा और मैंने बगैर समय गंवाए उनकी कविताओं, कहानियों, उपन्‍यासों, नाटकों और निबंधों की किताबों को बटोर कर अपनी स्‍टडी टेबल पर जमा लिया और एक सिरे से शुरू हो गया। इस मामले में मेरा निजी संग्रह मुकम्‍मल है। सबसे पहले साहित्‍य अकादमी द्वारा प्रकाशित रवीन्‍द्र रचना संचयन से मैंने शुरुआत की जो 820 पृष्‍ठों का एक बेहतरीन संचयन है, इसमें उनके काव्‍य, कथा, नाटक और गद्य विधा की प्रतिनिधि रचनाएं हैं।

अधिकांश पढ गया। फिर उनके उपन्‍यास 'गोरा' और 'आंख की किरकिरी' को क्रमश पढना शुरू किया - अभिभूत कर दिया इन दोनों क्‍लासिक कृतियों ने। दोनों को बरसों पहले पढ़ा था, लगभग भूल-सा गया था, और तब उनके महत्‍व को इस तरह नहीं समझ पाया था, ये दोनों रचनाएं गुरूदेव की मेधा और रचनाशीलता का शिखर हैं। गोरा जहां पुनर्जागरण काल की एक महान रचना है, जो धर्म, दर्शन और समाज-व्‍यवस्‍था की बारीकियों को कथा के माध्‍यम से प्रस्‍तुत करती है। वहीं 'आंख की किरकिरी' में नारी के अन्‍तर्द्वन्‍द्व को गुरुदेव ने जिस गहराई से विवेचित किया है, जिस तरह विनादिनी के चरित्र के माध्‍यम से स्‍त्री प्रश्‍नों को आकार दिया है, सचमुच बेजोड़ है। उनकी कहानियों में 'जीवित और मृत' और ''पत्‍नी का पत्र' इस संवेदना को और सघन बनाती हैं। 'क्षुधित पाषाण' काबुलीवाला, नष्‍ट-नीड़ और नाटकों में 'विसर्जन', डाकघर, राजा, चित्रांगदा और बांसुरी को पढ़ते हुए बराबर मैं भारत के प्रति मन ही मन कृतज्ञता व्‍यक्‍त करता रहा कि उन्‍होंने अनजाने ही मुझ पर कितना बडा उपकार कर दिया है। इसी बीच गुरूदेव की रचनाओं के राजस्‍थानी अनुवाद भी पढे। बरसां पहले रामनाथ व्‍यास परिकर का किया 'गीतांजलि' का अनुवाद पढा था और उसने मुझे बिल्‍कुल प्रभावित नहीं किया था, लेकिन हाल ही में मालचंद तिवाड़ी ने जो अनुवाद किया है, वह अद्भुत है। राजस्‍थानी में गुरूदेव की कहानियों के भी अनुवाद हो चुके हैं। 


गुरूदेव को पढकर अपने भीतर एक अलग तरह की तृप्ति अनुभव कर रहा था, उसी क्रम में जब तीन दिवसीय संगोष्‍ठी शुरू हुई, तो उससे एक सप्‍ताह पहले भारतजी से निवेदन करके अपने काम को साथी रचनाकारों में बांट लिया, जिसमें दुर्गाप्रसाद अग्रवाल, हेमंत शेष और गोविन्‍द माथुर से कुछ संयोजकीय प्राप्‍त हो गया, हेत भारद्वाज और डॉ सुदेश बत्रा ने गुरूदेव के रचनाकर्म पर अपने अपने व्‍याख्‍यान तैंयार कर लिये। वाराणसी से आये संस्‍कृत और भारतीय संस्‍कृति के जाने माने विद्वान प्रो कमलेशदत्‍त त्रिपाठी और दिल्‍ली से पधारे रवीन्‍द्र साहित्‍य के अन्‍यतम व्‍याख्‍याता डॉ इन्‍द्रनाथ चौधरी को सुनना अपने आप में एक अनुभव रहा। 

 स्‍थानीय विद्वानों में मुकुन्‍द लाठ ने रवीन्‍द्र संगीत के शास्‍त्रीय पक्ष पर और विजय वर्माजी ने रवीन्‍द्र संगीत के भारतीय संगीत पर उसके व्‍यापक प्रभाव को अपनी सोदाहरण वार्ता के माध्‍यम से इतना रोचक ढंग से प्रस्‍तुत किया कि रवीन्‍्द्र संगीत के बहुआयामी प्रभाव को हम बेहतर ढंग से समझ सके। इस आयोजन की एक बडी उपलब्धि यह भी रही कि गुरूदेव के चार नाटकों को मंच प्रस्‍तुति के माध्‍यम से देखने का सौभाग्‍य मिला। इसी आयोजन के दौरान रवीन्‍द्र के चित्रकला पक्ष पर सुमहेन्‍द्रजी, विद्यासागर उपाध्‍याय और राजेश व्‍यास ने इतनी खूबसूरत व्‍याख्‍याएं प्रस्‍तुत कीं, जो उनकी कला को जानने-समझने की दृष्टि से बेहद उपयोगी रही। कुल मिलाकर ये पिछला एक महीना लगभग गुरूदेव के सान्निध्‍य में ही बीता और लगा कि कुछ सार्थक पढ़ा-समझा।


 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

डॉ. नन्द भारद्वाज
कवि और राजस्थानी साहित्यकार के रूप में ख्यात है। पिछले चार दशक से मैं हिन्दी और राजस्थानी में अपने लेखन-कार्य से जुडाव है।हमेशा से श्रेष्ठ लेखन के कलमकार जो हाल ही में अपने नए कविता संग्रह 'आदिम बस्तियों के बीच' से खासी चर्चा में है.अपनी माटी वेबपत्रिका के सलाहकार भी हैं .साहित्य के हल्के में बड़ा नाम है।आकाशवाणी और दूरदर्शन में पूरी उम्र निकली है।सेवानिवृत वरिष्ठ निदेशक,दिल्ली दूरदर्शन केंद्र,जयपुर . ब्लॉग है .हथाई,  उनका पूरा परिचय 

1 टिप्पणी:

  1. अरे वाह, आपको आभार माणिकजी। 'अपनी माटी' वाकई अपनी साबित हो रही है। यह हमारे बीच गतिविधियों और संवाद को प्रभावी बनाने का माध्‍यम बने, इस काम में आपकी और टीम की सक्रियता सराहनीय है। मेरे योग्‍य जो भी सेवा हो, निस्‍संकोच कहें। शुभकामनाएं।

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