यह दिल्ली है जब जहां जो काम हो सके तुरंत कर लो @ 'डाक का डिब्बा' - अपनी माटी Apni Maati

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यह दिल्ली है जब जहां जो काम हो सके तुरंत कर लो @ 'डाक का डिब्बा'

युवा आलोचक पल्लव
का आलेख '
डाक का डिब्बा'

आज हम पाठक हित में
जनसत्ता के ग्यारह 

मई,2012 अंक
से साभार यहाँ छाप रहे हैं।
जो इस बदलते दौर
में हमें फिर
से डाक के डिब्बे की
विलुप्ति के कगार पर
होने के बारे में
सोचने को मज़बूर
करता है-
सम्पादक 
दिल्ली में डाक का डिब्बा ढूंढना आसान नहीं है. कम से कम उन लोगों के लिए जो शहर में बहुत पुराने नहीं हो गए हैं. मुझे चिट्ठियाँ लिखने का शौक है लेकिन मुसीबत यह कि थोक  में पोस्ट कार्ड तो खरीदे जा सकते हैं लेकिन डालने के लिए बार बार डिब्बा कहाँ से लाया जाए. मैं जिस इलाके में रहता हूं ,वहां के डाकघर का यह आलम है कि डाकघर के बाहर भी डिब्बा नहीं है पूछने पर कर्मचारी मुस्कुराते हुए चिट्ठियाँ स्वयं हाथ में ले लेते हैं. असली बात यह है कि जिस गति से आबादी का विस्तार हुआ है  क्या उसके अनुपात में दिल्ली में डाकघर,पुस्तकालय,खेल के मैदान/सुविधाएं बन सके हैं? हमारी साढ़े पांच सौ फ्लेट्स की सोसायटी के ठीक सामने इतनी ही बड़ी एक सोसायटी है, बीच में एक बड़ा अस्पताल और इसके दायरे में कहीं कोई डाक का डिब्बा मिल जाए तो आप सचमुच सौभाग्यशाली हैं. जब मैंने अपनी सोसायटी के पदाधिकारियों के ध्यान में यह बात लाई तो सहमति के स्वर के बावजूद उनके चेहरे पर कुछ ऐसा भाव था कि यह बेचारा अब तक डाक के डिब्बे के चक्कर में पड़ा है जबकि देखों मेल, मोबाइल,फोन और जाने क्या क्या साधन गए हैं. तो कुछ नहीं हुआ. आमतौर पर मान लिया जाता है कि अब कौन चिट्ठी लिखता है, ज़रा अपने डाकिये से पूछिए तो? हाल यह है कि चिट्ठियाँ भले कम हुईं हों डाकिये का काम कम नहीं हुआ. क्योंकि पत्रिकाएं बढ़ी हैं,ख़त के अलावा तमाम तरह की डाक सामग्री में इजाफा ही हुआ है.

जब मैं इस शहर में नया नया आया था एक बार तो ऐसा हुआ कि डाक का डिब्बा दिखाई दिया तब यह सोचकर कि आगे कहीं डाल देंगे,चलता गया और आगे डिब्बा कहीं नहीं था. मैंने अपने एक मित्र को यह बताया तो वे कहने लगे,बेटा इसलिए तो यह दिल्ली है जब जहां जो काम हो सके तुरंत कर लो. अब मैं अपने उन मित्र से यह कैसे समझूं कि जो चीज़ कहीं है ही नहीं उसे आपकी दिल्ली कैसे संभव बनायेगी?   

अखबारों में समाचार आया था कि नई दिल्ली मेट्रो स्टेशन पर यात्रियों की सुविधा के लिए स्पीड पोस्ट का एक काउंटर खोला जा रहा है, क्या ही अच्छा हो हर मेट्रो स्टेशन के प्रवेश द्वार पर डाक का डिब्बा तो लगा ही दिया ही जाए. मेट्रो से सबका वास्ता पड़ता है जब वहां बिजली के बिल जमा करवाने के और तमाम तरह के दूसरे डिब्बे लगाए जा सकते हैं तो एक डिब्बा डाक का क्यों नहीं? इसी तरह पोस्टकार्ड/अंतर्देशीय की बिक्री को भी सुलभ बनाया जाना चाहिए. यह एक समाज की ही मंशा पर निर्भर है कि वह अपने यहाँ कैसी रवायतें बनाना चाहता है. हिन्दी पट्टी के नागरिक संस्कृति की सबसे ज्यादा चिंता करते हैं तो भला वह कैसी संस्कृति कि जिसमे लिखने /पढने के निजी सिलसिले बनाने की जगह ही ख़त्म होती जा रही हो?

'पिता के पत्र पुत्री के नाम'  और 'मित्र संवाद' (रामविलास शर्मा और केदारनाथ अग्रवाल के मध्य पत्र व्यवहार) जैसी पुस्तकें अब शायद कभी भी लिखना संभव हो सके. क्या यह चिंता की बात नहीं कि अब चिट्ठी लिखना स्कूली बच्चों के लिए एक 'प्रोजेक्ट' हो गया है. प्रोजेक्ट भी ऐसा कि ताऊ,चाचा,मौसी या मित्र को लिखी जाने वाली चिठ्ठी की दूसरी पंक्ति में बच्चे पूछने लगते हैं अब आगे क्या लिखूं? यह तो अब कोई भी नहीं मानेगा कि स्पिक मैके जैसे संगठनों में अभी पंद्रह-बीस साल पहले तक बगैर फोन के डाक से ही शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रमों की सारी तैयारी हो जाती थी. इसी तरह एक नयी प्रवृत्ति हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता में भी आती जा रही है और वह यह कि यहाँ रचना के अंत में लेखक के पते की जगह केवल मोबाइल/फोन नंबर देकर ही काम चला लिया जाता है अर्थात मान लिया गया है कि कोई चिट्ठी नहीं लिखेगा और फिर सितम सम्पादकीय के अंत में यह पंक्ति कि ''आप इस अंक पर अपनी प्रतिक्रिया दें तो खुशी होगी''.  मतलब पत्रिका से संवाद करें लेखक से नहीं.

अज्ञेय ने जिस डिब्बे को अपनी कविता में कभी उपयोग सुन्दरी कहा था, उसकी तलाश जाने कैसे पूरी हो,तब तक मेरे मित्र महीने भर पुराने लिखे पोस्ट कार्ड को पाकर डाक वितरण को दोष दे सकते हैं, जिनका कोई दोष नहीं.

 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
पल्लव
युवा आलोचक और 'बनास जन' पत्रिका के सम्पादक हैं.
वर्तमान में हिंदी विभाग,हिन्दू कोलेज में सहायक आचार्य हैं.
मूल रूप से चित्तौड़ के हैं ,अब दिल्ली जा बसे हैं.
'संभावना' संस्था के संयोजक हैं.उनका पता है.
फ्लेट . 393 डी.डी..
ब्लाक सी एंड डी
कनिष्क अपार्टमेन्ट
शालीमार बाग़
नई दिल्ली-110088
 मेल pallavkidak@gmail.com

1 टिप्पणी:

  1. With the auspicious 9 days of Navratri Puja, comes the time to worship the holy goddess and seek her blessings in life to achieve big things. Get rid of all hardships in life with the choicest blessings from Maa Durga and her 9 avatars. Navratri Puja

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