'विश्व मातृत्व दिवस':सारी कायनात है माँ ! - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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'विश्व मातृत्व दिवस':सारी कायनात है माँ !


(विश्व मातृत्व दिवस पर    की 'माँ' शीर्षक कविता के साथ कुछ और ज़रूरी रचनाएं पेश है।खासकर जिसके स्नेह संसार को हम नहीं भुलाना चाहते है उन तमाम पालनहारियों को हमारा आदर -सम्पादक )

 (1)माँ

कोख में सहेज
रक्त से सींचा
स्वपनिल आँखों ने
मधुर स्वपन रचा
जन्म दिया सह दुस्तर पीड़ा
बलिहारी माँ देख मेरी बाल-क्रीड़ा !

गूँज उठा था घर आँगन
सुन मेरी किलकारी
मेरी तुतलाहट पर
माँ जाती थी वारी-वारी !

उसकी उँगली थाम
मैंने कदम बढ़ाना सीखा
हर बाधा, विपदा से
जीत जाना सीखा !

चोट लगती है मुझे
सिसकती है माँ
दूर जाने पर मेरे
बिलखती है माँ !

ममता है, समर्पण है
दुर्गा-सी शक्ति है माँ
मेरी हर ख़ुशी के लिए
ईश की भक्ति है माँ !

माँ संजीवनी है
विधाता का वरदान है
जिंदगी के हर दुःख का
वह अवसान है
प्रभु का रूप
उस का नूर है माँ
एक अनमोल तोहफा
सारी कायनात है माँ !

 (2)मज़दूर भाइयों को ससम्मान समर्पित........

मर-मर के जीना !

दिहाड़ी का मज़दूर
कोसता है हड़ताल को
बंद को, चक्का जाम को!
नहीं निकल पाता घर से
नहीं बनती उसकी दिहाड़ी
नहीं जलता चूल्हा
जलते हैं पेट !
दुत्कार देता है सेठ
अगाड़ी ना पिछाड़ी
संबंध बनते हैं माया से
जान गया है वो
मायावी दुनिया से !


  
 (3)गरीब किसान
लेता है कर्ज़
बोता है बीज आशाओं के
फूटता है अंकुर
खिलता है चेहरा
लहलहाती फ़सल
हरिया देती है उसे
मेघ दगा दे जाते हैं
उमड़-घुमड़ बिन बरसे
निकल जाते हैं
देख सूखती फ़सल
सूख प्राण जाते हैं !



 (4)पटरी पर बैठे दुकानदार
बेचें सौदा छुट-पुट हज़ार
बुलाएँ गाहक पुकार-पुकार
इनफ़लेशन में मंदा है बाज़ार
देख म्यूनिसिपैलिटी की गाड़ी
निकल जाते हैं प्राण
आँखों के आगे से
उठ जाती है उनकी मिल्कियत
देखते रहते निरीह गूँगे से
थक गए हैं लुट-लुट कर जीने से
कब तक लड़ना होगा भाग्य से
बाज आए मर-मर के जीने से !


 (5)फिर भी .......

इनका जीना ज़रूरी है
ताकि चंद लोग
जी सकें भरपूर !


 (6)ज़िंदगी

मृगतृष्णा.
नखलिस्तान..
किन-किन रूपों में बुलाती
लुभाती हो ज़िंदगी
दौड़ती हूँ बाँहों में भर लूँ
कुछ पल जी भर जी लूँ
सजाए थे सपन
हकीकत कर लूँ
अरमां से बढ़े कदम
तृप्ति की अभिलाष
मगतृष्णा ही रही तुम
कायम रही प्यास !


 (7)आओ सारे बंधन तोड़ें

आओ सारे बंधन तोड़ें
बंधन पीर दे जाते हैं
आज बादलों संग उड़ें
देह वसन दे जाते हैं !

विचरेंगे जब अनंत गगन
मन में लिए तेरी लगन
खुदी में होंगे हम मगन
रूहों का संगम, नहीं बदन !

जन्म-मरण का फेरा होगा
अपनी साँझ सवेरा होगा
वहाँ बंदिशों का घेरा होगा
चँदा तारों में बसेरा होगा !

झिलमिल तारे अँगना होंगे
पिछवाड़े हरसिंगार झरेंगे
नित खुशबुओं के डेरे होंगे
सीले झोंके पुरवाई होंगे !

अनंत व्योम विस्तार होगा
छूटा निर्मोही संसार होगा
हर दुख का निस्तार होगा
शाश्वत प्रेम अपार होगा !

रूह को रूह जब पाएगी
सारी सृष्टि खिल जाएगी
दिव्य गीत कोई गाएगी
पावन प्रीत मुस्काएगी !

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
सुशीला शिवराण
(जन्म से झुंझूनू राजस्थान की सुशीला जी लिखने-पढ़ने वाली रचनाकार हैं.मुंबई और कोच्ची में नेवल पब्लिक स्कूल, बिरला पब्लिक स्कूल, पिलानी, डी.ए.वी. गुड़गाँव से अपनी शिक्षण-यात्रा करते हुए 
आजकल सनसिटी वर्ल्ड स्कूल,गुड़गाँव में अध्यापनरत.
सालों से अध्यापकी कर रही है.
दूजी रुचियों में खेल और भ्रमण शामिल हैं.
इनसे संपर्क हेतु उनके ब्लॉग 
और ई-मेल पर जुड़ेगा.)
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