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डा. मनोज श्रीवास्तव की कहानी 'एक और प्रहलाद'

Written By Manik Chittorgarh on बुधवार, मई 23, 2012 | बुधवार, मई 23, 2012


(कहानी) 
शहर का वह हिस्सा इतना अलग-थलग था कि प्रायः ऐसा लगता था कि वह इस शहर से बाहर का कोई अज़नबी इलाका है। शहर ही नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश का, या यूँ कहिए कि इस देश का ही हिस्सा नहीं है। वहाँ का कोई बाशिंदा जब भी अचानक कहीं नज़र आ जाता है तो हम बरबस ही खुद से भुनभुनाने लगते हैं कि हो-न-हो यह शख्स दीवानगंज का ही निवासी होगा! हमारा यह अनुमान सही निकलता जब वह हमारी घूरती निग़ाहें बचाकर किसी गली या भीड़ में छिप जाने की कोशिश करता।

यह तय है कि वहाँ का आदमी ही नहीं, बल्कि सारी आबोहवा विदेशीपन के लिबास से ढँकी हुई थी। वहाँ एक सरहद-सी खिंची हुई लगती थी जहाँ की पहाड़ियों पर खड़े होकर आसमान देखना ही कुछ अज़ीब-सा लगता था। जैसेकि आसमान भी बड़ी ग़ैरियत से चेतावनी दे रहा हो कि सरहद लाँघने की ढिठाई मत करना; वर्ना, दूसरे वतन यानी दुश्मन की जमीं पर कदम रखने का अंजाम जानते ही हो कि क्या होता है...

दीवानगंज से सनसन आने वाली ख़ामोश हवा भी यह आग़ाह करती थी कि वहाँ हादसे होना एक आम बात है। मैं दो घरों में डेढ़ दर्जन मासूमों के जलाए जाने, कम से कम आठ जवान औरतों का बलात्कर कर हलाख़ किए जाने और कुछ मंदिरों से मूर्तियों की तस्करी किए जाने की सनसनीखेज ख़बर लाई हूँश्व्” 

बेशक! हवा के हर झोंके से ख़ौफ़, साँप के ज़हर की तरह बदन में फैलने लगता और धीरे-धीरे इसे सुन्न-सा करने लगता। पर, कईगुना रफ़्तार से धड़कते दिल का एहसास कभी कम नहीं होता!

दीवानगंज की उस काल्पनिक सरहद से कोई चार मील दूर, शहर का सदर बाजार शुरू होता है। रोज शाम को सदर चौराहे पर लोगों की कानाफ़ुसियों से दीवानगंज में पिछली रात को हुई घटनाओं का खुलासा होता है। जब आठ बजे से पहले कलक्टर के आदेशों के तहत दुकानों के धड़ाधड़ बंद होते ही भीड़ अपने पीछे गुमसुमी का माहौल छोड़ जाती है तब वहाँ रिज़र्व पुलिस और मिलिटरी के जवानों की सिर्फ़ जमघट ही नज़र आती है। बीच-बीच में कुत्तों की भौंकाहट ख़ामोशी के सीने को चीरकर माहौल को लहूलुहान कर जाती है।

आठ बजे से एक-डेढ़ घंटे पहले सदर बाजार का बंद होना लाज़मी है। दूर के गाँवों से आए निरीह औरत-मर्दों को जल्द से जल्द घर पहुँचने का भय सताने लगता है। लगभग नौ बजे देश की सीमा से दीवानगंज के दहशतगर्दों की बेधड़क आवाजाही शुरू हो जाती है। साथ में, शुरू हो जाती है हथियारों, गोला-बारूदों, नशीले पदार्थों और चोरी के सामानों की तस्करी। इस काम में सीमा पर तैनात सिपाहियों की मिलीभगत कुछ कम नहीं होती। इन मुट्ठीभर देशद्रोहियों की वज़ह से ही इस देश को दहशतगर्दी से निज़ात नहीं मिल पा रहा है।

आज सदर चौराहे पर कानाफ़ुसियों का बाजार गर्म है। दीवारें तक चौकन्ना होकर सुन रही हैं कि दीवानगंज का तथाकथित ज़ेहादी सरगना बख़्तियार खान के घर कुछ अप्रत्याशित-सी घटनाएँ घट रही हैं।

हुसैन की आवाज़ भीड़ की फ़ुसफ़ुसाहट को भेदकर कानों को स्तब्ध कर देती है, "अब, बख़्तियार की बरबादी के आसार नज़र आने लगे हैं। उसकी शानो-शौकत के दिन लद गए हैं। उसके घर का ही चिराग़ उसे और उसकी ग़ुरूर को जलाकर राख करने पर आमादा है... ” 

भीड़ के माथे पर सवलिया लकीरें उभर आती हैं, "आख़िर, बख़्तियार की मासूम औलाद से उसका क्या बिगड़ने वाला है? उसकी उम्र तो कुल चौदह साल की ही है... ”

हुसैन भीड़ को समझाता है, "फरीद मतलब बख़्तियार के जिगर का टुकड़ा जो उसके सारे मंसूबों पर पानी फेरता जा रहा है... ”

तभी कुछ फर्लांग दूर पर गोलियों की दनादन धाँय-धाँय सुनाई देती है। ऐसा तब होता है जबकि बख़्तियार के गुर्गे सदर के रास्ते गुजरते हुए अपने आने की चेतावनी देने के लिए हवाई फायर करते हैं। 

हुसैन अपने लफ़्ज़ मुँह में ही ज़ब्त कर लेता है। वह भागकर अपनी पतंग की दुकान को फटाफट बंद करता है और सिर पर कोई बंडल लिए हाँफ़ता हुआ भागता है। दूसरी दुकानें भी धड़ाधड़ बंद होती हैं। लोगबाग सिर पर पैर रखकर भागते हुए पूरे सदर बाज़ार को इस तरह जनशून्य कर जाते हैं जैसेकि वहाँ हफ़्तों से आदमी के पाँव न पड़े हों। वहाँ तैनात वर्दीधारी जवान गलियों, गुमटियों और आधे-अधूरे बंद दुकानों की ओट में किसी अप्रत्याशित स्थिति से निपटने के अंदाज़ में पोजीशन लेकर खड़े हो जाते हैं--बदस्तूर रायफल सम्हाले हुए...
कुछ मिनट बाद ही बख़्तियार के गुर्गे एक लड़के को खुली जीप में जोर से जकड़े हुए गुजरते हैं। लड़का खुद को उनके चंगुल से छुड़ाने की असफ़ल चेष्टा करता है। उसके चेहरे पर किसी भय या तनाव के भाव के बजाए, एक व्यंग्यमय मुस्कान ळालकती है।

एक जवान हिम्मत बटोरकर गली की ओट से बाहर आता है और जीप को हाथ के इशारे से रोकता है: "ज़नाब, इस बच्चे को लेकर आपलोग कहाँ जा रहे हो? इसने क्या कुसूर किया है कि इसे इस तरह..." 
एक गुर्गा भड़कता है: "तुम्हें पता नहीं है कि यह हमारे डान का लड़का ंî...”

जवान चुटकी लेता है: "लेकिन, जिस तरह से इसे तुम पकड़कर ले जा रहे हो, उससे तो यही लगता है कि जैसे यह कोई गुनाहगार हो जिसे तुम सजा देने ले जा रहे हो.. ”

एक गुर्गा खिसियाकर भौंकने के अंदाज़ में बोल उठता है: "हाँ, हाँ, हम इसे एक बियाबान में खूँख्वार जानवरों के बीच ले जा रहे हैं--इसे डराने-धमकाने ताकि यह बात-बात में हिंदुस्तान का गुणगान और तरफ़दारी करना बंद कर दे और अपने अब्बा हुज़ूर की तिज़ारत में इज़ाफ़ा करे, उनके मक़सद यानी कश्मीर को आज़ाद वतन बनाने के मक़सद को कायमाब करे..."

उसकी बात पर लड़का खिलखिला उठता है: "हाँ, हाँ, मैं बख़्तियार का गुनाहगार हूँ। उसके ये गुलाम मुळो कोई सबक सिखाने ले जा रहे हैं। मालूम नहीं, शायद ये मुझे ज़िबह भी कर सकते हैं। मेरा गुनाह सिर्फ़ यह है कि मैं अपने बाप के गलत कामों की ख़िलाफ़त करता हूँ। मैं उन्हें बताता हूँ कि हमसब भारत माता के बेटे हैं। हमें अपने देशवासियों पर ज़ुल्म नहीं ढाना चाहिए। उनका ख़ून बहाकर हमें क्या मिलेगा? हम सब भाई-भाई हैं। इस हिंदू-संस्कृति के अभिन्न हिस्से हैं। हमें मिलजुलकर इसकी रक्षा करनी चाहिए। इतने लंबे संघर्ष के बाद तो हमें आज़ादी मिली है। इसे बचाने के लिए हमें दोबारा कुर्बानी देनी होगी... ”

गुर्गे गुर्राते हैं। पर, वह बोलने से बाज नहीं आता है। रायफल ळाुलाता जवान उसकी वाकपटुता को सुन दाँतों तले अंगुली दबाता है।
जीप के दूर निकल जाने के कारण उसकी आवाज़ मद्धिम होती जाती है।

दीवानगंज के मदरसे में बड़ी अफ़रातफ़री मची हुई है। बख़्तियार खान के पैसों से चलने वाले मदरसे में आजकल उसके मन-मुताबिक कुछ भी नहीं हो पा रहा है। मदरसे के मौलवी अपने शागिर्द फ़रीद से बेहद ख़फ़ा हैं। पर, वे करें भी तो क्या करें! आख़िर, फ़रीद तो उनके मालिक बख़्तियार का ही लाडला है।

सुबह जब मदरसे में पठन-पाठन शुरू होता है तो फ़रीद बवाल मचा देता है। वह अपने मौलवी से क्लासरूम में ही कुछ बौख़लाने वाले सवाल कर बैठता है।

"ज़नाब, हमें हिंदी क्यों नहीं पढ़ाई जाती जो सारे हिंदुस्तान में बोली जानी वाली हमारी राष्ट्रभाषा है? ” फ़रीद के सवाल से मौलवी तिलमिला उठता है।

"मेरे दोस्त! इसकी वज़ह साफ़ है कि हम--मुसलमानों की जबान उर्दू होती है, ” मौलवी अपने धैर्य को बरकरार रखता है।

"हमें अपना पाठ शुरू करने से पहले वंदे मातरम और जन गण मन का गान करना चाहिए। देश के सभी स्कूलों में तो ऐसा ही होता है, ” उसके दूसरे सवाल से मौलवी हक्का-बक्का रह जाता है।

"दरअसल, हम हिंदुस्तानी कौम नहीं हैं। इसलिए, हम हिंदुस्तानी रिवाज़ नहीं अपना सकते। हम तो वही करेंगे जो हमारे कौम के मुताबिक है। मौलवी उसे भरसक समळााने की कोशिश करता है।

"हमारे किताबी सबक में हिंदुस्तान के महापुरुषों की जीवनगाथाएँ क्यों नहीं शामिल की गई हैं? हमें राम, कृष्ण, अशोक, बुद्ध, अकबर, राणा प्रताप, शिवाजी, कबीर, टैगोर, गाँधी, सुभाष वग़ैरह के आदर्शों से परिचित क्यों नहीं कराया जाता? हमें दूसरे मुल्कों के बड़े लोगों के बारे में ही क्यों बताया जाता है? क्या हमारी किताबें किसी बाहरी मुल्क से छपकर आती हैं? क्या हमारे देश में किताब लिखनेवालों की कमी है? ” फ़रीद एक साँस में सब बोल जाता है।

मौलवी, जो उसकी बातें सुनना बिल्कुल बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था, उसके पास आ जाता है। फ़रीद को लगता है कि जैसे वह उसे पीटने ही उसके पास चलकर आया हो।

मौलवी उसके कान में फुसफुसाता है, "मेरे अजीज दोस्त! तुम एक मुसलमां के ही बेटे हो ना! कहीं तेरी अम्मी ने किसी कश्मीरी पंडित के साथ...उफ़्फ़! मुझे तो तुम्हारी पैदाईश में कोई खोट नज़र आती है। मैं तुम्हारे अब्बा से अभी तुम्हारी शिकायत करता हूँ।"

उसके बाद मदरसे के सभी मौलवी तत्काल छुट्टी का ऐलानकर ऐसी अफ़रातफ़री में एक मजलिस बुलाते हैं, जैसेकि कोई बहुत बड़ा हादसा हो गया हो। मजलिस में सभी एकमत से यह निर्णय लेते हैं कि उन्हें बख़्तियार ख़ान से तुरंत मिलना चाहिए।

बख़्तियार मौलवियों की बातें सुनकर आग बबूला हो उठता है। वह तत्काल फ़रीद को बुलाकर उसके गाल पर कई तमाचे रसीद करता है। पर, हैरत की बात यह कि उन तमाचों से उसका गाल सूज जाने के बाद भी उसकी आँखों से एक बूँद भी आँसू नहीं बहता है। वह अपने बाप के हर तमाचे पर हँसता ही जाता है। थक-हारकर, बख़्तियार अपना माथा पकड़ लेता है।

"क्या बताऊँ? अपना ही ख़ून मेरे मक़सद के साथ दगा दे रहा है।" वह फफक पड़ता है।

तभी फरीद निरपराध भाव से आगे आकर उसे तसल्ली देने लगता है,  "अब्बा हुज़ूर! आपको अपने बुरे मक़सद से तौबा कर लेना चाहिए। आप हिंदुस्तान से अलग अपनी अस्मिता नहीं बना सकते। बिलाशक! आप हिंदुस्तानी कौम के हैं। आपका पहला मज़हब भारतीयता है जिसकी हिफ़ाज़त के लिए आपको तन-मन-धन सब न्यौछावर कर देना चाहिए। आप अपने गुर्गों से कह दीजिए कि वे देश के सभी हिस्सों में जाएँ और ग़रीब व ज़रूरतमंद देशवासियों की ख़िदमत करें। उनकी सेवा-सुश्रुषा करें। इसी में आपका और हमारे समाज की नेक-सलामती है।"

बख़्तियार सिर उठाकर अपने ढीठ बेटे को बड़े गौर से देखता है और वहाँ मौज़ूद अपने आदमियों से चिल्ला उठता है, "देखते क्या हो? इस मावाकूल को एक अंधेरी कोठरी में बंद कर दो। जब तक यह अपनी बुरी बातों से तौबा नहीं कर लेता, इसे वहीं भूखा-प्यासा तड़पने दो।"
उसके हुक्म की तुरंत तामील होती है।

दो दिनों तक फ़रीद अंधेरी कोठरी में बंद रहता है और जब तक दम रहता है, वह वंदे मातरम गाता रहता है। पर, तीसरे दिन कोठरी से फ़रीद की एक भी आवाज़ सुनाई नहीं देती है। ग़मी जैसी छाई मायूसी के चलते उसकी माँ छाती पीट-पीटकर सारे दीवानगंज को सिर पर उठा लेती है। आख़िरकार, बख़्तियार का दिल भी वात्सल्य से भर उठता है। आनन-फानन में दरवाजा खोलकर फ़रीद को बाहर निकाला जाता है। बख़्तियार उसकी कलाई टटोलता है तो उसके नब्ज़ के अभी भी फड़कने का उसे एहसास होता है।
डाक्टर येन-केन-प्रकारेण उसकी जान बचाने मे सफल हो जाते हैं।

बख़्तियार अपने बेटे के दिल में देश के प्रति नफ़रत भरने के सारे हिक़मत अपनाता है। फ़रीद को कई बार मृत्यु जैसी पीड़ा से गुजरना पड़ता है। पर, हर बार किसी करिश्मा के चलते सुरक्षित बच जाता है। अंततोगत्वा बख़्तियार की सख़्त हिदायत के तहत फ़रीद के मदरसा जाने और बाहर घूमने पर पाबंदी लगा दी जाती है। पर, फ़रीद में देशभक्ति के ज़ज़्बे में कोई कमी नहीं आती है। वह जैसेकि देशभक्ति के उन्माद में अपना दर्द तक भूल जाता है। अपने पिता के ख़ूनी साजिशों की पूर्व-सूचना जिला प्रशासन और पुलिस हेडक्वार्टर्स को देकर उसके मंसूबों पर पानी फेर देता है। ये सूचनाएँ वह अपने पिता की अनुपस्थिति में उनके ट्रांसमीटर के माध्यम से देता! बख़्तियार तो सोच भी नहीं सकता था कि उसका बेटा उनके ख़िलाफ़ इस हद तक जा सकता है।

बख़्तियार का तथाकथित ज़ेहाद लगातार विफ़ल होता जाता है। वह दिल्ली में हवाई अड्डे, रेलवे प्लेटफार्म, बाजार और अहम स्थानों पर बम-धमाके कराने के जो इंतजामात करता है, उन्हें पुलिस के समय-पूर्व हरकत में आने के कारण विफ़ल कर दिया जाता है। इससे विदेश-स्थित उसके हेडक्वार्टर्स को भी उसके ज़ेहादी होने पर शक होने लगता है कि बख़्तियार जानबूझकर उनकी योजनाएँ सफल नहीं होने दे रहा है और ज़ेहाद में उनका साथ देने के वादे से मुकर रहा है। 

एक दिन, हेडक्वार्टर्स से कुछ मिलीटेंट बख़्तियार के घर पर अचानक छापा मारते हैं और उसके बेटे फ़रीद को उस वक़्त रंगे हाथों पकड़ते हैं जबकि वह घर के तहखाने में लगे ट्रांसमीटर से हिंदुस्तानी ख़ुफ़िया विभाग के अधिकारियों से बातें कर रहा होता है। दरअसल, बख़्तियार को तो यह अंदेशा ही था नहीं कि उसका बेटा ही उन्हें इस कदर धूल चटाने पर आमादा है। चुनांचे, मिलीटेंट तो यह समझते हैं कि बख़्तियार के ही निर्देश पर उसका बेटा ऐसा कर रहा है। 

एक मिलीटेंट तत्काल बख़्तियार के सीने पर रिवाल्वर टिका देता है।

वह गरज उठता है, "तुम हमें डबल-क्रास कर रहे हो। हमारी आँखों पर पट्टी नहीं बँधी है। तुम्हारी ही हिदायत के तहत तुम्हारा लड़का हमारे मंसूबों पर पानी फेर रहा है। आख़िर, तुम हो तो हिंदुस्तानी ही। हिंदुस्तानी मुसलमां दग़ा ही करते हैं। तुम्हारे पुरखे तो हिंदू ही रहे होंगे। ऐसे में तुमसे वफ़ा की उम्मीद कैसे की जा सकती है।" 

बख़्तियार उसकी दाढ़ी छूकर गिड़गिड़ाने लगता है, "मैं अल्लाह की कसम खाकर कहता हूँ कि मुझे इस बात का बिल्कुल इल्म नहीं था कि मेरा बेटा ही मेरे पीठ पर वार कर रहा है। उसने पहले भी कई बार हमारी स्कीमों में दख़लंदाज़ी की है।"

"अगर ऐसी बात है तो तुम्हें अपने बेटे की कुर्बानी देनी होगी...अगर वह तुम्हारे रास्ते का रोड़ा बन रहा है तो उसे ख़ुदा के नाम पे कुर्बान कर दो...तुम्हारे इस शहादत से तुम्हें और तुम्हारे बेटे को जन्नत नसीब होगी। बोलो, क्या तुम ऐसा कर सकोगे? ”

मिलीटेंटों की शर्त सुनकर बख़्तियार के पाँव तले से जमीन खिसक जाती है। बख़्तियार के परिवार के सभी बदहवास सदस्य वहाँ इकट्ठे हो जाते हैं। उस वक़्त पाकिस्तान से आई फ़रीद की बुआ--फातमा भी स्थिति का जायजा लेने आ जाती है।

तभी, वहाँ उपस्थित फ़रीद चिल्ला उठता है, "हाँ, हाँ, मुझे ऐसी ही मौत चाहिए। अपने देश के वास्ते मैं शहीद होकर जन्नत का दावेदार बनूँगा...देश को विदेशी साजिशों से आज़ाद कराकर मेरी रूह को बेहद सुकून मिलेगा...अब्बा हुज़ूर, मेरी यह तमन्ना पूरी कर दीजिए।" वह उनके कदमों पर गिरकर गिड़गिड़ाता है।

मिलीटेंट व्यंग्यपूर्ण अंदाज़ में बख़्तियार को ललकारता है, "देखते क्या हो? चला दो, खंजर अपने बेटे के सीने पर। एक सच्चे ज़ेहादी से यही उम्मीद की जाती है। मज़हब की हिफ़ाज़त के लिए सारे रिश्ते-नाते ताक पर रख दिए जाते हैं... ”  

इसी दरमियान, फातमा अपने भाई बख़्तियार को उस पेंचीदे हालात से उबारने के लिए बीच में ही टपक पड़ती है, "भाईजान, ये तुम्हारे कामरेड अफ़सर सही फरमाते हैं। तुम्हें अपने बेटे की कुर्बानी देनी ही चाहिए। तुम सच्चा मुसलमां होने का सबूत देकर अपने ज़ेहाद को एक नया मोड़ दे सकते हो.. ”.

बख़्तियार रुआँसा हो जाता है, "मैं अपने हाथों से ही अपने जिगर का ख़ून कैसे कर सकता हूँ? आख़िर, मैं इसका वालिद हूँ... ”

"तुम क्या, तुम्हारे खानदान का कोई भी शख़्श फ़रीद का ख़ून नहीं बहा सकता,"  वह बख़्तियार के कान से अपना मुँह सटा देती है, "पर, मेरे पास एक सूरत है--तुम्हें इस कश्मकश से निजात दिलाने की। साँप भी मर जाएगा, और लाठी भी नहीं टूटेगी।" फातमा चुटकी बजाते हुए उसकी समस्या का हल निकालने का दावा करती है।

"वो कैसे? ”  बख़्तियार पूरे होश में सवाल करता है। 

वह उसके कान में उसी तरह फुसफुसाती है, "वो ऐसे कि तुम्हारे सालारजंग में जो ख़ूँखार लकड़बग्घा है, उसे मैं बचपन से चारा खिलाती रही हूँ। वह मुझे अच्छी तरह पहचानता है। तुम्हारे आदमी तो उसके पास जाने की हिम्मत तक नहीं जुटा सकते। पर, मैं तो उसे अपनी बाँहों में जकड़कर उसके साथ गलबहियाँ तक खेल सकती हूँ। वह मेरा बाल भी बाँका नहीं कर सकता। मैं फ़रीद को लेकर जैसे ही उसके पिंजरे में घुसूँगी, वह मुझे छोड़ फ़रीद को कच्चा चबा जाएगा...और हाँ, यह सब मैं खेल-खेल में करूँगी। उसे इसकी भनक तक नहीं मिलेगी।"
बख़्तियार सोच में पड़ जाता है। फ़रीद की माँ, जो दूर से फातमा और अपने शौहर के बीच हुई गुपचुप बात नहीं सुन पाती है, एकदम से बिफ़र पड़ती है, "हाँ, हाँ, तुमलोग मेरे बेटे को मारने की साजिश कर रहे हो। मैं यह कतई बर्दाश्त नहीं कर सकती..."
बख़्तियार उसे एक भद्दी-सी गाली देता है, "तूने अपने पेट से ये हिंदू का बच्चा कैसे पैदा किया जबकि सारी दुनिया जानती है कि तेरा शौहर मुसलमां है..."
पर, माँ के दिल के हाले-बयाँ को उस समय सुनने के लिए वहाँ कोई आगे नहीं आता है। बख़्तियार एक निर्णायक अंदाज़ में मिलीटेंटों को एक कोने में ले जाकर अपनी योजना बताता है। उसके बाद वे तहखाने में गुप्त मंत्रणा करने चले जाते हैं जबकि फातमा, फ़रीद को चूमती-पुचकारती बरामदे से बाहर ले जाती है। 


इस दुनिया का सबसे दुःखी प्राणी कोई है तो वह बख़्तियार ही है। जिस लकड़बग्घे पर उसकी बहन फ़ातमा को बेइन्तेहां भरोसा था, उसने ही उसे अपनी खुराक बना ली। विजयोन्माद में जब फ़रीद उस लकड़बग्घे पर सवार होकर दीवानगंज में घूमता हुआ अपने घर पहुँचता है तो किसी को अपनी आँखों पर यकीन नहीं होता है। दीवानगंज में अभी तक ऐसा करिश्मा किसी ने नहीं देखा था। घोड़े की सवारी तो सबने की थी और देखी थी। पर, लकड़बग्घे की सवारी तो...आख़िर, एक लकड़बग्घे में देशद्रोह और देशभक्ति के बीच फर्क करने की क्षमता कहाँ से आई? वह कोई दैवी चमत्कार ही होगा। 

बहरहाल, फ़रीद के घर पहुँचने के कोई आठ घंटे बाद दिल्ली से सी आर पी एफ़ के जवान दीवानगंज के चप्पे-चप्पे पर काबिज़ हो जाते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि कल जब मिलीटेंट अचानक फ़रीद को तहखाने से बरामद कर उसे घसीटते हुए लाए थे तो फ़रीद का ईयरफोन नीचे गिर गया था जिससे वहाँ होने वाली सारी अफ़रातफ़री और कहासुनी दिल्ली स्थित अधिकारियों को सुनाई दे गई थी। उसके बाद, रक्षा विभाग तत्काल हरकत में आ गया और मिलीटेंटों को धर-दबोचा गया।

फौज़ पूरे दीवानगंज का घेराव कर लेती है। ऐसा लगता है कि दीवानगंज अपने दहशत से उबरकर पहली बार दुनिया के सामने खड़ा हुआ है। दीवानगंजवासी बंदी बख़्तियार और दशतगर्दों के ख़ौफ़ से मुक्त होकर उसके घर को घेर लेते हैं। भारत के रक्षा विभाग का कमांडेंट बंदी मिलीटेंटों से दहाड़ते हुए कहता है, "जेहाद के नाम पर भारत के अंदरूनी मामलों में दख़लंदाज़ी करने का अंजाम तो देख ही लिया कि क्या होता है।"

वह सार्वजनिक रूप से फ़रीद की पीठ थपथपाता है, "हमें फ़रीद की बहादुरी पर फ़ख्र है। यह लड़का देश के भटके हुए युवावर्ग के लिए जीता-जागता मिसाल है। इसने अपनी जान की बाजी लगाकर यह साबित कर दिया कि राष्ट्रधर्म सबसे ऊँचा है। राष्ट्रभक्ति का स्थान जाति, धर्म, समाज और परिवार सभी से ऊँचा है। मेरा विश्वास है कि भारत माता का यह महान सपूत एक दिन देश का गौरव होगा। इसे तो मैं प्रहलाद का अवतार मानता हूँ। जिस तरह हिरण्यकश्यप के अत्याचार से प्रहलाद को मुक्ति मिली थी, उसी तरह इस बहादुर बच्चे को अपने क्रूर बाप की यातनाओं से छुटकारा मिला है। आज सभी ने देख लिया कि सच, उगते सूरज की तरह काले घटाटोप को फाड़कर देशद्रोहियों की आँखें किस तरह चौंधिया रही हैं। पूरे देश को ही क्या, सारे विश्व को यह सच स्वीकार करना पड़ेगा।"

 दीवानगंज में चहलपहल लौट आई है। लोगबाग सुबह दीवानगंज से लगी पहाड़ी पर चढ़कर उगते सूरज को देखना बड़ा खुशगवार मानते हैं। दीवानगंज से सदर बाजार का रास्ता खुल गया है। रास्ते के दोनों ओर मदारियों का मजमा फिर से लगने लगा है। बीच चौराहे पर हसन और उसके साथी रात ग्यारह बजे तक बेख़ौफ़ बतियाते हैं। वह बताता है कि बख़्तियार को अपनी वतनफ़रोशी पर बड़ा अफ़सोस है और जेल में उसके नेक बर्ताव के मद्देनज़र उसकी सजा कम कर दी गई है। लेकिन उसे अपने फ़रीद के फ़ौजी अफ़सर बनने पर बड़ा नाज़ है।

जब फ़रीद छुट्टियों में उससे मिलने जेल जाता है तो वह उसका मुख चूमते हुए भावविभोर हो उठता है, "तेरी माँ ने तेरे रूप में एक फरिश्ते को जन्म दिया है। ख़ुदा करे, हर माँ तेरे जैसे बच्चे को ही जन्म दे जो मेरे जैसे ग़ुमराह आदमी को सही रास्ता दिखा सके! ”

प्रत्युत्तर में फ़रीद रो उठता है, "अब्बा हुज़ूर! अब जब हम दीवानगंज लौटेंगे तो सारी ख़ुशियाँ हमारे दामन में होंगी। अम्मा आपकी बाट बड़ी बेसब्री से जोह रही है। वह कहती है कि आपके लौटने से दीवानगंज में बहार आ जाएगी...”    


 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
डा. मनोज श्रीवास्तव
आप भारतीय संसद की राज्य सभा में सहायक निदेशक है.अंग्रेज़ी साहित्य में काशी हिन्दू विश्वविद्यालयए वाराणसी से स्नातकोत्तर और पीएच.डी.
लिखी गईं पुस्तकें-पगडंडियां(काव्य संग्रह),अक्ल का फलसफा(व्यंग्य संग्रह),चाहता हूँ पागल भीड़ (काव्य संग्रह),धर्मचक्र राजचक्र(कहानी संग्रह),पगली का इन्कलाब(कहानी संग्रह),परकटी कविताओं की उड़ान(काव्य संग्रह,अप्रकाशित)

आवासीय पता-.सी.66 ए नई पंचवटीए जी०टी० रोडए ;पवन सिनेमा के सामने,
जिला-गाज़ियाबाद, उ०प्र०,मोबाईल नं० 09910360249
,drmanojs5@gmail.com)

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